Friday, 2 April 2021

राम, सनातन और बुद्ध।

कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था का भांडा फोड 
(छांदोग्य उपनिषद से प्रमाण) 

छांदोग्य उपनिषद के अनुसार 👇 

जिनका बर्ताव यहा रमणीय रहा है वह जल्दी उत्तम जन्म को प्राप्त होंगे. ब्राह्मण के जन्म को,वा क्षत्रिय के जन्म को वा वैश्य के जन्म को. 
पर वह जो यहा निच बर्ताव वाले रहे है वो जल्दी निच योनी मे प्राप्त होंगे. 
कुत्ते कि योनीको वा सुअर कि योनीको वा चांडाल कि योनीको. 

(छांदोग्य उपनिषद 5-10-7, पंडित राजाराम,पृष्ठ 193) 


छांदोग्य उपनिषद का उपर का श्लोक आर्य समाज के तथाकथित कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था को पुरी तरह से ध्वस्त कर रहा है.
कोई शुद्र,चांडाल कर्म के आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कैसे बन सकता है ? वो तो पिछले जन्म के कर्म का फल भोगने के लिए चांडाल योनी को प्राप्त हुआ है. 
उसे इस जन्म मे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनाना छांदोग्य उपनिषद के कर्म फल सिद्धांत कि काट करने जैसा है


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भारत में बौध्द धर्म -
संभावनाएं एवं चुनौतियाँ - 
वैदिक काल में ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष--
यदि वैदिककाल को देखें तो त्रेता युग में तथा द्वापर युग तक भी ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के बीच खूनी संघर्ष हुए हैं,राजा वेन ने अपने राज्य में यज्ञों के आयोजनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो ब्राह्मणों व ऋषियों की आजीविका का उस काल में एक मात्र जरिया था,मारिच ऋषि के नेतृत्व में सभी ब्राह्मण ,ऋषि राजा वेन से मिले,राजा वेन ने कहा कि सभी ब्राह्मण उसी की ही पूजा अर्चना करें ,कोई यज्ञ आयोजित नहीं होंगे,इस पर ब्राह्मणों ने राजा वेन को पकड़ लिया ,मारपीट कर उसकी जंघाओं को जख्मी कर दिया जिससे क्षत्रियों व ब्राह्मणों में संघर्ष छिड़ गया,इस घटना का विवरण मयूरखण्ड एक पृष्ठ 302 - 303 में मिलता है,श्रीमद्भागवत महापुराण के स्कन्ध 4 अध्याय 14 में भी इसका विवरण है.
  राजा पुरूरवा ने अपने राज्य के ब्राह्मणों की सम्पत्ति छीन ली और ब्राह्मणों को रोजगार रहित कर दिया,ब्राह्मणों ने संगठित होकर पुरूरवा राजा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया,उसके राज्य में ब्राह्मणों व क्षत्रियों के बीच लड़ाई छिड़ गई इस घटना का विवरण महाभारत के आदि पर्व में मिलता है,पुरूरवा के पौत्र राजा नहुष ने भी ब्राह्मणों का वर्चस्व मानने से इनकार कर दिया था,राजा नहुष ने इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी को प्राप्त करने के लिए इन्द्राणी द्वारा रखी गई शर्त की पालना में एक रथ पालकी बनवाई और उस पर बैठकर उसके राज्य के प्रमुख ऋषियों को
पालकी उठाने का आदेश दिया और ब्राह्मणों -ऋषियों को पालकी में जोत कर राजा नहुष ने इन्द्राणी के साथ पालकी में सवारी की,
इससे ऋषि व ब्राह्मण भड़क गये और नहुष के विरुद्ध विद्रोह कर दिया जिसका विवरण महाभारत के उद्योग पर्व में मिलता है,राजा निमि ने भी अपने राज्य में ब्राह्मणों को कोई सम्मान नहीं दिया और न ही ब्राह्मणों की आजीविका की ही व्यवस्था की जिसका किया जाना राजा का दायित्व था,ब्राह्मणों को अन्य लोगों की भाँति ही व्यवसाय अपनाकर आजीविका कमाने को कहा,ब्राह्मण राजा निमि से नाराज हो गये,यज्ञ के आयोजन को लेकर भी वशिष्ठ ऋषि ने राजा निमि को शाप दे दिया था , लेकिन राजा निमि ने भी वशिष्ठ को माफ नहीं किया और बदला लिया ,इसका विवरण विष्णु पुराण में मिलता है.
  हैहयवंशी राजा कृतिवीर्य का राजपुरोहित भृगु ब्राह्मण था ,जो काफी धनवान था,कृतिवीर्य की मृत्यु हो जाने पर उसके वंशजों को धन की आवश्यकता पड़ने पर भूगु पुरोहित से आर्थिक सहयोग के लिए कहा ,भृगु पुरोहित ने कृतिवीर्य के वंशजों की आर्थिक सहायता करने से इन्कार कर दिया और धन जमीन में गाड़ दिया,क्षत्रियों ने जमीन खोद कर धन निकाला तो ब्राह्मणों व क्षत्रियों में लड़ाई छिड़ गई,क्षत्रियों ने राज्य के सभी ब्राह्मणों का वध कर दिया,यहाँ तक कि ब्राह्मण स्त्रियों के गर्भ में बच्चे थे,उनको भी मार दिया,इस घटना का विवरण महाभारत के आदि पर्व में मिलता है,महाभारत के वनपर्व में राजा अर्जुन जो हैहयवंश से था का भी ब्राह्मणों से संघर्ष का विवरण मिलता है,राजा अर्जुन से उसके राज्य के ब्राह्मण विशेषाधिकारों की माँग करने लगे राजा अर्जुन ने ब्राह्मणों का अनादर किया और भगा दिया,
बाद में अर्जुन को वायु ऋषि ने समझा -बुझाकर समझौता कराया इसका विवरण महाभारत के अनुशासन पर्व में भी मिलता है, राजा अर्जुन के पुत्र ,परशुराम के पिता जमदग्नि का बछड़ा ले आये परशुराम ने नाराज होकर राजा अर्जुन की दोनों भुजाएँ काट दी, इस पर नाराज होकर राजा अर्जुन के लड़के ने परशुराम के पिता जमदग्नि का वध कर दिया,इससे नाराज होकर परशुराम ने राजा अर्जुन के सभी पुत्रों व परिवार के अन्य छोटे -छोटे बच्चों को भी मार दिया,यही नहीं हैहयवंश को व उस राज्य का साथ देने वाले सभी क्षत्रियों को मार कर पूरे हैहयवंश राज्य को क्षत्रिय विहिन कर दिया जो बच्चे क्षत्रिय स्त्रियों के गर्भ में थे उनको भी मार दिया । ऐसा एक बार नहीं किया बल्कि 21 बार हमलाकर हैहयवंश राज्य को क्षत्रिय विहिन कर दिया,परशुराम अत्यधिक क्रोधी स्वभाव का था, उसने अपनी माँ का भी वध कर दिया था,इन घटनाओं का विवरण महाभारत के अनुशासन पर्व व आदिपर्व में मिलता है,तालजंघ राज्य के क्षत्रियों का और्व नामक ब्राह्मण ने कत्लेआम किया था,
उस राज्य को भी ब्राह्मणों ने क्षत्रियविहीन कर दिया था, क्षत्रिय एवं ब्राह्मणों के संघर्षों का विवरण मयूर खण्ड- 1- पृष्ठ 450 से 474 में भी मिलता है,यह संघर्ष हजारों साल तक चला था,इस कारण ही मनुस्मृति में क्षत्रियों को बार-बार यह उपदेश दिया गया है कि
बाह्मणों को द्वेष भाव से नहीं देखें ब्राह्मणों का आदर करें ,पर्याप्त सम्मान दें तथा ब्राह्मण की शक्ति का भय दिखाकर तथा अगले जन्म में ब्राह्मण की सेवा नहीं करने पर नरक में जाने के डर ने क्षत्रियों को आज्ञाकारी बनाने में मदद की,लेकिन मन से ब्राह्मणों से नहीं जुड़े ,गैर बराबरी ( असामनता ) का विरोध उन्होंने किया,ब्राह्मणों ने उनकी सत्ता को चुनौती देने वाले क्षत्रियों को यज्ञोपवीत संस्कार के अधिकार से वंचित कर शूद्र वर्ण में धकेल दिया और उन्हें हेय कार्य करने के लिए विवश कर दिया-
भारत में बौध्द धर्म-115,116,117.
       ---------मिशन अम्बेडकर.
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती

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#पहले_राम_आये_या_बुद्ध......

अगर आप किसी भी सनातनी से पूँछो कि धरती पर पहले राम का युग था या बुद्ध का?   तो वह झट से जवाब देगा कि राम का.....

यूँ तो हिन्दू राम और बुद्ध दोनो को विष्णु का अवतार मानते है, पर उनका कहना है कि पहले रामावतार हुआ, फिर कृष्णावतार और तत्पश्चात बुद्ध का आगमन हुआ! लेकिन आप कुछ श्रोतो और पौराणिक ग्रंथो का अध्ययन करे तो मामला जरा पेचीदा लगता है!

गौतम बुद्ध ने अपने जीवनकाल मे कभी भी शायद राम का उल्लेख नही किया, या उनके दौर मे राम का अस्तित्व ही नही रहा होगा! पर राम ने अपने मुँह से बुद्ध का नाम लिया है, मतलब राम के समय मे बुद्ध का अस्तित्व था!

हिन्दू बड़ी चालाकी से हमेशा एक साजिश करते हैं, हिन्दुओं को यह पता है कि भारत मे नई चीजों की अपेक्षा प्राचीन चीजों का अधिक महत्व है, इसीलिये जब कभी भी कोई बड़ा मन्दिर बनता है तो पंडे-पुरोहित यह कहकर प्रचारित करते हैं कि यह मन्दिर बहुत पुराना है..द्वापरयुग मे यहाँ पाण्डवों ने पूजा की थी!

हर मन्दिर से इसी तरह की झूठी कहानियाँ जोड़ दी जाती है, ताकि उस मन्दिर का महत्व बढ़ जाये और वहाँ चढ़ावे मे कमी ना आये!
बस ऐसे ही हिन्दूधर्म भी है, पंडे-पुरोहित हिन्दूधर्म को अतिप्राचीन बताते हैं, पर कई बार ऐसा लगता है कि हिन्दूधर्म बौद्धधर्म के बाद खड़ा किया गया! ऐसे ही यह भी प्रतीत होता है कि राम भी बुद्ध के बाद के हैं!
इसका एक उदाहरण बाल्मीकि रामायण मे भी मिलता है।

बाल्मीकि रामायण (गीताप्रेस) अयोध्याकाण्ड सर्ग-109 पृष्ठ-359 पर श्रीराम अपने ही एक हितैषी 'जाबालि' से कहते है कि -"जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध (बौद्धधर्म को मानने वाला) भी दण्डनीय है!"

यहाँ रामजी ने बौद्धो को दण्ड देने की बात की है! अर्थात राम के समय मे बौद्ध थे, तो यह स्पष्ट है कि राम का अस्तित्व बुद्ध के बाद खड़ा किया गया!

इसी श्लोक मे राम नास्तिकों को भी दण्ड देने की बात करते है और कहते है -"नास्तिकों (चार्वाकी) को भी इसी प्रकार दण्ड देना चाहिये, इसलिये राजा को चाहिये कि नास्तिक को भी चोर की भाति दण्ड दें"

रामायण का यह प्रसंग एक और सवाल खड़ा करता है कि राम क्या वाकई अयोध्या मे ही पैदा हुये, या राम का चरित्र कहीं बाहर (विदेश) से आयात किया गया!
क्योकि बुद्ध के बाद कोई भी इतिहासकार अयोध्या मे राम के जन्म की बात स्वीकार नही करेगा!

दूसरी बात राम को नास्तिकों से भी घृणा थी, अर्थात राम के समय मे नास्तिक थे!
इसमे जरा भी संदेह नही है कि तथागत बुद्ध एक आध्यात्मिक गुरू थे, और भारतीयों पर उनका गहरा प्रभाव था! कहीं ऐसा तो नही कि उनके प्रभाव को कम करने के लिये राम नाम का एक फर्जी पात्र पंडो द्वारा खड़ा किया गया।
    
       *****अमित कुमार भारती *****
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Etc3

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