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.....................हिन्दू धर्म की रिडल्ज...................
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" हिन्दू धर्म की रिडल्ज "बोधिसत्व बाबासाहब डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा दिखाया गया वो अत्याधुनिक आइना है जिसमे तथाकथित हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की कारगुजारियों को साफ़ साफ़ देखा जा सकता हैं....आप भी देखिये ...
भारत में प्राचीन आर्य स्त्रियों की सामान्यतःबिक्री होती थी,विवाह की आर्य पद्धति से लड़कियों की विक्री की जाती थी,पिता गो-मिथुन देता था और कन्यादान लेता था मतलब गो मिथुन के लिए कोई भी लड़की बिकती थी,"गो मिथुन का मतलब था एक गाँव और एक बैल जोकि एक लड़की की योग्य कीमत समझी जाती थी".अपनी लड़कियों को उनके पिता तो बेंचते ही थे बल्कि अपनी पत्नियों को उनके पति भी बेंचते थे,हरिवंश पुराण अपने 79 वें अध्याय में कहता है कि जो पुरोहित संस्कार कराता है एक पुण्यक व्रत उनकी दक्षिणा होनी चाहिए, इसका कहना है कि ब्राम्हण स्त्रियों को उनके पतियों से खरीदा जाय,और ब्राम्हण पुरोहितों को दक्षिणा के तौर पर दान में दे दी जाय,जिससे स्पस्ट होता है कि ब्राम्हण अपनी पत्नियों को भी बेंचते थे.
इसी तरह प्राचीन आर्य अपनी स्त्रियों को सम्भोग के लिए किराए पर भी देते थे,महाभारत के अध्याय 103 से 183 तक माधवी का जीवन चरित्र दिया हुआ है,जिसके अनुसार माधवी राजा ययाति की लड़की थी,ययाति ने उसे किसी को दी जाने वाली दक्षिणा के तौर पर गालब नामक ऋषि को सौंप दिया था,जिसने माधवी को तीन राजाओं को किराए पर दिया था,लेकिन सिर्फ उतने समय के लिए जितने समय में वह मां बन सके,तीनो राजाओं की बारी हो चुकने के बाद गालब ने उसे अपने गुरु विश्वामित्र को सौंप दिया था,विश्वामित्र ने उसे अपने पास रखा और बाद में उसे गालब ऋषि को वापस सौंप दिया अंत में गालब ने उसे उसके पिता ययाति को सौंप दिया..यह तत्कालीन आर्य व्यवस्था है जिसे आज भी सभी को जानने की सख्त जरुरत है...
क्रमशः.....
"मिशन अम्बेडकर"
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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----हिन्दू धर्म की रिडल्ज---5-----
..कृष्णनामा...
हमें बताया जाता है कि कृष्ण जब केवल 12 वर्ष का ही था तभी से वह एक कुशल योद्धा और राजनीतिज्ञ था,पर हकीकत तो यही है कि हर दृष्टि से उसका आचरण अनैतिक था,इस क्षेत्र में कृष्ण का पहला पराक्रम था अपने मामा कंस की हत्या करना,दरअसल कंस कृष्ण के कथित कारनामों से भयभीत हुआ था इसलिए उसने भी कृष्ण को ख़तम कराने के उपाय किये थे,कंस् ने एक धनुर्यज्ञ की घोषणा की जिसमे उसने अपने दरबारी अक्रूर से कृष्ण और बलराम को निमंत्रण भेजा था,बलराम और कृष्ण निमंत्रण में तो आये पर पूरी तरह कंस की हत्या करने की योजना बनाकर,अपनी योजनानुसार एक धोबी को मारकर उसके यहाँ से कपडे बदले ताकि उन्हें कोई पहचान न सके,कुब्जा द्वारा इत्र लगाये,सुदामा द्वारा फूल मालाएं पहनकर आखिर दोनों भाई कंस के आयोजन स्थल पर पहुँच ही गए,और यज्ञ स्थल में रखे गए धनुष को दोनों भाइयों ने तोड़ दिया,भयभीत कंस ने अपने बचाव में कुबलियापीर नामक हाथी छुड़वा दिया,लेकिन दोनों भाइयों ने उस हाथी का भी बध कर दिया,दोनों भाइयों ने कंस के अनेक पहलवानों को भी मार डाला,अब बलराम और कृष्ण वहां पहुंचे जहां कंस सिंहासन पर बैठा था,उन्होंने कंस के बाल पकडे और खींचकर नीचे पटक कर कंस का बध कर दिया,वहीँ उग्रसेन ने कृष्ण को समूचा राज्य समर्पित कर दिया.
अब आप स्वतः विचार कीजिये क्या किसी की मात्र ह्त्या करने से ही किसी को भगवान् बनाया जा सकता है..नहीं न... पर यहाँ पर हर दमनकारी की तरह ही कृष्ण को भी भगवान् बना दिया गया जिसे लोग आज भी सर पर लिए ढो रहे है यही है ब्राम्हणवाद का अनूठा कमाल,फूट डालो ,दमन करो ,गुलाम बनाओ और राज करो....
कृष्ण का अगला कारनामा जरासंध और कालयवन के साथ युद्ध का है,जरासंध कंस का जवाई था कहा जाता है जरासंध ने मथुरा पर 17 बार नाकाम आक्रमण किया,किंतु अठाहरवीं बार चढ़ाई में मारे जाने वाले लोगों के डर और तबाही की वजह से कृष्ण ने यादवों को गुजरात के पश्चिमी तट पर बसे द्वारका नगर चले जाने को कहा, यादवों के प्रस्थान के अनंतर जरासंध के सुझाव पर कालयवन ने मथुरा का घेरा डाल दिया,कृष्ण ने कालयवन की सेना को परास्त किया,लेकिन कृष्ण जिस समय लूट का माल लेकर द्वारका भागे जा रहे थे,उन्हें जरासंध ने धर दबोचा,लेकिन कृष्ण ने एक पहाड़ी पर भागकर अपना बचाव कर लिया,बाद में वहां से भागकर द्वारका जा पहुंचे.
कृष्ण का पहला विवाह विदर्भ नरेश भीष्मक की बेटी रुक्मिणी से हुआ,जबकि रुक्मिणी का विवाह जरासंध की सलाह पर शिशुपाल से करने की तैयारी पहले ही हो चुकी थी,लेकिम शादी के एक दिन पहले ही कृष्ण रुक्मिणी को ले भागा,जबकि कृष्ण की पत्नियों की संख्या पहले से ही ज्यादा थी,जो बढ़कर सोलह हजार एक सौ आठ तक पहुँच चुकी थी,जो की अधिकांशतः प्राग ज्योतिष के नरेश नरक के हरम में थीं,कृष्ण ने नरेश को हराकर उसकी हत्या कर दी थी और मिली हुई स्त्रियों को अपनी पत्नी बना लिया था ,कृष्ण की अधिकाँश पत्नियां लोगों ने कृष्ण के डर और भय या युद्ध में जीती या भगाई या प्रदान की हुई थी,उसमें मित्रबिन्द तो कृष्ण की भतीजी थी जिसे कृष्ण उसके स्वयंबर मंडप से भगा ले गए थे,वही अयोध्या से लूट के माल में उन्हें सत्या मिली थी,भद्रा कृष्ण की दूसरी भतीजी थी जिसे सामान्य विधि से कृष्ण से ब्याहा गया था वहीँ लक्ष्मणा भद्र नरेश ब्रहतसेन की कन्या थी उसे भी कृष्ण स्वयंबर मंडप से उठा लाये थे ..
इस तरह भगवान् कहे जानेवाले कृष्ण के कारनामे अनंत हैं जिन्हें लगातार उजागर किया गया है पर यहाँ आपकी भी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हत्यारे,व्यभिचारी,लुटेरे और धोखेबाज कृष्ण को एक भगवान् की श्रेणी में रखे जाने की आप भी स्वयं समीक्षा कीजिये.
अभी आपनें पिछले लेखों में कृष्ण के कुछ कारनामें देखे,अभी और देखिये...
बलराम की बहन और स्वयं कृष्ण की भी बहन सुभद्रा के साथ अर्जुन का जो विवाह हुआ था उसमें कृष्ण का अपना हिस्सा यहाँ ध्यान देने लायक है,एकबार घूमते घूमते अर्जुन प्रभाष नामक पवित्र तीर्थ स्थान पर पहुंचा वहां रैवतक पर्वत पर कृष्ण ने उसका स्वागत किया,वहां अर्जुन सुभद्रा पर आसक्त हो गया उसने कृष्ण को पूंछा कि वह सुभद्रा को कैसे प्राप्त कर सकता है,कृष्ण ने उसे सलाह दी कि वह उसे एक क्षत्रिय की तरह उठा ले जाए,वह स्वयंबर आदि के चक्कर में मत पड़ो,यादव तो पहले इस विवाह के लिए बहुत क्रुद्ध हुए पर जब कृष्ण ने सभी को समझाया कि सुभद्रा को अर्जुन से बेहतर कोई योग्य वर नहीं मिलेगा,इसलिए सभी लोग अर्जुन और सुभद्रा के विवाह के लिए सहमत हो गए .
जिन जरासंध और शिशुपाल ने युधिस्ठिर के राजसूय यज्ञ में गड़बड़ी की थी उनसे कृष्ण कैसे निपटें यह भी जानने लायक है,जरासंध ने बहुत से राजाओं को कैद कर लिया था जिन्हें वह रूद्र को बलि चढ़ाना चाहता था लेकिन जबतक जरासंध को न मारा जाता और सभी राजाओं को पराजित नही किया जाता तबतक युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा कैसे घोषित किया जाता इसीलिए भीम और अर्जुन को साथ लेकर कृष्ण जरासंध की राजधानी राजगृह पहुंचा जहाँ पहुंचकर उसने जरासंध को मल्ल युद्ध के लिए ललकारा,जरासंध से मल्ल युद्ध के लिए भीम को चुना गया,युद्ध तेरह दिन तक चला अंत में तेरहवें दिन जरासंध मारा गया,और अंत में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ को कराकर युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा घोषित किया गया.
इस तरह आपने देखा कि कृष्ण ने किस तरह अपने फायदे के लिए साजिस कर एक राजा की ह्त्या कराई और इसी हत्यारे को भगवान् की श्रेणी में ल्ला खड़ा किया,यह् तो है चल प्रपंच किसी और का पर ऐसे धूर्त लोगों के धोखे से बचने की अब आपकी नैतिक जिम्मेदारी है.
युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा बनाने के लिए राजशूय यज्ञ की तैयारियां चालू थीं,हर किसी ने अपने अपने काम की जिम्मेदारियां सम्हाली,वहीँ कृष्ण ने ब्राम्हणों के पैर धोनें का काम खुद किया,यह बात साबित करती है कि जिस तरह से सादियो से ब्राम्हणों का शूद्र निम्न स्तर का गुलाम था उस तरह दूसरा और कोई नहीं था,खैर यज्ञ समाप्ति के बाद राजाओं,पुरोहितों और अन्य पूज्य व्यक्तियों को भेंट देने का नंबर आया,तो विचारविमर्श के बाद भीम ने अनुमोदन किया कि सबसे पहले कृष्ण से शुरुवात की जाय इसके लिए सहदेव को चुना गया इससे शिशुपाल का पारा गरम हो गया उसने पांडवों और कृष्ण को गालियां देना शुरू कर दीं, अंत में शिशुपाल को कृष्ण से युद्ध के लिए ललकारा गया,फिर क्या था युद्ध हुआ और कृष्ण ने अपना चक्र घुमाया और शिशुपाल की गर्दन काटकर उसकी हत्या कर दी.
अब आप खुद भी समीक्षा कीजिये जिसनें आम इंसानों (ब्राम्हणों)के पैर धोये हों और किसी के उकसाने पर किसी किसी राजा की बेवजह हत्या कर दी हो भला उसे भगवान् की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है...यहाँ एक बात और ध्यान देने लायक है कि यहाँ ब्राम्हणों ने कृष्ण को भगवान् बनाकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं पहला -ब्राम्हणों ने अपने पैर धुलाकर साबित किया कि शुद्र चाहे भले भगवान बन जाय पर उसका स्थान ब्राम्हणों के पैरों में ही रहेगा,और दूसरा आपस में फूट डालकर एक की हत्या कराकर बाकी बचे लोगों को अपना गुलाम भी बना लिया,--बेशक ब्राम्हणवाद के गुलामी की मानसिकता आज अब भी अत्याधुनिक वैज्ञानिक सदी में भी अनवरत जारी है.
महाभारत युद्ध में कृष्ण की कुछ करतूतें जिनका जिक्र निम्नवत है.
1..जब सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा ने कृष्ण के मित्र सात्यिक को बहुत हैरान परेशान किया तो कृष्ण ने अर्जुन को प्रेरणा दी कि वह भूरिश्रवा के हाथ काट डाले,जिसे अर्जुन ने अंजाम दिया.और भूरिश्रवा के हाथ काट डाले.
2..जब सात- सात कौरव योद्धाओं ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को घेरकर मार डाला था,तब अर्जुन ने जयद्रथ को सूर्यास्त के पहले मार डालने की कसम खाई थी,और यह भी वादा किया कि अगर वह ऐसा न कर पाया तो आग में जलकर खुद मर जाएगा,पर इन्तजार करने के बाद भी उसे जयद्रथ नहीं मिला तब कृष्ण ने एक युक्ति के द्वारा सूर्यास्त के पहले ही सूर्य को ढकने का इंतजाम किया सूर्यास्त समझकर जयद्रथ बाहर आया तो कृष्ण ने सूर्य को खुला कर दिया ऐसे में जयद्रथ जब तक कुछ समझ पाता अर्जुन ने उसकी हत्या कर दी.
3..महाभारत युद्ध में धार्मिक विधि से कभी भी द्रोणाचार्य को मार सकने की संभावना से निराश होकर कृष्ण ने पांडवो को सलाह दी कि जैसे भी हो वे द्रोण को मार डालें अन्यथा पांडवों की पराजय निश्चित है,उसके लिए कृष्ण ने एक उपाय सुझाया कि यदि द्रोणाचार्य के किसी भी तरह शस्त्र छुड़वाए जा सकें तो उन्हें मारना आसान होगा,भीम को युक्ति सूझी उसने द्रोणाचार्य के पुत्र अस्वतथामा के नाम के हाथी को मार डाला और द्रोणाचार्य को सुचना भिजवाई कि अश्वतथामा मारा गया,खबर सुनकर द्रोणाचार्य कुछ हतोत्साहित हुआ पर उसे भरोषा नही हुआ उन्होंने खबर की पुष्टि के लिए युधिस्ठिर से पूछा,युद्धिष्ठिर ने सच बोलने में हिचकिचाहट दिखाई तो कृष्ण ने युद्धिष्ठिर को लंबा चौड़ा भाषण दिया और उसे सच बोलने के लिए कहा पर जैसे ही युधिष्ठिर ने बोलना चालू किया "कि हां अश्वत्थामा मारा गया,"लेकिन हाथी" युद्धिष्ठिर ने जैसे ही लेकिन "हाथी बोला" तत्क्षण कृष्ण ने जोर का शंखनाद किया जिससे द्रोणाचार्य "अश्वत्थामा मारा गया" तो सुन पाये लेकिन कृष्ण के शंखनाद में आखिरी के शब्द "लेकिन हाथी"नहीं सुन पाये,उन्होंने पुत्र वियोग में अपने शस्त्र डाल दिए,और ध्यान लगाकर जमींन पर बैठ गए,उसी समय अर्जुन ने मौके का फायदा उठाकर निहत्थे द्रोणाचार्य की हत्या कर दी.
4..जिस समय द्वेपायन जलाशय पर भीम और दुर्योधन की लड़ाई चालू थी, पर भीम को कोई सफलता नहीं मिली उस समय कृष्ण ने भीम को बताया कि दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करे,"जबकि नाभि के नीचे अपने किसी भी विरोधी पर प्रहार करना किसी भी युद्ध में धर्म विरुद्ध माना जाता था"लेकिन कृष्ण ने भीम को उकसाया कि वह सबकुछ भूलकर दुर्योधन की जंघा पर ही प्रहार करे,भीम ने वैसा ही किया जिसका अंदाजा दुर्योधन को नहीं था फलस्वरूप दुर्योधन -कृष्ण और भीम के छल से मारा गया.
अब उपरोक्त तथ्यों से यह साबित होता है कि कृष्ण ने हमेसा छल कपट और धोखे का ही सहारा लिया और लोगों को आपस में लड़ाया और उनकी हत्याएं कराईं,..अब आप खुद आंकलन कीजिये क्या किसी को भी इन्ही अवगुणों के आधार पर भी भगवान् की श्रेणी में रखा जा सकता है..नहीं..न....फिर भला कैसे ऐसे चल कपटी और धोखेबाज को भगवान् बनाकर ढोया जा सकता है आप खुद सोचिये.
कृष्ण की मृत्यु खुद कृष्ण की नैतिकता पर काफी प्रकाश डालती है,कृष्ण खुद द्वारका नरेश बनकर मरे थे,यह द्वारका कैसी नगरी थी और किस प्रकार की मृत्यु कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी...?
द्वारका नगरी की स्थापना कृष्ण ने कुछ ऐसी की थी कि जिसमे कृष्ण ने इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि उसमें "अभागिनों" को हजारों की संख्या में बसाया जा सके,हरिवंश पुराण में लिखा है कि हे वीर बहादुर यादवों की सहायता से दैत्यों के घर जीत चुकने के अनंतर कृष्ण ने हजारों वरांगनाओं को द्वारका नगरी में बसाया,द्वारका नगरी में आदमियों,विवाहित स्त्रियों तथा वैश्याओं द्वारा नाचे जाने वाले नृत्य और गाये जाने वाले गीतों की बहुत भरमार थी,अक्सर ऐसे आयोजनों और मंडलियों के नायक कृष्ण और बलराम ही हुआ करते थे,इस प्रकार के उत्सव हर रोज की दिनचर्या थी पर इनमें हर रोज प्रयोग होने वाली शराब ने ही यादवों का संपूर्ण विनास भी कर दिया,हालांकि बाद में इस विनाशकारी शराब को पूरी तरह निषिद्ध कराया गया पर उसका भी कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला फलस्वरूप इन यादवों ने शराब के नशे में मस्त होकर एक दूसरे से झगड़ा करना और मारकाट शुरू कर दी.
कहते हैं यादवों के बच्चों ने एकबार किसी ऋषि के साथ कोई बचकाना मजाक कर दिया था,दरअसल लड़कों ने कृष्ण के एक पुत्र को औरत के भेष में तैयार किया और उसकी नाभि के नीचे लोहे का एक मूसल बाँध दिया और तब उन लड़कों ने ऋषियों से पूंछा कि यह औरत कैसी संतान को जन्म देगी जिससे क्रुद्ध होकर ऋषियों ने कहा कि यह औरत लोहे के एक ऐसे मूसल को जन्म देगी जो समस्त यादवों के विनास का मूल कारण बनेगा,लड़के घबरा गए तदनंतर उन लड़को ने उस मूसल को चूर चूर कर समुद्र के किनारे फेंक दिया जो चूर्ण सरकंडों के रूप में प्रकट हुआ,पर अंतिम बचा हुआ टुकड़ा जो लड़कों ने समुद्र में फेंक दिया था वह एक शिकारी को मिल गया जो शिकारी के तीर का अंतिम छोर बना अब यादवों ने इन्ही के तीरों से शराब के नशे में चूर होकर अपने आपको ख़तम करना शुरू कर दिया था.
"कृष्ण और यादवों के विनास का कारण"
पिछले अंक में आपने देखा कि यादवों ने किस तरह शराब के नशे में चूर होकर आपस में मारकाट मचाई हुई थी,इसी मारकाट में जब कृष्ण के अपने बच्चे भी मारे जाने लगे तो लड़ाई में अंत में कृष्ण भी सामिल होना पड़ा,और कृष्ण ने भी बहुत सारे लोगों को मार डाला,पर जब उन्हें बलराम का ख़याल आया ,ढूंढा तो देखा कि बलराम तो ध्यानरत हैं और देखा कि उसकी आत्मा एक सर्प ,शेषनाग की सक्ल में देह को त्याग रही है,कृष्ण को भी लगा कि सायद अब उसके भी यहाँ से प्रस्थान करने का समय निकट आ गया है,तब कृष्ण ने अपने पिता और पत्नियों से विदा ली,और उन्हें बताया कि उसने अर्जुन को बुलाया है जो उनकी जिम्मेदारियां निभाएगा.
जाकर कृष्ण एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गए जिसकी शाखाओं ने कृष्ण के शरीर को पूरी तरह ढक दिया,और कृष्ण ध्यानमग्न हो गए,पर इसी अवस्था में एक शिकारी ने उन्हें कोई हिरन समझकर एक तीर मारा जिसका सिरा उसी लोहे के मूसल के टुकड़े से बना था कृष्ण का उस तीर से काम तमाम हुआ.और तथाकथित भगवान कृष्ण एक मामूली शिकारी के तीर से मारे गए.
"ऐसे में क्या आपको लगता भी है कि कृष्ण कोई भगवान् भी थे"---हकीकत में यही तो है एक ब्राम्हण की कलम का कमाल--जिससे उसने समूचे भारत के मूलनिवासियों को वंचित कर रखा था.पर अब आपकी भी बारी है.और पता लगाइये कि वाकई में आपका भगवान कौन है...खैर...
उधर द्वारका में अर्जुन बहुत सारे लोगों के साथ द्वारका आया पर तब तक अर्जुन की भी अधिकतम सामर्थ्य जा चुकी थी,मौके का फायदा उठाकर यादवों ने लाठियों से अर्जुन के सारे सगे संबंधियों पर आक्रमण कर दिया और बहुत सारी उनकी औरतों को लूट लिया,अर्जुन बचे खुचे लोगों को लेकर वापस हस्तिनापुर आया,अर्जुन के विदा होने पर समुद्र ने द्वारका को पूरी तरह निगल लिया,जिससे यादवों के यश,उनके झगड़ों,और उनके मनमौजी जीवन की कहानी सुनाने के लिए भी कुछ भी अवशेष नहीं बचा था...
उपरोक्त कथानक से आप खुद आंकलन कीजिये और सच झूठ तथा कल्पनाओं और कहानियों का अंदाजा खुद लगाइये कि ब्राम्हणों ने अपनी कलम की ताकत से किसको कितना कितना ढेर किया उन्होंने दिखा दिया कि एक कलम की ताकत किसी सामान्य इंसान को भी किस तरह जानवरों की जिंदगी जीने के लिए भी मजबूर कर सकती है और किस तरह एक आम इंसान को भगवान् की श्रेणी में भी ला खड़ा कर सकती है,पर हर तरह से खात्मा दोनों ही दशाओं में करने की अभूतपूर्व क्षमता इस कलम में है..पर अब इन काल्पनिक किस्से कहानियों से ऊपर उठकर खुद के समग्र विकास की अब आपकी बारी है..
"डा.बी.आर.अम्बेडकर"-
-हिन्दू धर्म की रिडल्ज-पृष्ठ-152-
153-154-155-156-157-158
धन्यवाद.जय भीम नमों बुद्धाय
"मिशन अम्बेडकर"
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
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डॉ. आंबेडकर और मिथकीय धर्मशास्त्र
लेखक कंवल भारती बता रहे हैं हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित मिथकों के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर के अध्ययन के बारे में। अपने अध्ययन में डॉ. आंबेडकर गीता को बुद्ध द्वारा जाति उन्मूलन के प्रयास के विरोध में रचित पाते हैं। साथ ही वे राम-कृष्ण के चरित्र के बारे में कहते हैं कि ये दोनों कोई आदर्श पुरूष नहीं थे और न ही ये देवता थे
वेंडी डोनिजर[1] के शब्दों में, मिथक को एक कहानी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसे लोग बड़े पैमाने पर, यह जानते हुए भी कि यह सच नहीं है, मानते हैं। असल में, मिथक की भावना पर्दे के पीछे होती है, जिस पर आदमी ध्यान नहीं देता है। उन्होंने एक उदाहरण देकर बताया है कि जब हम इस तरह का पाठ पढ़ते हैं कि एक हिन्दू राजा ने आठ हजार जैनों को सूली पर चढ़ा दिया, तो इस मिथक को समझने के लिए हमें इतिहास के प्रयोग की जरूरत है। अगर हमने यह बात समझ ली कि यह पाठ क्यों लिखा गया, तो जान जायेंगे कि उस समय हिन्दुओं और जैनों के बीच तनाव था।[2] लेकिन हम मिथक का उपयोग पाठ के पीछे के वास्तविक इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए नहीं कर सकते, और हम इस पाठ को जैनों के प्रति हिन्दू राजा की क्रूरता का साक्ष्य भी नहीं कह सकतेI इसी तरह जब हम रामायण में राक्षसों के बारे में पढ़ते हैं, (कि राम ने राक्षसों को मारा), तो वह लेखक का काल्पनिक संसार है, जिसमें वह शत्रु पक्ष के मनुष्यों के लिए ख़ास शब्दावली का प्रयोग करता है। विचारों का इतिहास, भले ही ‘कठिन’ इतिहास का स्रोत न हो, फिर भी बहुत कीमती चीज है। क्योंकि, कहानियां और कहानियों में विचार भविष्य में इतिहास को दूसरी दिशा में प्रभावित करते हैं।
जॉन के. ने मिथक को ‘इतिहास का धुँआ’ कहा है, और वेंडी डोनिजर लिखती हैं कि जब मिथक ऐतिहासिक घटनाओं का जवाब नहीं देते, तो वे आग बन जाते हैं।[3] इसलिए मिथक वे कहानियां हैं, जो ऐतिहासिक न होते हुए भी इतिहास का पता देती हैं। दूसरे शब्दों में, भले ही मिथक इतिहास नहीं हैं, परन्तु उनमें इतिहास का गूढ़ रहस्य है। वेंडी डोनिजर ने हिन्दू मिथकों पर अच्छा काम किया है, और उसे एक वैकल्पिक इतिहास का नाम दिया है। पर परदे के भीतर का इतिहास या मिथकों का गूढ़ार्थ उस वैकल्पिक इतिहास में कहीं नज़र नहीं आता है।
किन्तु, प्राचीन भारत के वैकल्पिक इतिहास या मिथकों के गूढ़ार्थ का चित्रण डॉ. आंबेडकर के मिथकीय चिंतन में बेहतर ढंग से उभर कर आया है। उन्होंने ‘प्राचीन भारत की शवपरीक्षा’[4] निबन्ध में लिखा है, ‘प्राचीन इतिहास का अधिकांश इतिहास कोई इतिहास ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि प्राचीन भारत का कोई इतिहास नहीं है। वह है, लेकिन उसने अपना चरित्र खो दिया है। वे कहते हैं कि उसे महिलाओं और बच्चों को खुश करने के लिए पौराणिक कथाएँ बना दिया गया है और ऐसा लगता है कि ब्राह्मणवादी लेखकों द्वारा यह काम जानबूझकर किया गया है।‘
वे ‘देव’ शब्द का उदाहरण देते हैं, और पूछते हैं, इसका क्या अर्थ है? क्या यह शब्द मानव परिवार के सदस्य का प्रतिनिधित्व करता है? वे जवाब देते हैं कि इस शब्द को किसी अलौकिक संस्था के अर्थ में प्रदर्शित करके इतिहास का ही रस निचोड़ लिया गया है। वे कहते हैं कि देव के साथ ही यक्ष, गण, गंधर्व और किन्नर के नाम भी पाए जाते हैं। वे कौन लोग थे? डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि महाभारत और रामायण को पढने से यह धारणा बनती है कि वे काल्पनिक प्राणी हैं, पर, डॉ. आंबेडकर उन्हें काल्पनिक प्राणी नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि यक्ष, गण, गंधर्व और किन्नर ये सभी मानव परिवार के सदस्य थे, जो देवों की सेवा में रहते थे।[5]
इसी तरह, डॉ. आंबेडकर कहते हैं, “रामायण और महाभारत में असुरों के बारे में लिखा है कि वे अमानव संसार से थे। एक असुर दस गाड़ियाँ भरकर खाना खाता था। वे विशालकाय राक्षस थे, जो छह महीने तक सोते थे, और उनके दस मुंह होते थे, इत्यादि। राक्षस का वर्णन भी अमानव प्राणी के रूप में किया गया है। उन्हें भी आकार, खाने की क्षमता, तथा जीवन की आदतों में असुरों के समान बताया गया है। नागों के बारे में भी बहुत कुछ ऐसा ही कहा गया है। उन्हें सांप बताया गया है।“
डॉ. आंबेडकर सवाल करते हैं कि क्या यह सच हो सकता है कि वे सांप थे? लेकिन हिन्दू अब भी नाग जाति को सांप से जोड़ते हैं। डा. आंबेडकर कहते हैं कि “इसे समझने के लिए प्राचीन भारतीय इतिहास को समझना होगा। पर, प्राचीन भारतीय इतिहास के मलबे में से भी सच्चाई को बौद्ध साहित्य की मदद से खोजा जा सकता है, जिसे ब्राह्मण लेखकों ने विक्षिप्त बना दिया है।“
उनके अनुसार, ‘बौद्ध साहित्य बताता है कि देव या देवता एक मानव समुदाय था। बहुत से देव अपनी शंकाओं के निवारण के लिए बुद्ध के पास जाते थे। तब यह कैसे हो सकता है कि देव मानव प्राणी न हों।’
आगे, डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि ‘बौद्ध साहित्य से नागों की गर्भ-जनित नागों और डिम्ब-जनित नागों की गुत्थी भी सुलझ जाती है, जिससे पता चलता है कि नाग शब्द के दो अर्थ हैं। पर मूल अर्थ में वह मानव समुदाय का नाम है।’ वे कहते हैं कि बौद्ध साहित्य असुरों को भी राक्षस नहीं मानता हैं। वे भी उसके अनुसार विशिष्ट मानव प्राणी हैं। डॉ. आंबेडकर लहते हैं, ‘सत्पथ ब्राह्मण’ में असुर को प्रजापति (सृष्टा) का वंशज बताया गया हैं। फिर वे दुष्टात्मा कैसे बन गए, इसका पता नहीं चलता। लेकिन इस तथ्य का उल्लेख मिलता है कि असुरों ने पृथ्वी पर आधिपत्य के लिए देवों से युद्ध किया था, जिसमें वे देवों से पराजित हो गए थे और उनके अधीन हो गए थे। इससे यह साफ़ हो जाता है कि देव मानव परिवार के सदस्य थे और राक्षस नहीं थे।‘[6]
डॉ. आंबेडकर के मिथकीय चिन्तन पर आगे बढ़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि उन्होंने मिथकीय ज्ञान को अलग धर्मशास्त्र माना है। उनके अनुसार, प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक रूप से दो धर्मशास्त्रों की बात की जाती रही है। उनमें एक है, मिथकीय धर्मशास्त्र और दूसरा है, नागरिक धर्मशास्त्र। यूनानियों ने दोनों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया है। पौराणिक धर्मशास्त्र से उनका तात्पर्य काल्पनिक देवी-देवताओं की कहानियों से है, जबकि, नागरिक धर्मशास्त्र में, उनके अनुसार, राजकीय पंचांग के विभिन्न पर्वों के उपवासों का ज्ञान और उनके लिए उपयुक्त अनुष्ठान शामिल होते हैं।[7] डॉ. आंबेडकर ने मिथकीय धर्मशास्त्र के अंतर्गत हिन्दू धर्मशास्त्र के मिथकों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया है, जो भारतीय चिन्तन के इतिहास में एक मौलिक काम है और आवश्यक भी। उन्होंने अपने अध्ययन में अनेक मिथकों और धर्मशास्त्रों का पुनर्पाठ किया है, जिनमें वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, देवी-देवता, कलियुग और संकर जातियों पर उनका प्रखर चिन्तन अनेक ऐतिहासिक रहस्यों का उद्घाटन करता है।
पहले गीता पर उनके चिन्तन को लेते हैं। गीता की कथा निश्चित रूप से काल्पनिक है, पर वह स्वयं एक ग्रन्थ के रूप में मौजूद है। डॉ. आंबेडकर उसे प्रतिक्रांति का धर्मशास्त्र मानते हैं, जो बुद्ध की क्रान्ति के विरुद्ध रचा गया है। उनका निष्कर्ष है कि ब्राह्मणों का सम्पूर्ण मिथकीय साहित्य पुष्यमित्र की राजनीतिक विजय के बाद की घटना है। उनके अनुसार, पुष्यमित्र के काल में छह प्रकार का साहित्य लिखा गया— (1) मनु स्मृति, (2) गीता, (3) शंकराचार्य का वेदांत, (4) महाभारत, (5) रामायण, और (6) पुराण। वे लिखते हैं कि बौद्ध धर्म के पतन का कारण यही ब्राह्मण साहित्य है।[8]
गीता में कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है। कृष्ण कौन है? डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि गीता में इसके अनेक जवाब हैं। आरम्भ में वह एक मनुष्य के रूप में दिखाई देते हैं, जो अर्जुन का रथ चलाते हैं। कर्म से वह योद्धा हैं। फिर वह मनुष्य से महामानव बनकर युद्ध निर्देशक और उसके भाग्य नियंत्रक की भूमिका में अग्रसर होते हैं। उसके बाद वह ईश्वर का रूप धारण कर लेते हैं और ईश्वर की तरह ही बोलने भी लगते हैं। ईश्वर के रूप में भी गीता में कृष्ण के कई रूप हैं, जैसे– वासुदेव (10/37), भगवान (10/12), वामन अवतार (10/21), शंकर अवतार (10/23), ब्राह्मण (15/15) इत्यादि।[9]
डॉ. आंबेडकर कृष्ण की शिक्षा पर सवाल उठाते हैं। कहा जाता है कि गीता मानव आत्मा की मुक्ति की शिक्षा देती है, जिसके तीन मार्ग हैं— ज्ञान मार्ग (2/39), कर्म मार्ग (5/2) और भक्ति मार्ग (9/14)। किन्तु, डॉ. आंबेडकर गीता की सम्पूर्ण शिक्षा का खंडन करते हुए कहते हैं कि अगर कोई भगवदगीता को धर्म या दर्शन का शास्त्र कहकर स्वयं खुश होना चाहता है, तो हो सकता है, परन्तु वास्तव में भगवद्गीता न धर्मशास्त्र है और न ही दर्शनशास्त्र है।[10]
वे कहते हैं कि कृष्ण केवल युद्ध और युद्ध में मरने वालों के पक्ष का सिद्धांत खड़ा करते हैं, जिसे दर्शन का नाम दे दिया गया है। इस सिद्धांत की पहली पंक्ति यह है कि संसार क्षणभंगुर है और मनुष्य नश्वर है, और दूसरी पंक्ति यह है कि शरीर और आत्मा दोनों अलग-अलग हैं। शरीर नष्ट हो जाता है, पर आत्मा नष्ट नहीं होती है, वह अमर रहती है। उसे हवा सुखा नहीं सकती, आग जला नहीं सकती और हथियार उसे काट नहीं सकता।[11]
डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में गीता का यह दूसरा सिद्धांत ब्राह्मणों की वर्णव्यवस्था की दार्शनिक पुष्टि करना है, जिसके अनुसार, वर्णव्यवस्था ईश्वर द्वारा बनाई गई है, इसलिए पवित्र है। गीता (4/13) में वर्णव्यवस्था का सिद्धांत जन्मजात है।[12]
गीता का तीसरा सिद्धांत, डॉ. आंबेडकर की दृष्टि में, कर्म मार्ग है, जिसका अर्थ मोक्ष के लिए यज्ञ आदि संपन्न करना है। उनके अनुसार, कृष्ण कर्मकांड के समर्थन में कहते हैं कि यदि व्यक्ति स्थित प्रज्ञ हो जाए, तो कर्मकांड करने में कोई बुराई नहीं है।[13] वे गीता के कर्मयोग और ज्ञानयोग को भी ‘काम’ और ‘ज्ञान’ के अर्थ में नहीं लेते हैं, जैसा कि बहुत से ब्राह्मण विद्वान् उसका यही अर्थ करते हैं। उनके अनुसार, कर्मयोग से काम और ज्ञानयोग से ज्ञान का अर्थ निकलना गलत है, बल्कि उनके अनुसार, कर्मयोग से आशय जैमिनी के कर्मकांड से और ज्ञानयोग से आशय बादरायण के ब्रह्मसूत्र से है, जिन्हें उन्होंने कर्मयोग और ज्ञानयोग के रूप में पुनर्जीवित करने का काम किया है।[14]
डॉ. आंबेडकर अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि गीता ने बौद्ध धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रान्ति का काम किया था। बुद्ध ने अहिंसा को स्थापित किया था और वर्णव्यवस्था तथा यज्ञ आदि कर्मकांडों का खंडन किया था। इसी के विरुद्ध गीता हिंसा, वर्णव्यवस्था और कर्मकांडों का समर्थन करती है।[15]
डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि यद्यपि गीता ने हिंसा, वर्णव्यवस्था और कर्मकांड के विचारों को दार्शनिक कवच पहिनाकर प्रतिक्रान्ति का बचकाना प्रयास किया है, तथापि, इसमें संदेह नहीं कि गीता ने प्रतिक्रान्ति को पुनर्जीवित किया है, और यदि यह अगर प्रतिक्रान्ति आज भी जीवित है, तो गीता के कारण ही जीवित है।[16]
डॉ.आंबेडकर का मत है कि गीता भले ही महाभारत का अंग है, पर दोनों की रचना एक ही समय में नहीं हुई है। यह बात महाभारत और गीता में कृष्ण की तुलनात्मक स्थिति से साफ़ हो जाती है। महाभारत में कृष्ण एक मनुष्य हैं, भगवान् नहीं हैं। जबकि गीता में कृष्ण सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। आंबेडकर के अनुसार, महाभारत में लोग कृष्ण को पहला स्थान देने के लिए भी तैयार नहीं थे। राजसूय यज्ञ के समय जब युद्धिष्ठिर ने कृष्ण को अतिथि का सम्मान देना चाहा, तो कृष्ण के ही निकट सम्बन्धी शिशुपाल ने न केवल कृष्ण का विरोध किया था, बल्कि उसे नीच, चरित्रहीन और षड्यंत्रकारी जैसे अपशब्द कहकर अपमानित भी किया था।[17]
इससे डॉ. आंबेडकर इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि कृष्ण का ईश्वर-रूप महाभारत की रचना के बाद गढ़ा गया था। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘रिडिल्स इन हिन्दुइज्म’[18] (हिन्दू धर्म में पहेलियाँ) में, जो मिथकीय हिन्दू धर्मशास्त्र की मान्यताओं पर सवालिया निशान लगाता है, कृष्ण के व्यक्तित्व पर अलग से विचार किया है। वे अपने अध्याय की शुरुआत इस प्रश्न से करते हैं कि कौरवों और पांडवों के युद्ध की कथा में कृष्ण मुख्य पात्र कैसे हो सकते हैं, जबकि कृष्ण कौरवों और पांडवों के समकालीन ही नहीं थे? वे एक और सवाल उठाते हैं कि ‘कृष्ण पांडवों के मित्र थे, जिनका अपना साम्राज्य था। उनकी शत्रुता कंस से थी और कंस का भी अपना साम्राज्य था। तब क्या एक ही समय में एक ही भूमि पर दो साम्राज्य हो सकते हैं। दूसरे, इन दोनों साम्राज्यों के बीच किसी भी तरह के टकराव का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। क्या ऐसा हो सकता है।’
वे लिखते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि व्यास ने, जो महाभारत के रचयिता माने जाते हैं, कृष्ण का महिमा-मंडन करने के लिए कृष्ण और कौरव-पांडवों की दो अलग-अलग कहानियों को जबरदस्ती गढ़कर एक में जोड़ दिया है?’[19]
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि व्यास ने कृष्ण को मनुष्यों में ईश्वर की संज्ञा प्रदान करने का प्रयास किया था। पर क्या कृष्ण ईश्वर कहे जाने की योग्यता रखते हैं? वे कहते हैं कि इसका सही उत्तर उनके जीवनवृत्त से ही मिल सकता है। कृष्ण का जीवन वृत्त क्या है? डॉ. आंबेडकर ने इसका विस्तार से वर्णन किया है, जिसमें कृष्ण के जन्म, उनके बालकाल के कारनामे, जिनमें कंस के द्वारा भेजे गए असुरों का वध, पूतना का वध, तीन माह की उम्र में शकट की गाड़ी को ठोकर मारकर तोड़ना, अर्जुन नामक दो यक्षों को मुक्त करना, वृत्तासुर, बकासुर, अद्यासुर, भीमासुर और शंखासुर का वध, कालिया नाग का दमन, स्त्रियों का चीर हरण, गोपियों के साथ रासलीला, छल से कंस का वध, कंस के धोबी का वध, कुब्जा को सौन्दर्य प्रदान करके उसके साथ यौन क्रीड़ा, रुकमणि, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिंदी, मित्रविन्दा, सत्य, भद्र और लक्ष्मण आदि से विवाह के अतिरिक्त उनकी अन्य सहस्त्र पत्नियों, राधा से प्रेम-प्रसंग, शिशुपाल की हत्या, और ब्राह्मण के पैर धोने से लेकर व्याध द्वारा उनकी मृत्यु तक की घटनाएँ दर्ज हैं।[20] वे इस जीवनवृत्त के प्रकाश में सवाल छोड़ते हैं कि क्या इस तरह के चरित्र वाले व्यक्ति को एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की संज्ञा प्रदान की जा सकती है?
कृष्ण और राम दो ऐसे पौराणिक देवता हैं, जिनकी प्रतिष्ठा ब्राह्मणों ने हिन्दुओं के आराध्य देव—विष्णु के अवतार के रूप में की है। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि (कृष्ण की तरह) राम की कथा में भी ऐसा कुछ नहीं है, जो उन्हें ईश्वर के रूप में पूज्य बनाता है।[21] वे पहला सवाल राम के जन्म पर ही खड़ा करते हैं। दशरथ निसंतान थे। उन्हें अपने उत्तराधिकारी के लिए एक पुत्र की जरूरत थी। उन्होंने जब यह देखा कि उनकी तीनों रानियों में से किसी के कोई पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ, तो उन्होंने ऋषि श्रृंग को बुलवाकर यज्ञ करवाया, जिसमें बलि दी गई। और पिंड तैयार किया गया। वह पिंड तीनों रानियों को खिलाया गया। पिंड के प्रभाव से रानियाँ गर्भवती हुईं, और उनसे चार पुत्र पैदा हुए—कौशल्या से राम, कैकेयी से भरत, तथा सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न।[22] डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, ‘राम का जन्म एक चमत्कारपूर्ण घटना है और यह कहना कि उनका जन्म ऋषि श्रृंग द्वारा तैयार किए गए पिंड से हुआ था, इस नग्न सत्य को ढकने के लिए एक आलंकारिक आवरण है कि राम का जन्म कौशल्या और ऋषि श्रृंग के सहवास से हुआ था, जो हालाँकि पति-पत्नी नहीं थे। यह अगर अशोभनीय भी है और अनैतिक भी।’[23]
डॉ. आंबेडकर ने खुलासा किया है कि राम के जन्म के बाद राम के सहायकों के जन्म की कहानी भी अशोभनीय है। वाल्मीकि के अनुसार जब ब्रह्मा को यह ज्ञात हुआ की विष्णु ने राम के रूप में जन्म ले लिया है, तो उन्होंने सभी देवताओं को राम की सहायता के लिए शक्तिशाली सहायकों को पैदा करने का आदेश दिया। आदेश पाते ही वे सब सक्रिय हो गए। उन्होंने अप्सराओं को ही नहीं, यक्षों और नागों की कुंवारी कन्याओं एवं रुक्ष, विद्याधर, गन्धर्वों, किन्नरों और वानरों की वैधानिक रूप से विवाहित पत्नियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाया और उनसे राम के सहायकों को पैदा किया। डॉ. आंबेडकर टिप्पणी करते हैं कि राम के जन्म को अगर छोड़ भी दें, तो उनके सहायकों का जन्म भी एक अवैधानिक सहवास का घिनौना रूप है।[24]
डॉ. आंबेडकर ने राम के विवाह की भी आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि बौद्ध रामायण के अनुसार राम और सीता भाई-बहिन और दशरथ की संतान थे। वाल्मीकि रामायण इससे सहमत नहीं है। वाल्मीकि के अनुसार सीता विदेह नरेश जनक की पुत्री थी। राम की बहिन नहीं। फिर भी सीता जनक की स्वाभाविक पुत्री नहीं थी, बल्कि उसे एक किसान ने अपने खेत में हल चलाते समय पाया था, जिसे उसने जनक को सौंप दिया था। इसलिए सीता को जनक की पुत्री सतही अर्थ में कहा जा सकता है। बौद्ध रामायण की कहानी स्वाभाविक है, और आर्यों के तत्कालीन विधान में भाई-बहिन के विवाह धर्मसंगत थे। इस दृष्टि से डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि यदि यह कहानी सत्य है, तो राम का विवाह कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं करता है।[25]
राम का एक गुण यह बताया जाता है कि वह एक पत्नीव्रती थे। डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि यह धारणा सामान्य जनों में किस तरह फैली, समझ से परे है। पर उनके अनुसार, इस धारणा का कोई तथ्यपूर्ण आधार नहीं है, क्योंकि वाल्मीकि ने भी राम की अनेक पत्नियों का उल्लेख किया है, और वे पत्नियाँ भी अनेक रखैलों के अतिरिक्त थीं। वे कहते हैं कि इस प्रकार राम सही मायने में अपने पिता दशरथ के आदर्श पुत्र थे, जिनकी तीन पत्नियों के अतिरिक्त भी बहुत सी स्त्रियाँ थीं।[26]
डॉ. आंबेडकर ने, एक व्यक्ति और एक राजा के रूप में, राम के जीवन के दो कारनामों की विशद चर्चा की है. उनमें एक है, बालि का वध और दूसरा है सीता का निष्कासन। बालि प्रकरण पर डॉ. आंबेडकर लिखते हैं, ‘निहत्थे और निरपराध बालि की छिपकर हत्या करना राम के चरित्र पर महानतम काला धब्बा है, जिसे किसी भी तर्क से उचित सिद्ध नहीं किया जा सकता। बालि निहत्था था, अत: उसके ऊपर शस्त्र से प्रहार करना और वह भी कायरतापूर्वक छिपकर, अपराध है तथा यह अपराध तब और भी भयंकर हो जाता है, जब यह पता चलता है कि राम की बालि से कोई दुश्मनी नहीं थी। इसलिए राम का यह कार्य जघन्य और क्रूर हत्या का नियोजित मामला लगता है।’[27]
सीता का मामला भी विचारणीय है। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, ‘रावण के वध के बाद राम का पहला मानवीय कर्तव्य सीता के पास स्वयं पहुंचना था, जो उन्होंने नहीं किया। इसके बजाए उन्होंने रावण की अंत्येष्टि और विभीषण का राज्याभिषेक कराने में ज्यादा रूचि ली। राज्याभिषेक के संपन्न हो जाने के बाद भी वह सीता के पास स्वयं न जाकर हनुमान को भेजते हैं। वह भी सीता को बुलाने के लिए नहीं, बल्कि यह सन्देश देने के लिए कि ‘हम लक्ष्मण और सुग्रीव सहित सकुशल हैं और रावण का वध हो चुका है।’ सीता स्वयं हनुमान के समक्ष राम से मिलने की इच्छा प्रकट करती है। पर राम सीता के पास नहीं जाते हैं, जो अपहरण के बाद दस महीने से रावण की कैद में थी। इसके बाद जब सीता को राम के पास लाया जाता है। तो राम सीता से जिस तरह का व्यवहार करते हैं, वैसा व्यवहार इन परिस्थितियों में कोई साधारण आदमी भी अपनी पत्नी के साथ नहीं करेगा। राम सीता से कहते हैं, ‘मैं यहाँ रावण का वध कर अपने अपमान को धोने आया था। मैंने यह सारा कार्य तुम्हारे लिए नहीं किया। क्या सीता के प्रति राम का इससे भी अधिक क्रूर व्यवहार हो सकता है?’[28]
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि राम यहीं नहीं रुके, बल्कि आगे उन्होंने सीता के चरित्र पर भी संदेह किया और कहा कि अब वह स्वतंत्र है, कहीं भी जा सकती है। इस पर सीता बिल्कुल स्वाभाविक रूप से राम को नीच और दुष्ट कहते हुए कहती है कि अगर हनुमान के द्वारा पहले ही यह खबर दे दी होती कि अपहरण के कारण उसे त्याग दिया गया है, तो उसने आत्महत्या करके इस संकट से मुक्ति पा ली होती। डॉ. आंबेडकर बताते हैं कि इसके बाद सीता अग्नि परीक्षा देती है, और देवतागण उसे पवित्र घोषित करते हैं। तब राम संतुष्ट हो जाते हैं और सीता को साथ लेकर अयोध्या वापिस चले जाते हैं।[29]
डॉ. आंबेडकर के अनुसार, अयोध्या में राम अपनी पत्नी सीता के साथ और भी बुरा व्यवहार करते हैं। वह सीता को गर्भवती पाते हैं। राम को भद्र से सूचना मिलती है कि लोगों में यह अफवाह फैली हुई है कि सीता रावण की लंका में रहकर गर्भवती हुई है। इससे राम विचलित हो गए। राम ने अपने भाइयों को बुलाकर अपनी मनोव्यथा से अवगत कराया और कहा कि वह इस कलंक को सहन नहीं कर सकते। मर्यादा और सम्मान के लिए वह तुम लोगों का भी त्याग कर सकते हैं और सीता का त्याग करने में भी कोई संकोच नहीं करेंगे। डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि इससे प्रकट होता है कि सीता को त्यागने का सुगम मार्ग राम ने पहले ही खोज लिया था, ताकि जनता के आक्षेप से बच जाएँ। वह भी बिना सोचे समझे कि उनके द्वारा अपनाया गया मार्ग सही है या गलत। उन्होंने सीता के जीवन की भी चिंता नहीं की, केवल अपने ही नाम और ख्याति की चिंता की। राम ने अफवाह को शांत करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया, जबकि राजा की हैसियत से वह ऐसा कर सकते थे। किन्तु राम ने अपनी पत्नी को निर्दोष साबित करने के बजाए उसे लक्ष्मण के द्वारा गंगा के पार वन में छुड़वा दिया।[30]
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि वन में मरने के लिए छोड़ दी गई सीता को अगर वाल्मीकि आश्रय न देते, तो उसकी मृत्यु निश्चित थी। उस परित्यक्ता लाचार सीता को वाल्मीकि ने अपने आश्रम में शरण दी और वहीँ पर रहकर सीता ने अपने दो पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया। बारह वर्ष गुजर गए। वाल्मीकि ने रामायण लिखी और उसे सीता के दोनों पुत्रों को कंठस्थ करा दिया, जिसका वे गायन करने लगे। डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि आदर्श पति और पिता राम ने अयोध्या के समीपस्थ वन में बारह वर्ष तक न पत्नी की सुध ली और न बच्चों की।[31]
डॉ. आंबेडकर आगे लिखते हैं कि ‘राम ने कभी राजा के रूप में काम नहीं किया। प्राचीन राजाओं की तरह उन्होंने न तो कभी प्रजा की शिकायतों को सुना और न कभी उनके निवारण का प्रयास किया। केवल एक ही घटना का वर्णन वाल्मीकि ने किया है, जब राम ने प्रजा की शिकायत को गंभीरता से सुना। पर खेद है कि यह अवसर अत्यंत दुखद सिद्ध हुआ। उन्होंने शिकायत के निवारण में तत्परता दिखाते हुए एक जघन्य अपराध कर डाला, जिसकी कोई मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। यह घटना ‘शूद्र शम्बूक की हत्या’ के नाम से कुख्यात है। ऐसे थे राम।’[32]
‘रिडिल्स इन हिन्दूइज्म’ में डॉ. आंबेडकर ने राम और कृष्ण पर चर्चा के अतिरिक्त और भी बहुत से मिथकों पर मानव मन को उद्वेलित करने वाले सवाल उठाए हैं। यहाँ हम वर्णसंकर जातियों की मनु की ब्राह्मणवादी व्याख्या पर चर्चा करेंगे, जिसे डॉ. आंबेडकर ने ‘मनु का पागलपन’ कहा है। वे लिखते हैं कि मनु स्मृति का कोई भी पाठक इस बात को जानता है कि मनु ने अनेक जाति-समूहों की चर्चा की है— जैसे, आर्य जातियां, अनार्य जातियां, व्रात्य जातियां, पथभ्रष्ट जातियां और संकर जातियां। डॉ. आंबेडकर मनु के हवाले से बताते हैं कि आर्य जातियां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं, जबकि अनार्य जातियों से मतलब उन समुदायों से है, जो चातुर्वर्ण को नहीं मानते हैं और जिन्हें दस्यु आदि कहा जाता है। व्रात्य जातियां, जो मनु के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों में थीं, वे हैं, जो एक समय चातुर्वर्ण में विश्वास करती थीं, परन्तु बाद में वे उसके विरुद्ध हो गईं थीं। संकर जातियां वे हैं, जिनके माता-पिता अलग-अलग वर्ण के हैं।[33]
संकर जातियों के भी मनु ने अनेक वर्ग बनाए हैं। (1) विभिन्न आर्य जातियों की संतानें, जिन्हें अनुलोम और प्रतिलोम वर्गों में विभाजित किया गया है, (2) अनुलोम और प्रतिलोम जातियों की संतानें और (3) अनार्यों तथा आर्यों की अनुलोम और प्रतिलोम जातियों की संतानें। डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि मनु ने जिन पांच जाति-वर्गों का उल्लेख किया है, उनमें से शुरू के चार वर्गों को तो आसानी से समझा जा सकता है, पर पांचवें संकर वर्ण के बारे में अनेक प्रश्न पैदा होते हैं, जिनका समाधान नहीं होता। उनके अनुसार मनु ने संकर जातियों की चर्चा करते समय व्रात्य और आर्य जातियों, व्रात्य तथा अनुलोम-प्रतिलोम जातियों एवं व्रात्य और अनार्य जातियों के बीच संयोग पर कोई विचार नहीं किया है। वे कहते हैं, ‘यही नहीं, मनु ने कुछ और भी गलतियाँ की हैं। उसने ब्राह्मण और क्षत्रिय के संयोग से कौन सी संकर जाति बनी, इसका भी कोई उल्लेख नहीं किया है। उसने यह भी नहीं बताया है कि इन दोनों से उत्पन्न जाति अनुलोम थी या प्रतिलोम? मनु इस मामले में असफल क्यों हुए? क्या यह माना जाए कि मनु के समय में ऐसी कोई संकर जाति पैदा ही नहीं हुई? या वह उसका उल्लेख करने से डरते थे? यदि ऐसा था, तो उसे किसका डर था?’[34]
डॉ. बी. आर. आंबेडकर
मनु ने अम्बष्ट, निषाद, सूत, उग्र, वैदेहक, मागध, चांडाल, आभीर, वैदेह, श्वपाक, चर्मकारक, आंध्र आदि अनेक जातियों को अलग-अलग जातियों के माता-पिता के संयोग से उत्पन्न जारज संतान माना है और उन्हें संकर जातियों की संज्ञा दी है। यहाँ डॉ. आंबेडकर ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि क्या संकर जातियों की उत्पत्ति के विषय में मनु की ये व्याख्याएं ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य हैं? उन्होंने मनु की कुछ संकर जातियों का ऐतिहासिक व्याख्या की है। वे आभीर का उदाहरण देते हैं, जिसे मनु ने ब्राह्मण पुरुष और अम्बष्ट स्त्री की संतान बताया है। वे कहते हैं कि आभीर एक चरवाहा जाति है, जिसका अपभ्रंश अहीर है। इतिहास से पता चलता है कि यह चरवाहा जनजाति थी, जो उत्तर-पश्चिम के निचले जिलों में सिंध तक बसी हुई थी। वे आगे कहते हैं कि आभीर एक स्वतंत्र जनजाति थी, और विष्णु पुराण इसका साक्षी है कि आभीरों ने अनेक वर्षों तक मगध पर शासन किया था।[35]
अम्बष्ट के बारे में, जो मनु के अनुसार ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री के मेल से उत्पन्न जारज संतान है, डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि अम्बष्ट निर्विवाद रूप से एक स्वतंत्र जनजाति थी, जो पातंजलि के अनुसार अम्बष्ट देश की वासी थी। उन्होंने लिखा है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत मेगस्थनीज ने उल्लेख किया है कि अम्बष्ट पंजाब की एक जनजाति थी, जिसने भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय सिकन्दर से युद्ध किया था।[36]
मनु ‘आन्ध्र’ को दूसरे दर्जे का वर्ण संकर मानता है, जिसकी उत्पत्ति वैदेहिक पुरुष और करवार स्त्री के समागम से हुई है। किन्तु, डॉ. आंबेडकर कहते हैं, इतिहास का साक्ष्य इसके बिल्कुल विपरीत है। उसके अनुसार आन्ध्र वे लोग हैं, जो देश के दक्कनी पठार के पूर्वी हिस्से में बसे हुए थे. वे कहते हैं कि आन्ध्र जाति का उल्लेख न सिर्फ मेगास्थनीज ने भी किया है, बल्कि प्लिनी द एल्डर (77 ई.) ने भी उनका एक शक्तिशाली जनजाति के रूप में उल्लेख किया है, जो दक्कन में अपनी भूमि पर सर्वोपरि शासन करते थे, और जिनके अधिकार में असंख्य गाँव थे, तीस दीवारों से घिरे नगर थे, जो चारों ओर से खाई-खंदकों से सुरक्षित थे, और जिनके राजा के पास विशाल सेना थी, जिसमें 1,00,000 पैदल सेना, 2,000 घुड़सवार सेना और 1000 हाथी थे।[37]
मागध को मनु ने वैश्य पुरुष और क्षत्रिय स्त्री की जारज संतान कहा है, पर आंबेडकर कहते हैं कि पाणिनि व्याकरण में मागध की व्युत्पत्ति मगध से हुई है। उसके अनुसार मागध वह है, जो मगधवासी है। वर्तमान में मगध का अर्थ बिहार के पटना और गया का क्षेत्र है। इसी प्रकार मनु ने निषाद को ब्राह्मण पुरुष और शूद्र स्त्री की जारज संतान बताया है। किन्तु डॉ. आंबेडकर ने इसका खंडन करते हुए लिखा है कि इतिहास के अनुसार निषाद भारत की मूल जनजाति है, जिसके अपने स्वतंत्र राजा होते थे। वैदेहक की व्युत्पत्ति भी आंबेडकर ने विदेह से मानी है, जो उनके अनुसार विदेह वासी था, जबकि मनु ने उसे वैश्य पुरुष और ब्राह्मण स्त्री की जारज संतान कहा है।[38]
डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि इन कुछ उदाहरणों से पता चलता है कि किस तरह मनु ने इतिहास को विकृत किया और सबसे सम्मानित और शक्तिशाली जनजातियों को जारज कहकर बदनाम किया। आंबेडकर कहते हैं कि यह एक पहेली है कि मनु ने संकर जातियों का प्रश्न क्यों उठाया और इसके पीछे उसका मकसद क्या था? आंबेडकर कहते हैं कि मनु ने शायद यह सोचा था कि चातुर्वर्ण व्यवस्था विफल हो गयी है, जिसका प्रमाण बड़ी संख्या में उन जातियों का अस्तित्व था, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र किसी वर्ण में नहीं आती थीं। और तब उसने चातुर्वर्ण से बाहर की उन जातियों की व्याख्या वर्ण-संकर जातियों के रूप में करने का विचार किया हो। किन्तु क्या मनु ने, डॉ. आंबेडकर कहते हैं, यह अनुभव नहीं किया कि उसने जो व्याख्या की है, वह कितनी भयानक है? उसने यह भी नहीं सोचा कि पुरुषों और विशेष रूप से उसके इस कृत्य ने महिलाओं के चरित्र को कितना कलंकित कर दिया है? आंबेडकर कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्त्री-पुरुषों के बीच गुप्त सम्बन्ध थे, पर वे इतने बड़े पैमाने पर कभी नहीं रहे होंगे कि उससे विशाल संख्या में चांडाल और अछूत जातियां पैदा हो गईं, जैसा कि मनु कहता है कि चांडाल जाति की उत्पत्ति शूद्र पुरुष और ब्राह्मण स्त्री के अवैध सम्भोग से हुई है। डॉ. आंबेडकर प्रश्न करते हैं कि क्या यह सच हो सकता है? वे आगे कहते हैं, अगर यह सच है तो इसका मतलब यह हुआ कि ब्राह्मण स्त्रियाँ बहुत ही चरित्रहीन रही होंगी और शूद्रों के प्रति उनका विशेष यौन-आकर्षण रहा होगा। वे कहते हैं कि यह अविश्वसनीय है, क्योंकि चांडालों की जनसंख्या इतनी अधिक है कि अगर प्रत्येक ब्राह्मण स्त्री भी एक शूद्र की रखैल रही होगी, तो भी इस देश में इतनी बड़ी संख्या में चंडाल नहीं हो सकते थे।[39] इस प्रकार डॉ. आंबेडकर ने मनु के वर्ण-संकर सिद्धांत को पागलपन का सिद्धांत कहा।
पौराणिक साहित्य में, जिस पर हिन्दू समाज की अटूट श्रृद्धा है, डॉ. आंबेडकर ने दो बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। एक त्रिमूर्ति के बारे में, और दूसरा देवियों के सम्बन्ध में। त्रिमूर्ति में तीन देवता शामिल हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव)। डॉ. आंबेडकर ने हिंदुत्व की दसवीं पहेली और उसके परिशिष्ट-3[40] में इस पर विस्तार से चर्चा की है। शिव के बारे वे लिखते हैं कि एक समय था, जब ब्राह्मणों ने शिव को देवता के रूप में पूजने से इनकार कर दिया था। उनके अनुसार दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ को शिव ने अपने गणों से ध्वस्त करा दिया था, जो शिव को यज्ञ विरोधी साबित करता है। इस पर और प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि ‘आर्यों और अनार्यों के बीच भिन्नता जातीय न होकर सांस्कृतिक थी। सांस्कृतिक भिन्नता दो कारणों से थी। एक, आर्य चातुर्वर्ण को मानते थे, और दो, वे यज्ञ में विश्वास करते थे। इसके विपरीत अनार्य न चातुर्वर्ण को मानते थे, और न यज्ञ में विश्वास करते थे। अत: दक्ष के प्रकरण से स्पष्ट होता है कि शिव एक अवैदिक और अनार्य देवता थे।‘[41]
यहाँ डॉ. आंबेडकर ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि वैदिक संस्कृति के स्तम्भ माने जाने वाले ब्राह्मणों ने एक अवैदिक और अनार्य शिव को अपना देवता क्यों बना लिया? लेकिन वे आगे कहते हैं कि हिन्दू इस बात को नहीं जानते हैं कि शिव अनार्य और अवैदिक देवता हैं, बल्कि वे उन्हें वैदिक देवता रूद्र के रूप में पहिचानते हैं, क्योंकि उनके लिए रूद्र वैसे ही हैं, जैसे शिव हैं( वे यह खुलासा करते हुए कि ‘यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता के एक मन्त्र में रूद्र या शिव को चोरों, लुटेरों, डकैतों के स्वामी के रूप में वर्णित किया गया है, जो पतितों, कुम्हारों और लोहारों के राजा हैं’, आश्चर्य प्रकट करते हैं कि ब्राह्मणों ने चोरों के सरदार को अपना सर्वोच्च देवता क्यों स्वीकार कर लिया?[42]
पूरे भारत में हिन्दू बिना किसी शर्म के लिंगपूजा करते हैं। किन्तु डॉ. आंबेडकर वैदिक स्रोतों के हवाले से यह स्थापित करते हैं कि लिंगपूजा का मूल सम्बन्ध विष्णु से है, शिव से उसका कुछ भी सरोकार नहीं है। वे आश्चर्य करते हैं कि आखिर पुराणों ने लिंगपूजा को शिव से जोड़ने का काम क्यों किया?[43]
देवियों के बारे में डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि पुराणों ने वैदिक देवताओं को सिंहासन से उतार कर नई पौराणिक देवियों को जन्म दिया, जो एक असामान्य घटना है। उनके अनुसार पौराणिक देवियाँ पांच हैं—सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा और काली। इनमें सरस्वती ब्रह्मा की और लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है, जबकि पार्वती, दुर्गा और काली शिव की पत्नियाँ हैं। वे कहते हैं कि सरस्वती और लक्ष्मी ने कोई युद्ध नहीं किया, जबकि शिव की दो पत्नियाँ दुर्गा और काली असुरों के साथ युद्ध करती है। वे सवाल करते हैं कि आखिर शिव की पत्नियों को ही असुरों से युद्ध करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, जबकि अनार्य देवता होने के कारण शिव की पत्नियाँ भी अनार्य थीं? उनका समाधान है कि ब्राह्मणों ने असल में वैदिक देवता रूद्र को, जिसका रूप-रंग शिव जैसा ही था, शिव बना दिया था। इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति में महेश और कोई नहीं रूद्र ही हैं। वे एक और रहस्योद्घाटन करते हैं कि ‘एक समय दैत्यों के राजा महिष ने देवताओं को हराकर भिखारियों की तरह पृथ्वी पर घूमने के लिए बाध्य कर दिया था। तब वे मदद के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव (रूद्र) के पास गए. पर वे कोई मदद नहीं कर सके। फिर विष्णु ने एक स्त्री को पैदा किया। जो दुर्गा का दूसरा नाम महामाया थी। उसने महिष का वध किया।‘ डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि कायर देवताओं में इतनी शक्ति कहाँ थी, जो वे अपनी पत्नियों को देते? अत: यह कहना कि देवियों में शक्ति थी, एक बड़ी विसंगति है (यह लेख पूर्ण नहीं है, क्योंकि डॉ. आंबेडकर के अध्ययन का क्षेत्र विशाल है।)
(संपादन : नवल)
संदर्भ :
[1] Wendy Doniger, The Hindus : An Alternative History, 2009, Penguin, p. 23.
[2] 12 वीं सदी में गुजरात में शैव राजा अजेय देव (1174-76) ने जैनों को यातनाएं देकर मारा था.
[3] वही, पृष्ठ 24.
[4] Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and Speeches, Vol. 3, (Ancient India on Exhumation)
Goverment of Maharashtra, 1987, p.151.
[5] वही.
[6] वही, पृष्ठ 152 (Ancient India on Exhumation)
[7] वही, पृष्ठ 7 (Philosophy of Hinduism)
[8] वही, (Literature of Brahminism), पृष्ठ 239
[9] वही, 264.
[10] वही, (Krishna and His Gita), पृष्ठ 361
[11] वही.
[12] वही.
[13] वही, पृष्ठ 362
[14] वही, पृष्ठ 363
[15] वही.
[16] वही, पृष्ठ 364.
[17] वही, 375
[18] वही, वाल्यूम 4, 1987, Riddles in Hinduism, Appendix 1.
[19] वही, पृष्ठ 333
[20] वही, पृष्ठ 333-343
[21] वही, 323
[22] वही.
[23] वही, 324
[24] वही, 325
[25] वही, 325
[26] वही.
[27] वही, 326
[28] वही, 327
[29] वही, पृष्ठ 327-28
[30] वही, पृष्ठ 329-30
[31] वही, पृष्ठ 330
[32] वही, पृष्ठ 331-332
[33] वही, रिडिल संख्या 18, पृष्ठ 215-16
[34] वही, पृष्ठ 220
[35] वही, 223
[36] वही
[37]वही.
[38] वही, पृष्ठ 324
[39] वही, पृष्ठ 325
[40] वही, पृष्ठ 71-79, तथा 161-175
[41] वही, पृष्ठ 163
[42] वही, पृष्ठ 164
[43] वही, पृष्ठ 166
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
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भारत में तथाकथित हिन्दू धर्म में यज्ञ को संस्कारो में बहुत ही महान बताया गया है जिसमे स्पस्ट रूप से बताया गया है कि यज्ञ से सीधे देवी देवताओं की अनुकम्पा प्राप्त होती है और इसी यज्ञ में हर तरह की बलि को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है.बताया गया है कि सभी अवसरों पर वैष्णवी तंत्र की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए,और सभी देवताओं के प्रति बलि दी जानी चाहिए ,यथा...
चंडिका तथा भैरवी के लिए पक्षियों की बलि,कछुओं की बलि,मगरमच्छों की बलि,मछलियों की,नौ प्रकार के जानवरों की बलि,भैंसों की,वृषभों की,बकरों की,जंगली सुवरों की,गैंडों की,बारहसिंघों की,ग्वाना पच्छी की,जंगली हिरनों की,शेरों की,चीतों की,और आदमियों की,तथा बलि चढाने वाले का अपना खून भी बलि के लिए योग्य है बलि देने से राजकुमारों को परमानंद स्वर्ग और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है.
इस तरह से कहा जा सकता है कि तथाकथित हिन्दू धर्म और उसके देवी देवता पूर्णतया हिंसा पर आधारित होते हैं ऐसे में मानवीयता की कल्पना सहज की जा सकती है...
तथाकथित हिन्दू धर्म में जीव हत्या को पाखण्ड और अंधभक्ति के सहारे डर और भय पैदा कर हत्याएं कर सुनियोजित दमन किया गया है.जैसा कि विदित हो बलि प्रथा देवी देवताओं को खुश कर पूण्य और परलोक सुधारने के उद्देश्य से किया जाता रहा है जैसे..
मछली और कछुवे की बलि चढाने से देवी एक माह तक प्रसन्न रहती है,मगरमच्छ की बलि चढाने से तीन महीने,जंगली जानवरों की बलि से नौ महीने,जबकि जंगली वृषभ का रक्त देवी को एक वर्ष तक खुश रखता है ,बारहसिंघे और जंगली सुवर का बलिदान बारह वर्षों तक देवी को प्रष्न रखता है ,सरभस का रक्त देवी को पच्चीस वर्षों तक खुस रखता है और भैसे का रक्त सौ वर्षों तक देवी को खुश रखता है,लेकिन शेर और आदमी का बलिदान देवी को ऐसी प्रसन्नता प्रदान करता है जो एक हजार वर्ष तक चलती है,इन जानवरों का मांस भी इतने ही दिनों तक देवी को प्रसन्नता प्रदान करता है जितना कि उनका रक्त,बारहसिंघों का मांस देवी को पांच सौ वर्षों तक प्रसन्नचित बनाये रखता है रोहित मछली की बलि काली को तीन सौ वर्षों तक प्रसन्न बनाये रखती है.ऐसी साफ़ बकरी जो चौबीस घंटो में केवल दो बार पानी पीती हो और जो बकरियों में श्रेष्ठ हो उसकी बलि देवताओं को दी जाने वाली श्रेष्ठ बलि मानी जाती है.ऐसा पक्षी जिसका कंठ नीला और सिर लाल तथा टाँगे काली हो उसकी बलि विष्णु को विशेष प्रिय है.
विधिवत दी गई नर बलि से देवी एक हजार साल तक प्रसन्न रहती है और तीन आदमियों की एक साथ बलि देने से देवी इक लाख वर्ष तक प्रसन्न रहती है.पवित्र धर्म ग्रंथों के पाठ द्वारा पवित्र बनाये गए रक्त की बलि अमृत के समान है सिर की बलि देने से चंडिका विशेष प्रसन्न होती है इसलिए जब भी विद्वजन बलि चढ़ाएं तो सिर और रक्त की ही बलि दें और जब यज्ञ करें तो उनके मांस की आहुति दें.
तथाकथित हिन्दू धर्म में देवी देवताओं को खुश रखने के लिए पशु,पक्षियों और इंसानों की बलि पर विशेष बल दिया गया है.और बताया गया है कि जो बलि देने वाला है उसे इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि देवी को खराब रक्त और मांस न चढ़ाया जाय अन्यथा देवी नाराज हो सकती है.कच्ची पक्की शराब देवी को उतने ही समय के लिए खुश रखती है जितने समय के लिए बकरी का बलिदान.
चन्द्रहास या गायत्री द्वारा पशु का जो बध किया जाता है वह सर्वश्रेष्ठ विधि मानी जाती है चाक़ू या छुरे के साथ दी जाने वाली बलि मध्यम दर्जे की बलि और फावड़े जैसी किसी चीज से दी जानेवाली बलि निक्रस्टतम विधि मानी जाती है .
तीर जैसे हथियार से की गई बलि देवता स्वीकार नहीं करते हैं ,दुर्गा और कामाख्या देवी को बलि चढ़ाते समय वैदिक मंत्रों का उच्चार करना ही चाहिए.
अब आप उपरोक्त तथ्यों के आधार पर आप स्वतः निर्णय कीजिये कि आप कैसे रक्तरंजित देवी देवताओं से अपेक्षा कर सकते है जो खुद निरीह पशु पक्षी तथा इंसानों के रक्त के प्यासे हों....
जिस बर्तन में बलि का रक्त संचय किया जाय वह किसी की सामर्थ्य के अनुसार हो सकता है पर लोहे का नहीं होना चाहिए.
अश्वमेघ छोड़कर किसी भी अवसर पर घोड़े की बलि नहीं दी जानी चाहिए,इसी प्रकार गजमेघ को छोड़कर किसी भी अवसर पर हाथी की बलि नहीं दी जानी चाहिए,किसी ब्राम्हण को किसी शेर या चीते या अपने रक्त या शराब की बलि नहीं चढ़ानी चाहिए,यदि ब्राम्हण कोई बलि चढ़ाता है तो उसे ब्राम्हह्त्या जैसा पाप लगता है ,इसी प्रकार किसी क्षत्रिय को किसी बारहसिंघे की बलि नही चढ़ानी चाहिए,और यदि किसी शेर चीते या आदमी की बलि चढ़ाना आवश्यक ही हो तो मक्खन आदि पदार्थों से उसके स्थानापन्न बना लेने चाहिए तब बलि देनी चाहिए.
किसी आदमी की बलि देने के लिए राजा की आज्ञा लेना जरूरी है ,किसी विशेष अवसर या खतरों के समय नरबलि केवल राजा या उसके मंत्री ही दे सकते हैं नरबलि देने से पूर्व उसे एक दिन पहले अभिमंत्रित कर तैयार कर लेना चाहिए.
नरबलि देने वाले व्यक्ति को मन्त्रों और रस्सियों से बांधकर उसका सिर काट देना चाहिए और फिर देवी को अर्पित कर देना चाहिए.उक्त विधि विधान के साथ जो यज्ञों का कर्ता धर्ता बलि चढ़ाता है उसकी अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है.
यही वह धर्म है जिसका कलि पुराण में खूब प्रचार प्रसार किया गया है.सदियों तक मनु के अनंतर अब भी यहाँ हिंसा तंत्रों की हिंसा नंगा नाच कर रही है जिसमे पशुओं की हिंसा ही नहीं नर बलि भी है .
कलि पुराण के खूनी परिच्छेद में वर्णित हिंसा भारत में प्रचुर मात्रा में फैली हुई थी,जहाँ तक पशु हिंसा की बात है तो कलकत्ते का काली मंदिर किसी कसाई खाने में तब्दील हो चुका है क्योंकि काली माई को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों बकरियों की रोज बलि चढ़ाई जाती है जो किसी पुराण पर किसी कलंक से कम नहीं है हालांकि आज कालीमाई मंदिर में नरबलि नही होती है पर एक समय यहाँ बकरे बकरियों की तरह नरबलि भी दी जाती थी,वैसे पशुबलि और नरबलि अब भी भारत के हर कोने में बदस्तूर चालू है.यहाँ एक बात गौर करने लायक है कि काली तो शिव की पत्नी है फिर शिव अहिंसक और काली हिंसक कैसे,यह बात विचारणीय है और वही बता सकते हैं जिन्होंने काली और शिव का निर्माण किया.
विष्णु पुराण के अनुसार ब्रम्हा ने खुद को स्वयंभू मनु माना था,जिसने अपने ही स्त्रीलिंग वाले शरीर को सतरूपा का भी नाम दिया था जिसे उसने अपनी ही पत्नी बनाया था,इसका मतलब तथाकथित ब्रम्हा उभयलिंगी था,या फिर ब्रम्हा ने अपनी ही बहन से विवाह किया था,अगर यह सत्य है तो कितने आश्चर्य की बात है,---खैर---इस ब्रम्हा और सतरूपा से दो लड़के और दो लड़कियां पैदा हुए,जिनके नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद तथा प्रसूति और अकुति थे प्रसूति उसने दक्ष को दे दी और अकुति को कुलपिता रूचि को दे दी,अकुति से यज्ञ और दक्षिणा दो जुड़वां बच्चे पैदा हुए जो बाद में पति पत्नी बन गए(फिर वही भाई बहन की शादी)जिनके बाद में बारह बच्चे पैदा हुए,जो यम नाम के देवतागण हुए.
पहला मनु स्वयंभू था द्वितीय मनु देवतागण कहलाते थे,सप्तऋषि, ऊर्ज, स्तम्भ,प्रण, दत्तोली, रिसभ,निश्चर, अर्वरिवत,चैत्र, किम्पुरुष, और दूसरे और कई मनु के पुत्र हुए,इसके बाद चौथा ,पांचवां,छठा मनु चर्चित हुए.
एकबार मनु एकाग्रचित विराजमान थे तब बड़े बड़े ऋषि मुनि उनके पास पहुंचे और चारों वर्णो के बारे में उनसे पूंछा,तब मनु ने उत्तर दिया..कि..
यह विश्व अन्धकार की शक्ल में विराजमान था तब स्वयंभू मनु की नानाप्रकार के प्राणियों को जन्म देने की इच्छा हुई,तो उसने पहले पानी बनाया फिर उसमें बीज डाला,जो बाद में अंडे में बदल गया ,वह मनु स्वयं लोक के जनक के रूप में उस अंडे से पैदा हुआ,तदनंतर ऋषियों को जन्म दिया जो सृस्टि के स्वामी थे,जिनके नाम मरीच, अत्रि, अंगिरस,पुलस्त्य,पुलह,क्रतु,प्रचेतस,वशिष्ठ,भृगु और नारद.इन स्वयंभू मनु और इनकी संतानों के शासन में प्रजातंत्र नाम की कोई चीज नही थी,यही वजह है कि तथाकथित हिन्दू धर्म में शिक्षा और न्याय नाम की कोई चीज नही थी मनु का विधान केवल समाज को वर्णाश्रम के विभाजन की शिक्षा देता है और यही वजह है कि हिन्दू धर्म में प्रजातंत्र के लिए कोई जगह नहीं है.यह अप्रजातांत्रिक व्यवस्था जानबूझकर बनायी गयी थी इसका विभाजन है वर्णो में,जातियों में और फिर जातियों का भी जाति बहिस्कृतों में ,यह केवल सिद्धांत नहीं है,बल्कि ये डिग्रियां हैं हुकुमनामें हैं ये सब प्रजातंत्र के विरुद्ध खड़ी की गई दीवारें हैं.
[मिशन अम्बेडकर].
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......हिन्दू धर्म की रिडल्ज..................
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हिन्दू धर्म की रिडल्ज बोधिसत्व बाबासाहब डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा दिखाया गया वह आइना है जिसे देखकर देश को काल्पनिकता,मूर्खता,अंधविस्वास और पाखण्ड से निकालकर अत्याधुनिक इक्कीसवी सदी में आसानी से पहुंचाया जा सकता है..
जैसा कि आपको इसके पहले अंक में बताया जा चुका है कि आर्यों में आपस में स्वच्छन्द लैंगिक संबंधों की व्यवस्था थी जिसके लिए कोई नियम कानून नहीं था. अब आगे....
ब्रम्हा ने अपनी पुत्री सतरूपा से सादी की थी पृथु वंश परंपरा का संस्थापक मनु उनका पुत्र था,वशिष्ठ ने भी सतरूपा से विवाह किया था,इसी प्रकार जान्हु और जान्हवी,सूर्य और उषा का है,यही पिता और पुत्री की शादियो से उत्पन्न संतान को भी कुंवारी पुत्र कहकर मान्यता दी गई थी,कुंवारी पुत्र का मतलब है अविवाहित पुत्रियों की संतान,कानूनी भाषा में वे लड़की के पिता की संतान थे.
वहीँ ऐसे भी अनेकों उदाहरण हैं जहाँ पिता और पुत्र एक ही स्त्री से सम्भोग करते थे,जैसे ब्रम्हा मनु का पिता था और सतरूपा उसकी माता थी यही सतरूपा मनु की पत्नी भी थी,वहीँ श्रद्धा विवश्वत की पत्नी थी उसका पुत्र मनु था लेकिन श्रद्धा ही मनु की पत्नी भी थी इससे यह साबित होता है कि पिता और पुत्र एक ही स्त्री के हिस्सेदार थे यही हाल भाई की लड़की से सादी करने का भी था ,जैसे धर्म ने दक्ष की दस बेटियों से सादी की थी जबकि धर्म और दक्ष परस्पर भाई भाई थे,काश्यप की भी तेरह पत्नियां थी जो सभी दक्ष की ही पुत्रियां थीं,दक्ष काश्यप का पिता मारीचि का भाई था.
ऋग्वेद में जो यम और यमी का प्रकरण है वह भाई और बहन की शादी का एक नम्बरी उदाहरण है ...
मिशन अंम्बेडकर
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--मनुस्मृति की शव परीक्षा--
शताब्दियों से दुख भोगती आ रही हिन्दू नारी को जालिम पति से छुटकारा दिलाने के लिए तलाक या विवाह - विच्छेद का कानूनी अधिकार डा. बाबासाहब अम्बेडकर नें दिलवाया ,हालांकि मनु एक बार विवाहिता पत्नी को पति के व्याभिचारी होने पर नपुंसक होने पर और हिन्दू धर्म को छोड़ कर किसी दूसरे धर्म में प्रवेश करके वहां अन्य शादी करने पर भी पहली हिन्दू पत्नी का पति ही माना जाता था,भले ही वह हिन्दू पत्नी अपने ऐसे पति के साथ धर्म परिवर्तन न करके अपने हिन्दू सम्बन्धियों के साथ ही रह रही हो, किन्तु वह हिन्दू पत्नी मनु की धर्म मर्यादा के अनुसार उस विधर्मी पति की ही पत्नी बनी रहती थी,हिन्दू पति के घर से भाग जाने पर और वर्षों तक उसका अता -पता न चलने पर या ऐसे पति के संन्यासी साधू बन कर गुमनामी या अप्रत्यक्ष जीवन गुजारने पर भी वह विवाहिता पत्नी उसी पति की ही पत्नी बनी रहती थी,उसे ऐसे पति से तथा भिन्न - भिन्न असाध्य रोगों वाले पति से दिन - रात मानसिक और शारीरिक पीड़ा देने वाले लम्पट और जालिम पति से छुटकारा हासिल करने का पत्नी को अधिकार प्राप्त नहीं था,जब उसे विवाह विच्छेद या तलाक का अधिकार ही नहीं था तो उसका पुनर्विवाह या शादी करना असम्भव था,पत्नी के लिए ऐसा जुल्म बर्दाश्त करने के लिए कौन जिम्मेदार था ? इस पुस्तक के द्वितीय खण्ड में मनुस्मृति के उपदेश पढ़ने से स्पष्ट हो जाएगा कि इस जुल्म का कारण कोई और नहीं बल्कि मनुस्मृति का रचयिता मनु महाराज ही था.
हिन्दू कोड ने ऐसी निरीह हिन्दू पत्नी को सामाजिक नरक से निकालने के लिए विवाह विच्छेद के ऐसे आठ आधार बना दिए हैं जिनके अधीन पति से पत्नी और इन्हीं आठ आधारों पर पत्नी से पति छुटकारा पा सकता है और कानूनी तलाक होने पर पति - पत्नी दोनों अपनी इच्छा से पुनर्विवाह कर सकते हैं ,एक पति और एक पत्नी से एक समय पर विवाह वैद्य है जबकी मनु एक पति को तो एक समय में ही अनेक पत्नियां रखवाता है किन्तु पत्नी को दूसरा पति आजीवन भर ही नहीं , पति के मरने के बाद भी नहीं करने का मनुस्मृति का विधान है , हां ! ऐसी विधवा सन्तान उत्पन्न करने के लिए नियोग ( व्यभिचार ) कर सकती है,हिन्दू कोड ने हिन्दू सामाजिक इतिहास में प्रथम बार विधवा पत्नी और पुत्रों के साथ -साथ पुत्री को भी पति की जायदाद या सम्पत्ति में पुत्रों के समान हिस्सा दिया है ,जिससे हिन्दू भी सभ्य समाज में अब अपना सिर ऊंचा उठा कर कह सकता है कि मुसलमानों ,
ईसाइयों और संसार की अन्य सभ्य जातियों की तरह हिन्दुओं का भी अपना एक न्याय संगत पर्सनल ला है .
दत्तक ग्रहण ( गोदी लेना ) में केवल हिन्दू कोड हिन्दू मात्र के किसी भी लड़के या लड़की को दत्तक बनाया जा सकता है,जो सगे पुत्र या पुत्री की भांति दत्तक लेने वाले की सम्पत्ति का अधिकारी होगा,यहां मनु बाल - विवाह विशेषतः कन्याओं की अल्प आयु में शादी को तर्जीह देता है,हिन्दू कोड में वर वधू को बालिग होने पर शादी करने को वैध ठहराता है और साथ ही चारों वर्णो के भेदभाव को मिटा कर किसी भी जाति में किया हुआ विवाह अब मनु द्वारा अनुलोम और प्रतिलोम का बखेड़ा नहीं है , जिसे मनु ने जन्म दिया है और जिससे ब्राह्मण को अपने से नीचे तीनों वर्गों की कन्याओं से विवाह करने का , क्षत्रिय को अपने से नीचे दो वर्णो की कन्याओं से और वेश्यों को अपने से निचले शूद्र वर्ण की कन्या से विवाह करने ( अनुलोम विवाह ) का नाम दे रखा था और निचले वणों को ऊपर वाले वर्णो की कन्याओं से विवाह का निषेध कर रखा था और ऐसे प्रतिलोम विवाहों की सन्तान को शुद्र ,अतिशूद्रादि , अस्पृश्य ,चाण्डाल आदि घोषित करके उन्हें अपमानित जीवन यापन के लिए बाध्य किया जाता था,हिन्दू कोड ने अनुलोम - प्रतिलोम विवाहों की प्रक्रिया को गैर कानूनी बना दिया है और किसी भी वर्ण या जाति वाले हिन्दू वर -वधू का परस्पर विवाह वैध कर दिया है और उनमें उत्पन्न होने वाली सन्तानें जायज या वैध होंगी और कानूनी तौर पर उन्हें अपने माता -पिता की सम्पत्ति में समान अधिकार होगा,हिन्दू कोड की इस धारा ने मनु के सिर पर कानून का प्रबल कुल्हाड़ा मार कर ब्राह्मणों ( द्विजों ) के बड़प्पन और उनकी पुण्ययोनि तथा शूद्रों और अस्पृश्यों के साथ -साथ स्त्रियों की पाप योनि वाले लेबल को उतारकर उसके पुर्जे पुर्जे कर दिए,इसी प्रकार हिन्दू कोड में भारत की संविधान की स्प्रिट के अधीन हिन्दू मात्र को जिसमें स्त्रियां भी सम्मिलित हैं लिंग भेद , नस्ल भेद एवं वर्ण भेद के ताने - बाने को जो शताब्दियों से मनुस्मृति ने बुन रखा था ,तहस - नहस कर दिया है.
मनुस्मृति का जनाजा ( अर्थी ) निकालने के लिए जितना काम हिन्दू कोड ने किया है ,इतना सामाजिक क्रान्तिकारी कदम इससे पहले किसी ने नहीं उठाया किन्तु यह राक्षस तो अभी कानूनी तौर पर ही मरा है,इसके प्रेत और भूत का साया तो अभी तक हिन्दू दिमाग पर कायम है और उस भूत का दिखाने का काम अभी तके ब्राह्मणों ने जो पुरोहितों का रूप धारण करके कहीं मण्डलेश्वरों और शंकराचार्यों के रूप में चांदी की कुर्सियों पर बैठे हैं ,वह हिन्दू कोड का दबी जबान से विरोध करते रहते हैं और उनमें कई शंकराचार्य तो खुले तौर पर कहते हैं कि भारत के संविधान ने धर्म और अभिव्यक्ति की छूट दे रखी है,अतः ऐसे मनुवादी पौराणिक धर्म को मानना और उसकी अभिव्यक्ति या प्रचार का उन्हें हक है ,वह अपने स्वार्थ के अधीन भूल जाते हैं कि वह एक ऐसे धर्म - कर्म का प्रचार कर रहे हैं जिसे धर्म न कह कर अधर्म कहना संगत अधिक होगा,उनसे पूछा जा सकता है कि हिन्दुओं में अस्पृश्यता जैसे भयानक रोग के कीटाणुओं को हिन्दू धर्म कहना कहां तक उचित है ? जाति - पांति और ऊंच -नीच की भावना फैलाना और वह भी हिन्दुओं
में ही ताकि उनका एक सुदृढ़ राष्ट्र न बन सके और उम्मत को छांट डाला काफिर बना बना कर वाली कहावत पर आचरण करके भारत के दो अंग तो उससे कट ही चुके हैं अब उसका तीसरा अंग छेद करना और वह भी धर्म की अभिव्यक्ति की आड़ में कहां तक उचित है ? काश ! ऐसे धर्माचार्यों में दूरदर्शिता होती और वह बुद्धि से काम लेते ताकि भारत दोनों ओर से अपने हो भाइयों से विधर्मी बने लोगों से घिर पाता ऐसे धर्मध्वज़ी मनु की औलाद के रूप में अब देश को कई और टुकड़े करने पर उतारू हैं,भारत रूपी नौका में धर्म प्रचार की आड़ में यह हिन्दू धर्म के ठेकेदार छिद्र या सुराख कर रहे हैं और जिस विषैले सर्प या दैत्य ( मनु ) को भारत के मनीषियों और हित चिन्तकों ने हिन्दू कोड की लाठी से मार दिया है उस मरे सांप की रीढ़ की हड्डी के मनके बना कर अपने गलों में धर्म कठियां बांधे फिर रहे हैं कि यह उनका धर्म है इसका प्रचार करने की उन्हें संविधान ने छूट दे रखी है,यह तो चैतन्य तथा जागरूक हिन्दुओं का कर्तव्य है कि वह देखें कि क्या ऐसे धर्म ध्वजी उपदेशक धर्म की आड़ में भारतीय राष्ट्र को बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं ? भारत की सीमाएं तंग और क्षुद्र करने वाले यही धर्म गुरु हैं,इन्हीं के पुण्य प्रताप का फल है कि ये आज करोड़ों मानव जो हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग थे और हैं उन्हें अस्पृश्य ,अछूत चाण्डाल , अन्तेवासी बाह्य और नीच घोषित कर रहे हैं ,उनके अपमान , अनादर ,भुखमरी और अशिक्षा आदि का कौन जिम्मेदार है ? उन्हें अपनी ही मातृभूमि में इस कदर जलील करने वाले आखिर कौन हैं ? यही तो हैं -
-मनुस्मृति की शव परीक्षा-
डा.बी.आर.अम्बेडकर
पृष्ठ-19-20-21.
------मिशन अम्बेडकर.
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......हिन्दू धर्म की रिडल्ज.................
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हिन्दू धर्म की रिडल्ज बोधिसत्व बाबासाहब डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा दिखाया गया वह आइना है जिसे देखकर देश को काल्पनिकता,मूर्खता,अंधविस्वास और पाखण्ड से निकालकर अत्याधुनिक इक्कीसवी सदी में आसानी से पहुंचाया जा सकता है..
कलियुग मतलब अधर्म का युग..अब ये अधर्मी थे कौन...वैदिक आर्यों के धर्म में बर्बरता भरी हुई थी,और अश्लीलता की भरमार थी,नरबलि देना उनके धर्म का हिस्सा था,जिसे नरमेघ यज्ञ का नाम दिया गया था,लिंग पूजा प्राचीन आर्यों के घर घर प्रचलित थी लिंग पूजा को "स्कन्ध" नाम दिया गया था,अथर्व वेद 8-7 इसका साक्षी है अश्लीलता का भद्दा उदाहरण अश्वमेघ यज्ञ था जिसने प्राचीन आर्यों के धर्म को कुरूप बना दिया था,अश्वमेघ यज्ञ में एक घोड़े के लिंग को यज्ञ कराने वाले यजमान की मुख्य पत्नी के भग में प्रवेश कराना होता था,उस समय ब्राम्हण लंबे लंबे वेद मंत्रों का उच्चारण करते रहते थे,वाजसनेय संहिता के एक मन्त्र से यह बात स्पष्ट होती है कि रानियों में इसके लिए होड़ लगती थी,कि घोड़े के लिंग की प्रवेश विधि का किसे योग्य पात्र माना जाय( इसके बारे में जो लोग अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं वे यजुर्वेद पर जो महीधर के भाष्य हैं उन्हें देखें ).आर्य जन जुआरियों की एक जाति थे जुवा खेलना उनका प्रमुख व्यसन था ,इसी तरह आर्यजन शराबी भी थे.इसी प्रकार विवाह का कोई कानून नहीं था कोई भी स्वतंत्र होकर स्वच्छन्द सम्भोग कर सकता था इसके लिए भी कोई नियम कानून नही था.
इसकी विस्तृत जानकारी अगले अंक में....
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विमेंन पॉवर की जड़ में डॉ. आंबेडकर
अब से सौ साल पहले, जुलाई, 1913 के तीसरे सप्ताह में डॉ. आंबेडकर न्यूयॉर्क पहुंचे और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। वहां का वातावरण उदार और समानता पर आधारित था। महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। अर्थव्यवस्था में महिलाओं का सीधा योगदान था। हर क्षेत्र में वे पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहीं थी। आंबेडकर के लिए यह एक नया ही संसार था। महिलाओं के सशक्तीकरण से वे बहुत प्रभावित हुए और पहला सपना उन्होंने यही देखा कि भारत लौटकर यहां की महिलाओं को भी वे इसी तरह सशक्त बनाने का प्रयास करेंगे।
महीने भर के अंदर 4 अगस्त, 1913 को न्यूयार्क से अपने एक मित्र को लिखे पत्र में डॉ. आंबेडकर लिखते हैं- 'यह सोचना गलत है कि माता-पिता बच्चे को केवल जन्म देते हैं, भविष्य नहीं। माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बना सकते हैं। यदि हम इस सिद्धांत पर चल पड़ें तो अति शीघ्र वह शुभ दिन देख सकते हैं। लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर भी ध्यान देकर हम शीघ्र प्रगति कर सकते हैं। आप अपनी पुत्री को शिक्षा देकर इसका लाभदायक परिणाम स्वयं देख सकते हैं।'
डॉ. आंबेडकर का मानना था कि किसी भी देश की आबादी का आधा हिस्सा महिलाओं का होता है और इसलिए तरक्की वह तभी कर सकता है जब उसकी महिलाओं को तरक्की का समान अवसर मिले। नागपुर में महिलाओं के एक अखिल भारतीय सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर ने कहा था- 'मैं किसी समुदाय की प्रगति को इस पैमाने पर देखता हूं कि उसकी महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। महिलाओं के संगठन में मेरा अत्यधिक विश्वास है। मैं जानता हूं कि यदि वे आश्वस्त हो जाएं तो समाज को सुधारने के लिए क्या नहीं कर सकतीं।'
वे प्रायः कहा करते थे कि शास्त्रों में निहित आदर्शों के अनुसार शूद्रों और अछूतों के साथ-साथ सारी स्त्री जाति पर, चाहे वह किसी भी वर्ण की हो, बहुत जुल्म ढाया गया है। हालांकि उनका मानना था कि भारत में महिलाओं की दुर्दशा हमेशा नहीं होती रही। एक समय था जब कहा जाता था कि जहां नारी की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। प्राचीन भारत में बुद्ध ने महिलाओं को दीक्षा का अधिकार देकर और स्वतंत्र भिक्षुणी संघ की स्थापना करके महिला सशक्तीकरण में योगदान किया था। लेकिन बुद्ध के कुछ शताब्दियों बाद मनुस्मृति जैसे विधान बनाए गए जिसमें स्त्रियों से बराबरी का अधिकार छीन लिया गया।
मनुस्मृति के श्लोक 5 : 147 में प्रावधान किया गया- लड़की, नवयुवती या वृद्धा को भी अपने घर तक में कोई काम स्वतंत्रतापूर्वक नहीं करना चाहिए। इसी तरह श्लोक 5 : 148 में कहा गया- स्त्री को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और पति के दिवंगत होने के बाद अपने पुत्रों के अधीन रहना चाहिए। उसको कभी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए। इतना ही नहीं, श्लोक 9 : 46 में प्रावधान किया गया कि बेचने और त्याग देने पर भी कोई स्त्री अपने पति से मुक्त नहीं होती। पति का अधिकार उस पर सदैव रहेगा।
डॉ. आंबेडकर महिलाओं की इस स्थिति से बहुत दु:खी थे और हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि वे सभी अधिकार उनको कैसे दिलाए जाएं जो किसी भी समाज में आम नागरिक को प्राप्त होने चाहिए। आगे चलकर उन्होंने मनुस्मृति की सार्वजनिक रूप से होली जलाई, क्योंकि उनका मानना था इस ग्रंथ के प्रावधानों के चलते ही भारतीय समाज में महिलाओं को उनका उचित अधिकार नहीं मिल सका है। 1928 में साइमन कमीशन के समक्ष दिए गए अपने साक्ष्य में डॉ. आंबेडकर ने वयस्क मताधिकार की जोरदार वकालत की और कहा कि 21 वर्ष के ऊपर के सभी भारतीयों को, चाहे वे महिला हों या पुरुष, मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।
1942 में डॉ. आंबेडकर को गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया और उन्होंने भारत के इतिहास में पहली बार महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश की व्यवस्था की। आगे चलकर जब डॉ. आंबेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 में ऐसा प्रावधान रखा कि लिंग के आधार पर महिलाओं के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। इतना ही नहीं, कानून मंत्री के रूप में डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल संसद में पेश किया, जिसका उद्देश्य था अलग-अलग पंथों में बंटे हिंदू समुदाय के लिए एक समान आचार संहिता तैयार करना, जिसमें महिलाओं को वैवाहिक मामले में, तलाक संबंधी मामले में, उत्तराधिकार, गोद लेने और गुजारा भत्ता के मामले में तथा पारिवारिक हिस्सेदारी के मामले में समान अधिकार मिले।
हिंदू कोड पास हो जाने पर दुखी और निरीह पत्नियां कानून के बलबूते अत्याचारी पतियों से पिंड छुड़ा सकती थीं और किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह भी कर सकती थीं। इसकी एक विशेषता यह भी थी कि किन्हीं भी दो हिंदू वर-वधुओं का विवाह, चाहे उनका वर्ण भेद या जाति भेद कैसा व कितना भी क्यों न हो, वैध माना जाता है और उनसे उत्पन्न संतान पैतृक संपत्ति में वैध अधिकारी बन जाती है, जबकि इस कानून से पहले परस्पर विरोधी वर्णों, जातियों उप-जातियों में हुए विवाह से उत्पन्न संतान पैतृक संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने के लिए वैध संतान नहीं मानी जाती थी।
रूढ़िवादी लोगों के विरोध के कारण हिंदू कोड बिल उस समय नहीं पास हो सका और डॉ. आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन पद से इस्तीफा देने के बाद भी डॉ. आंबेडकर चुप नहीं बैठे और सामाजिक तथा राजनैतिक मंचों से और अपनी लेखनी के माध्यम से इस बिल को पारित कराने के लिए संघर्ष करते रहे। बाद में सन् 1955-56 में हिंदू कोड बिल को कई टुकड़ों में जैसे हिंदू विवाह कानून, हिंदू उत्तराधिकार कानून, हिंदू गोद एवं गुजारा भत्ता कानून जैसे नामों से पास किया गया। इन कानूनों को पारित करवाने में भी डॉ. आंबेडकर ने अहम भूमिका निभाई।
डॉ. आंबेडकर ने तत्कालीन कानून मंत्री श्री पाटस्कर को हिंदू कोड की एक-एक धारा को विस्तार से समझाकर और उसके विरोध में दी जाने वाली दलीलों के जवाब पहले से तैयार करके उनकी बहुत सहायता की। डॉ. आंबेडकर का सपना पूरी तरह तब साकार हुआ, जब सन् 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन करके पुत्री को भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया। डॉ. आंबेडकर को इसीलिए और इसके अलावा भी कई कारणों से युग पुरुष कहा जाता है।
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दुर्गासप्तशती का असुर पाठ : सांस्कृतिक युद्ध का शंखनाद
पौराणिक युग में देवियों यानी आदिशक्ति के उभार पर डॉ. आम्बेडकर ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनकी मान्यता है कि वैदिक युग में देव युद्ध करते हैं, जो पुरुष हैं, उनकी पत्नियां युद्ध में नहीं जातीं
हम सबने मार्कण्डेय पुराण में वर्णित ‘दुर्गासप्तशती’ की कथा या तो पढी है या सुनी है या फिर दुर्गा पूजा अथवा नवरात्रि के धार्मिक आयोजन से थोड़े-बहुत जरूर परिचित हैं। हम आपको एक मुण्डा आदिवासी कथा सुनाते हैं। कथा इस प्रकार है : जंगल में एक भैंस और भैंसा को एक नवजात बच्ची मिली। दोनों उसे अपने घर ले आए और लड़की को पाल-पोसकर बड़ा किया। अपूर्व सौंदर्य लिए हुए सोने की काया वाली वह बच्ची जवान हुई। उसकी सोने-सी देह और अनुपम सौंदर्य की चर्चा कुछ शिकारियों के द्वारा राजा तक पहुंची। राजा ने छुपकर लड़की को देखा और उसके रूप पर मोहित हो गया। उसने उसका अपहरण करने की कोशिश की। तभी भैंस और भैंसा दोनों वहां आ गए। दोनों को आया देख राजा ने लड़की को बंधक बना लिया और घर का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। भैंस ने दरवाजा खोलने के लिए लड़की को बाहर से आवाज लगाई। लड़की बंधक थी। वह कैसे दरवाजा खोल पाती? उसने बिलखते हुए राजा से आग्रह किया कि वह उसे छोड़ दे, पर राजा ने लड़की को मुक्त नहीं किया। अंतत: भैंस और भैंसा, दोनों दरवाजा खोलने की कोशिश करने में सर पटकते-पटकते मर गए। उनके मर जाने के बाद राजा ने बलपूर्वक लड़की को अपनी रानी बना लिया।
आप सोचेंगे कि ‘दुर्गासप्तशती’ अथवा दुर्गा पूजा की कहानी, जिसमें आदिशक्ति दुर्गा महिषासुर का वध करती है, से इस आदिवासी कथा का क्या लेना-देना। इस पर बात करने से पहले एक और आदिवासी कथा का पाठ कर लेना उचित होगा, जिसे गैर-आदिवासी समाज नहीं जानता। यह कथा संथाल आदिवासी समाज में प्रचलित है। संथालों का एक पर्व है ‘दासांय’, जो दुर्गापूजा के समानांतर मनाया जाता है। इसमें संथाल नवयुवकों की टोली बनती है, जो योद्धाओं की पोशाक में रहते हैं। टोली के आगे-आगे अगुआ के रूप में कोई संथाल बुजुर्ग होता है, जो प्रत्येक घर में घुसकर गुप्तचरी का स्वांग करता है। दरअसल, यह टोली प्रत्येक घर में अपने सरदार को खोजती है जो उनसे बिछड़ गया है। इस तरह टोली युद्ध की मुद्रा में नृत्य करते हुए आगे बढती है। इस संथाल आदिवासी परंपरा ‘दासांय’ में टोली जिस सरदार को खोजती है, उसका नाम दुरगा होता है, जो अपने दिशोम (देश) में दिकुओं (बाहरी लोग) के अत्याचार और प्रभाव के खिलाफ अपने योद्धाओं के साथ युद्ध करता है। उसके बल और वीरता से दिकू पराजित हो भयभीत रहते हैं। अंत में दिकू लोग छल का सहारा लेते हैं। उसे धोखे से बंदी बनाकर उसकी हत्या करने के लिए एक वेश्या से सहायता मांगते हैं। वेश्या सवाल करती है, ‘इसमें मुझे क्या लाभ?’ पुजारी वर्ग उसे आश्वस्त करता है कि अगर अपने रूपजाल में फांसकर वह दुरगा को बंदी बनाने में साथ देगी तो युगों-युगों तक उसकी पूजा होगी। इस तरह से संथालों का सरदार ‘दुरगा’ बंदी होता है और मार डाला जाता है। आदिवासी सरदार दुरगा को मारने के ही कारण उस वेश्या को महिषासुरमर्दिनी और दुरगा (दुर्गा) की उपाधि मिली। उसे मारने में नौ दिन और नौ रातें लगे थे इसीलिए नवरात्रि का चलन शुरू हुआ। इस तरह से दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। बंगाल इसका केंद्र बना, क्योंकि मूलत: संथालों की आबादी पुराने बंग से सटे इलाके अर्थात मानभूम में निवास करती थी। इसी कारण दुर्गा प्रतिमा तभी बनती है जब वेश्यालय की एक मुट्ठी मिट्टी उस मिट्टी में मिलाई जाए, जिससे मूर्ति का निर्माण होना है।
इस दूसरी आदिवासी कथा से आप यह समझ गए होंगे कि पहली कथा, जिसमें जंगल, भैंस और सोने की काया वाली लड़की का रूपक है, का दुर्गा सप्तशती के साथ क्या संबंध है। दरअसल ये दोनों कथाएं मनुवादी दुर्गा सप्तशती का आदिवासी पाठ हैं, जिसे लोककथा कहकर पुरोहित वर्ग ने व्यापक जनसमाज के सामने आने नहीं दिया। सांस्कृतिक उपनिवेश बनाए रखने के लिए पुरोहित वर्ग और उसकी शिक्षा व्यवस्था ने लोकविश्वास को विश्वसनीय नहीं माना और असहमतियों एवं विरोध के इतिहास को लिखित वेद-पुराणों के तले दबा दिया।
पौराणिक युग में देवियों यानी आदिशक्ति के उभार पर डॉ. आम्बेडकर ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनकी मान्यता है कि वैदिक युग में देव युद्ध करते हैं, जो पुरुष हैं, उनकी पत्नियां युद्ध में नहीं जातीं। लेकिन पौराणिक काल में जब देवों का राज स्थापित हो जाता है और वे ही शासक होते हैं, तब अचानक से हम उनकी देवी पत्नियों को युद्ध में वीरांगना के रूप में पाते हैं। डॉ. आम्बेडकर व्यंग्य करते हुए कहते हैं, ‘ब्राह्मणों ने यह भी नहीं सोचा कि वह दुर्गा को ऐसी वीरांगना बनाकर, जो अकेली सभी असुरों का मान-मर्दन कर सके, अपने-अपने देवताओं को भयानक रूप से कायरता का जामा पहना रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे पौराणिक देवता अपनी आत्मरक्षा तक नहीं कर सके और उन्हें अपनी पत्नियों से याचना करनी पड़ी कि वे आएं और उन्हें संरक्षण प्रदान करें। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित एक घटना (महिषासुर वध) यह प्रकट करने के लिए पर्याप्त है कि ब्राह्मणों ने अपने देवताओं को कितना हिजड़ा बना दिया था। (डॉ. आम्बेडकर, रिडल्स इन हिन्दुज्म पृ. 75)
दुर्गा पूजा के बंगाली विस्तार का एक घृणित इतिहास है। अठारहवीं सदी के पहले, बंगाल में भी दुर्गा पूजा की ऐसी कोई परंपरा नहीं थी, जैसी हम आज पाते हैं। यह जानकर बहुत से हिंदुओं को धक्का लगेगा कि दुर्गा पूजा का पहला आयोजन बंगाल में अंग्रेजी राज के विजयोत्सव के उपलक्ष्य में हुआ था 1757 में। 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब को हराकर जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर अपना राज कायम कर लिया, तो इसकी खुशी में राजा नवकृष्णा देव, जो क्लाइव का मित्र था, ने शोभाबाजार स्थित अपने घर के प्रांगण में दुर्गा पूजा का आयोजन किया। आज भी 36 नबकृष्णा स्ट्रीट में होनेवाली पूजा को बंगाली ‘कंपनी पूजा’ के नाम से ही जानते हैं। इसके बाद ही बंगाल के जमींदारों ने दुर्गा पूजा को अपने ‘ठाकुर दालान’ और अपनी-अपनी जमींदारियों में आयोजित करना शुरू किया। दुर्गा पूजा के इस आयोजन में धार्मिक विद्वेष स्पष्टत: मौजूद था और है, इसे भी नहीं भूलना चाहिए। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी के युद्ध में जिस नवाब को हराया था, वह मुसलमान था-नवाब सिराजुद्दौला। ईस्ट इंडिया कंपनी से लडऩेवाला सिराजुद्दौला देशभक्त नहीं है भारतीय इतिहास में, क्योंकि वह मुस्लिम है। लेकिन जिन बंगाली राजाओं और जमींदारों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की आराधना की, वे बंगाली पुनर्जागरण के अग्रदूत माने गए। संहार का यह नस्लीय आयोजन हमें बताता है कि हजारों साल पहले असुरों को दुर्गा ने छल से मारा। बंगालियों ने 250 वर्ष पहले मुसलमानों के खिलाफ और ईस्ट इंडिया कंपनी की आराधना में फिर से दुर्गा को जीवित किया और आजादी के बाद, भारत सरकार व हिंदू समाज ने विकास एवं औद्योगीकरण की आड़ में आदिवासी इलाकों में दुर्गा पूजा का विस्तार किया और आदिवासियों का सांस्कृतिक संहार आज भी जारी रखा है।
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