कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था का भांडा फोड
(छांदोग्य उपनिषद से प्रमाण)
छांदोग्य उपनिषद के अनुसार 👇
जिनका बर्ताव यहा रमणीय रहा है वह जल्दी उत्तम जन्म को प्राप्त होंगे. ब्राह्मण के जन्म को,वा क्षत्रिय के जन्म को वा वैश्य के जन्म को.
पर वह जो यहा निच बर्ताव वाले रहे है वो जल्दी निच योनी मे प्राप्त होंगे.
कुत्ते कि योनीको वा सुअर कि योनीको वा चांडाल कि योनीको.
(छांदोग्य उपनिषद 5-10-7, पंडित राजाराम,पृष्ठ 193)
छांदोग्य उपनिषद का उपर का श्लोक आर्य समाज के तथाकथित कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था को पुरी तरह से ध्वस्त कर रहा है.
कोई शुद्र,चांडाल कर्म के आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कैसे बन सकता है ? वो तो पिछले जन्म के कर्म का फल भोगने के लिए चांडाल योनी को प्राप्त हुआ है.
उसे इस जन्म मे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनाना छांदोग्य उपनिषद के कर्म फल सिद्धांत कि काट करने जैसा है
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