Friday, 2 April 2021

ऋग्वेद ज्ञान।

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वेदों का ज्ञान विज्ञान या अनार्यों का कत्लेआम,संहार ,और विध्वंस .?....

त्वमेतान्नुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे । अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः । । ७ । । 

हे इन्द्रदेव ! आपने रोने या हँसने वाले इन शत्रुओं को समर में मार गिराया ,दस्यु वृत्र को दिव्य लोक से लाकर अच्छी प्रकार दग्ध किया इसी प्रकार सोम रस तैयार करने वाले प्रशंसक स्तोताओं की रक्षा की .

 चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः । न । ॐ हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण । । ८ । । 

उन वृत्रानुचरों ने पृथिवी को आच्छादित कर डाला , और सुवर्ण और मणियों से भी वे सम्पन्न हो ,परन्तु वे इन्द्रदेव को नहीं जीत सके ,इन्द्रदेव ने उन विघ्नकर्ताओं को सूर्य द्वारा तिरोहित कर डाला था .

परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम् । अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्बह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र । । ९ । । । 

हे इन्द्रदेव ! चूंकि आपने महिमा - द्वारा धुलोक और पृथ्वीलोक को सम्पूर्ण रूप से वेष्टित करके सारा भोग किया ; इसलिए आपने मन्त्रार्थ - ग्रहण करने में असमर्थ यजमानों को भी रक्षा करने में समर्थ मन्त्रों द्वारा वृत्र - रूप चोर को निःसारित किया.

न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् ।युजं वज्र वृषभश्चक्र इन्द्रो निज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत् ।।१० ।।

जब दिव्य लोक से जल पृथिवी पर नहीं प्राप्त हुआ और धन - प्रद भूमि को उपकारी द्रव्य - द्वारा पूर्ण नहीं किया , तब वर्षाकारी इन्द्रदेव ने अपने हाथों में वज्र उठाया और द्युतिमान् वज्र - द्वारा अन्धकाररूप मेघ में पतनशील जल का पूर्ण रूप से दोहन कर लिया.

अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्यानाम् ।सघ्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून् ।।११ ।।

प्रकृति के अनुसार जल बहने लगा ;किन्तु वृत्र नौकागम्य नदियों के बीच में बढ़ा तब इन्द्रदेव ने महाबलशाली और प्राण - संहारी आयुध - द्वारा कुछ ही दिनों में स्थिर - मना वृत्र का वध किया 

न्याविध्यदलीबिशस्य दृळ्हा वि भृङ्गिणमभिनच्छुष्णमिन्द्रः ।यावत्तरो मघवन्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम् ।।१२ ।।

गुफा की भूमि पर सोये हुए वृत्र की सेना को इन्द्रदेव ने विद्ध किया और श्रृंगी तथा जगच्छोषक वृत्र को विविध प्रकार से ताड़ना दी,
इन्द्रदेव आपने सम्पूर्ण वेग और बल से शत्रुसेना का संहार किया-

अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रून्वि तिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत् ।सं वज्रणासृजद्वत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः ।।१३ ।।

इन्द्रदेव का कार्य -साधक वज्र शत्रु को लक्ष्य कर गिरा था,इन्द्र ने तीक्ष्ण और श्रेष्ठ आयुध -द्वारा वृत्र के नगरों को विविध प्रकार से छिन्न - भिन्न किया,अन्त में इन्द्र ने वृत्र पर वज्र द्वारा आघात किया और उसे मारकर भली - भाँति अपना उत्साह बढ़ाया.

आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम् ।शफच्युतो रेणुर्नक्षत _ द्यामुच्छ्वैत्रेयो नृषाह्याय तस्थौ ।।१४ ।।

हे इन्द्रदेव !आप जिस कुत्स ऋषि की स्तुति चाहते हो , उसी कुत्स की आपने रक्षा की थी आपके घोड़ों के सुमों से पतित धूलि द्युलोक तक फैल गई थी,शत्रु भय से जल में मग्न होकर भी चैत्रेय ऋषि ,मनुष्यों में अग्रणी होने की अभिलाषा से आपके अनुग्रह से बाहर निकल आये थे .

आवः शमं वृषभं तुझ्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छित्र्यं गाम् ।योक चिदत्र तस्थिवांसो अक्रज्छत्रूयतामधरा वेदनाकः ।।१५ ।।।

हे इन्द्रदेव !सौम्य ,श्रेष्ठ और जल - मग्न वैयेत्र को क्षेत्र - प्राप्ति के लिए आपने बचाया था,वहाँ जलों में ठहरकर अधिक समय तक आप शत्रुओं से युद्ध करते रहे,उन शत्रुओं को जल में गिराकर अपने मार्मिक पीड़ा पहुँचाई-

  ( ऋग्वेद की उपरोक्त विवेचना से आपनें देखा कि आर्यो के आक्रमणकारी इन्द्र नें किस तरह विध्वंसक उत्पात मचाकर भारतीय मुलनिवाशियों में कत्लेआम कर तबाही मचाई थी,तो क्या किसी राजा की हत्या कर देना ही वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?..तो क्या तमाम जनता की हत्या कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है.?..या फिर जीवन रक्षक जलसंचय के बांधो का विध्वंस कर संचित जल को फैलाकर नष्ट कर देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है..?.अथवा शहर के शहर तबाह कर खण्डहरों में बदल देना वेदों का ज्ञान और विज्ञान है-नहीं न,तो फिर क्या है .?.जाननें के लिए बने रहिये प्लेटफार्म पर ,दरअसल यहां वेदों में कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं बल्कि आक्रमणकारी आर्य विदेशियों द्वारा भारतीय बहुजन मुलनिवाशियों के नरसंहार और उनके विध्वंस की काली कहानी छुपी है इन आर्यों के वेदों में ....जानिए...
    क्रमशः.....
   ऋग्वेद-भाग-1-
    प्रष्ठ -७६-७७
   -----------मिशन अम्बेडकर.
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
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वेदों में ज्ञान ,विज्ञान या आर्यों की काली करतूत..?.या अनार्यो का संहार---
(सूक्त - ३५ ऋषि - हिरण्यस्तूप , आंगिरस देवता - अग्नि , मित्र , वरुण , प्रकृति ,छन्द - जगती , त्रिष्टुप , पंक्ति ) .

 ' हृयाम्यग्निं प्रथम स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे । हृयामि रात्री जगतो निवेशनी हृयामि देवं सवितारमूतये । । १ । । । 

अपनी रक्षा के लिए पहले मैं अग्निदेव का आह्वान करता हूँ रक्षा के लिए मित्र और वरुणदेव को इस स्थान पर बुलाता हूँ ,
संसार का विश्राम -कारण रात्रि को में बुलाता हूँ तथा रक्षा के लिए सविता देवता को बुलाता हूँ.

घ्नन्तो वृत्रमतरत्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे,भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु ।।८ ।।

देवों ने प्रहार करके वृत्र का हनन किया,अग्निदेव बलशाली हैं ,वे गो - प्राप्ति के लिए संग्राम में हिनहिनाते हुए घोड़े की तरह सर्वतोभाव से प्रसन्न होकर कण्व ऋषि के लिए यथेच्छ द्रव्य की वर्षा करते है.

अग्निर्नयन्नववास्त्व बृहद्रथ ।तुर्वीतिं दस्यवे सहः ।।१८ ।।।

दुष्टों का दमन करनेवाले अग्निदेव के साथ तुर्वश ,यदु और उग्र देव को दूर देश से हम बुलाते हैं ,
वह अग्निदेव नववास्तु , बृहद्रथ और तुर्वीति को भी ले चले .

नि त्वामझे मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो ये नमस्यन्ति कृष्टयः ।।१९ ।।

हे अग्निदेव !आप ज्योतिःस्वरूप है ,मनु ने विविध जातियों के मनुष्यों के लिए आपको स्थापित किया हे अग्निदेव !आप यज्ञ के लिए उत्पन्न होकर और हव्य - द्वारा तृप्त होकर कण्वऋषि के प्रति प्रकाशमान हुए हैं,मनुष्य आपको नमस्कार करते है 

त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये ,रक्षस्विनः सदमिद्याआपावतो विश्वं समत्रिणं दह ।।२० ।।

अग्नि की शिखा प्रदीप्त ,बलवती और भयंकर है उसका विनाश नहीं किया जा सकता .

हे अग्निदेव !राक्षसों , यातुधानों और विश्वभक्षक शत्रुओं को नष्ट करें.

पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः ,पाहि रीषत उत वा जिघासतो बृहद्रानो यविष्ठ्य ।।१५ ।।

हे विशाल किरणवाले युवक अग्निदेव !हमारी राक्षसों से रक्षा करे ,धन -दान न करनेवाले ,
कृपण धूर्ती से हमारी रक्षा करें हिंसक पशुओं से हमारी रक्षा करें तथा हिंसको और जघन्यो से हमारी रक्षा करें .

घनेव विष्वग्वि जह्यराव्णस्तपुर्जम्भ ओ अस्मनुक् यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत ।।१६ ।I

हे उत्तप्त किरणवाले अग्निदेव !जिस तरह हम लोग कड़े दण्ड - द्वारा भाँड आदि नष्ट करते है , उसी तरह धन - दान न करनेवालों का सदैव संहार करे

नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्न होतारमृत्विजम् ।मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम् ।।११ ।।।

हे अग्निदेव !आप यज्ञ के साधन , देवों के आह्वानकारी ऋत्विक , प्रकृष्ट ज्ञान से युक्त ,शत्रुओं की आयु का नाश करने वाले , देवों के दूत और अमर हैं,हम मनु की तरह आपको यज्ञस्थान में स्थापित करते है.

 प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य ।इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो ।।९ ।।- 

हे अग्निदेव !आप काष्ठ - बल - द्वारा घर्षित होकर उत्पन्न होते है आप फलदाता और निवास हेतु हैं आज इस स्थान पर प्रातः आगमन करने वाले देवों और अन्य देवता जनों को सोमपान के लिए कुश के ऊपर बुलावें ,

अर्वाचं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः अयं सोमः सुदानवस्त पात तिरोअयम् ।।१० ।।।

हे अग्निदेव !सम्मुखस्थ देवरूप प्राणियों को ,अन्य देवों के साथ , समान आह्वान करके यजन करें ।हे दानशील देवो !आपके लिए यह सोमरस प्रस्तुत है , इसका पान करे.

 उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् ,अविद्रियाभिरूतिभिः ।।१५ ।।।

हे अश्विनीकुमारों !आप दोनों सोमरस का पान करें आलस्य का परित्याग करते हुए हमारी रक्षा करें और सुख प्रदान करें..

(इस तरह पुनः यहाँ आपनें देखा कि आर्यों के वेदों में कहीं कोई ज्ञान और विज्ञान नहीं मिला,दरअसल आर्यों के कुछ ऐसे नायक थे जिनकी खूब स्तुति और अनुनय विनय किया जाता था उन्हें खूब सोमरस (नशीला पदार्थ) पिलाया जाता था,जो बदले में आर्यो की रक्षा करते थे तथा अनार्य भारतीय मूलनिवासी राजाओं तथा उनके सैनिक और प्रजा का कत्लेआम कर विध्वंस करते थे,और लूटी हुई धन संपदा आर्यो को देते थे इन्हें ही आर्यों नें देवता बताकर स्तुति और गुणगान किया है जिसे उन्होंने कलमबद्ध कर वेदों में संग्रहीत किया हुआ है,आर्यों के शत्रु दैत्य,दानव,राक्षस ही होते थे जोकि यहां के मूलनिवासी राजा थे,और हमारे पूर्वज थे,जिनकी सिंधुघाटी नगरीय सभ्यता को इन आर्यों नें तहस नहस कर मानव सभ्यता को ही समाप्त कर दिया आर्यों की यह विध्वंसक कहानी सुरक्षित रहे इसीलिए उन्होंने वेद नामक ग्रंथों की रचना की-अन्यथा वेदों में कोई ज्ञान और विज्ञान का तिनका भी नहीँ है,आर्यों की ऐसी ही विध्वंसक करतूतों की जानकारी आपको प्राप्त होती रहे तो बनें रहिये प्लेटफार्म पर-
--ऋग्वेद-भाग-1
  प्रष्ठ-७९-८२-८३-९३-९५-९६
    --------मिशन अम्बेडकर.
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ऋग्वेद-का ज्ञान कहाँ,विज्ञान कहाँ..?
ऋग्वेद में देवताओं की उत्पत्ति, संख्या एवं लक्षण ---
वैदिक ऋषियों ने सर्वशक्तिसम्पन्न देवताओं को अनादि नहीं माना,(नोट करनें योग्य तथ्य)
विभिन्न स्थलों पर देवताओं के उद्गम की परिकल्पना की गई है,(यह उससे भी बड़ी नोट करनें योग्य बात है),
किन्तु उसमें मतैक्य नहीं है,(मतलब जिसने जितना सोमरस पिया उतना कलम से भोंक दिया ),अधिकतर दार्शनिक सूक्तों में देवताओं का सम्बन्ध जल से बताया है,प्रायः देवताओं को पृथ्वी एवं द्युलोक की सन्तान माना गया है,इनकी उत्पत्ति सृष्टि की रचना के बाद हुई है,देवताओं की विविध विभाजन के आधार पर उनकी उत्पत्ति भी विविध मानी गई है,अर्थात् पृथिवी स्थानीय देवता पृथिवी से तथा घुस्थानीय देवता अदिति से उत्पन्न माने गए हैं,इसके बाद वह अवस्था आती है ,जब एक देवता विशेष को अन्य देवताओं का जनक माना गया है,(जो पैदा हुआ और मर गया और जिसने जिंदगी भर व्यभिचार बलात्कार अत्याचार और हत्याकांड किये वह देवता कैसे )इस प्रकार कभी ऊषा को कभी ब्रह्मणस्पति को और कभी सोम को देवताओं की उत्पत्ति कर्ता माना गया है,(मतलब देवताओं की उत्पत्ति का कोई ठिकाना नहीं है ) इसी तरह-
देवों की संख्या का भी हाल है-वेदों में देवों की संख्या १ से लेकर ६ हजार तक बताई गई है,ऋग्वेद का स्पष्ट कथन है कि मूलरूप में एक ईश्वर की ही सत्ता है ,उसको ही विद्वानों ने इन्द्र ,मित्र ,वरुण आदि अनेक नाम दिए हैं,ऋग्वेद ने उल्लेख किया है कि तीन मुख्य देव हैं ,पृथ्वी पर अग्नि ,अन्तरिक्ष में वायु या इन्द्र तथा धुलोक में सूर्य,ऋग्वेद में ३३ देवों का उल्लेख है - ११ पृथ्वी पर , ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में (ओह ),पाश्चात्य विद्वानों ने ब्रह्माद्वैतप्रतिपादक वेदों में बहुदेवतावाद का कलंक लगाने की व्यर्थ ही कुचेष्टा की है,ऋग्वेद में ' चित्रं देवानाम्' ' इस मन्त्र के चतुर्थ चरण ‘ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च में स्थावरजङ्गम समस्त विश्व का आत्मा एक सय ही कहा गया है
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ' अर्थात् एक सच्चिदानन्द परब्रह्म तत्त्व को मेधावी विद्वान् यम , वरुण आदि अनेक देवताओं के रूप में कह रहे हैं इस प्रकार स्म है कि वेद में एकदेवतावाद का ही प्रतिपादन है,रूपं रूपं मघवा योभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं परि स्वाम् तात्पर्य यह कि मघवा इन्द्रदेव जो - जो रूप धारण करने की कामना करते हैं ,उसी - उसी रूप को तत्काल प्राप्त कर लेते हैं (मतलब बहुरूपिया)कारण वे अनेक शरीरधारकत्वशक्तियुक्त अपनी माया का विस्तार करते हुए अपने शरीर से अनेक प्रकार के शरीरों का निर्माण कर लेते हैं,
( परिशब्दोऽत्र पञ्चम्यर्थे ) अर्थात् एक ही इन्द्रदेव अपनी मायाशक्ति के प्रभाव से अनन्त देवों के रूप में व्यक्त होते हैं,' इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते ' ११ – इस मन्त्र में मायाशक्ति के प्रभाव से इन्द्र का बहुरूप - धारण स्पष्ट प्रतिपादित है इन मन्त्रों में क्रमश : मधुच्छन्दा के पिता विश्वामित्र तथा गर्ग भारद्वाज एकदेवतावाद का ही अनुमोदन कर रहे हैं,अतः एकदेवतावाद को वहुदेवता का विकास मानना असंगत ही है,
सुपर्ण विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति ।१२ ।|जैसे आर्त भक्तों की पुकार सुनकर उनकी रक्षा के लिए शीघ्र दौड़नेवाला शोभनगतियुक्त आरम्भ में एक ही है , फिर भी मेधावी विद्वान् उसकी अनेक प्रकार से विविध देवताओं के रूप में कल्पना करते हैं अर्थात् विद्वानों के कल्पना - राज्य में वे एकदेवता ही वहुदेवतारूप में अनुभूत होने लगते हैं,
पृथिवी स्थानीय देवता---
पृथिवी पर स्थानीय ५२ देवता हैं जिनमें प्रमुख देव अग्नि ,सोम , बृहस्पति ,त्वष्टा ,प्रजापति , विश्वकर्मा हैं,अदिति ,दिति आदि देवियाँ हैं इन सभी प्रमुख देवताओं के स्वरूप ,महत्त्व एवं कायों का प्रतिपादन किया जा रहा है 
अग्नि : - ऋग्वैदिक देवताओं में सूक्तों की संख्या की दृष्टि से यद्यपि इन्द्र सबसे प्रमुख देवता है तथापि महत्त्व की दृष्टि से अग्नि का स्थान सर्वोपरि है (यहां याद रहे यह वही भौतिक अग्नि है जिसे दुनियाँ इस्तेमाल करती है पर जिन्हें सोमरस "दारू" पीकर गोबर को भी गणेश बनाने की क्षमता हो उन्हें अग्नि जैसी चीज को देवता बनाते कहाँ देर लगती)
पृथ्वीस्थानीय इस देवता की स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में हुई है अनेक अन्य सूक्तों में अन्य देवताओं के साथ भी इसकी स्तुति की गई है (याद रहे निर्जीव चीजों की स्तुति का नाटक करना भोले भाले लोगों को उल्लू बनाकर ठगने की आर्यों की एक विशेष कला है)वास्तव में अग्नि के अत्यधिक दैनिक उपयोग के कारण और विध्वंसक शक्ति से भयभीत वैदिक आर्यों ने इसकी स्तुति मुक्तकण्ठ से की है,इसका महत्त्व इसी बात से स्पष्ट है कि ऋग्वेद के अधिकांश मण्डलों का प्रारम्भ ही अग्नि विषयक सूक्तों से होता है,माता के रूप में मान कर इसे ' त्र्यम्बक कह दिया गया,दस अंगुलियों द्वारा प्रज्वलित किए जाने के कारण इसे दस युवतियों की सन्तान भी कहा गया है अरणियों के घर्षण में बल की आवश्यकता होती है ,अतः इसे बल का पुत्र भी कहा गया है त्वामाहुः सहसस्त्रमङ्गिरः ' तथा सहसः सनुः बड़वानल रूप में यह जल से भी उत्पन्न होता है - ' अपां नपात् वनों का भक्षण करना , अन्धकार नष्ट करना , देवताओं को यज्ञ में लाना , उनके लिए हवि वहन करना अग्नि के प्रमुख कार्य हैं,यह देवताओं और मनुष्यों के बीच दौत्यकर्म सम्पादित करता है - ' अग्निर्वे देवानां होता अग्नि द्वारा रक्षित यज्ञ ही देवताओं तक पहुँचता है
बृहस्पति - ऋग्वेद में बृहस्पति का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण देवता के रूप में परिगणन हुआ है,(याद रहे यह बृहस्पति कोई देवता और भगवान नहीं बल्कि बृहस्पति ग्रह है पर ढोंगियों के चंगुल में फंसकर यह ग्रह भी देवता बन गया और ठगों की ठगी का भी एक माध्यम बन गया),लगभग ११ सूक्त बृहस्पति देवता को समर्पित हैं ।।बृहस्पति के सात मुख ,सुन्दर जिल्ला ,तीक्ष्णभंगुर और सौ पंख हैं ,(वाह भाई वाह लो एक विशालकाय ग्रह पंख लगाकर उड़ा भी दिया,उसका वर्ण सोने के समान तेजस्वी एवं वाणी स्पष्ट है (लो भाई एक निर्जीव ग्रह को बुलवा भी दिया),उसके अस्त्रों में मुख्य धनुष ,वाण ,सुवर्णनिर्मित परशु है ,(यह कैसा देवता जो हत्या करने के अस्त्र सस्त्रों से लैस है),उसके रथ में ताम्रवर्ण के अश्व जुते रहते हैं ' (लीजिये बस यही एक कमीं रह गयी थी,एक विशाल ग्रह को रथ पर भी सवार कर घोड़ों से चलवा भी दिया),बृहस्पति का जन्म अन्तरिक्ष में व्याप्त महातेज से हुआ है बृहस्पति गुरुपुरोहित हैं , समस्त प्राचीन विद्वानों में वे ही वरिष्ठ हैं (लो भाई एक ग्रह को विद्वान भी बना दिया),बृहस्पति का अनुगमन ऋक्वत् आदि गण करते हैं ,जिस कारण इसे ' गणपति भी कहा गया है समस्त स्तावक मंत्रों का कर्ता बृहस्पति ही है मानवीय पुरोहितों को स्तुति मंत्रों का कथन उसी के द्वारा हुआ है बृहस्पति इन्द्र का मित्र एवं सहायक है ' इन्द्र के समान ही वह भी सोमपा है बृहस्पति अपने स्तावक भक्तों पर महती अनुकम्पा करता है, ' शुद्धाचारी मनुष्य को वह समस्त संकटों से मुक्त करके उसे पर्याप्त धन - समृद्धि प्रदान करता है  ' (वाह भाई वाह बस एक यही कमी थी वह भी पूरी हो गयी),परोपकारी स्वभाव से ही उसे पालक कहा जाता है.
विश्वकर्मा-वे प्राज्ञ और शक्ति - सम्पन्न हैं , वे सर्वोच्च संदृक् हैं वे धाता और विधाता हैं , क्योंकि उन्होंने ही पृथिवी को उत्पन्न किया और आकाश को अनावृत किया है,सम्भव है कि विश्वकर्मा शब्द पहले पहल सूर्यदेव का विशेष बनकर उनके साथ संपृक्त हुआ हो और उत्तर - वैदिककाल में पहुँच कर यह उस ‘ एक देव का पर्याय बन गया हो ' , जिसकी कल्पना धीरे - धीरे विकसित हो रही थी और जो विश्वकर्मा के रूप में सबका त्वष्टा बनकर उभर रहा था ब्राह्मणों में विश्वकर्मा का तादात्म्य प्रजापति के साथ स्थापित किया गया है,और वेदोत्तरकाल में वे देवताओं के तष्टा समझे जाने लगे थे.
अदिति - ऋग्वेद में ये आदित्यगण की माता के रूप में प्रस्तुत हैं,
मैक्डानल के अनुसार ' अदिति देवी के लिए ऋग्वेद में एक भी सकल सूक्त नहीं कहा गया है , किन्तु यह प्रासंगिक रूप से यत्र - तत्र आ विराजती हैं उनका नाम लगभग अस्सी बार आता है कुछ गिने चुने स्थलों पर उनका अकेले भी उल्लेख हुआ है दिति -' दिति ' अपने नाम के शब्द - विन्यास के कारण अदिति के विपरीतार्थ का बोध कराती है,ऋग्वेद में दिति का नाम कुल तीन बार आया है , जिनमें से दो बार अदिति के साथ उल्लेख है,पाँचवें मण्डल के बासठवें सूक्त के एक मन्त्र में कहा गया है कि ' हे ' मित्र और वरुण !तुम उषाकाल में सूर्योदय होने पर , यज्ञ में आते समय सुवर्णमय रथ पर चढ़ो,तुम्हारा रथ सूर्यास्त के समय लोहे के स्थूणों से युक्त होता है ,अपने उस रथ से तुम अदिति एवं दिति को देखो ' सोम - वेदों में सोम देवता का बहुत महत्त्व वर्णित है,ऋग्वेद का पूरा नवम मण्डल ‘ पवमान सोम है इसमें सोम की नाना रूपों में स्तुति है सोम का अर्थ मुख्य रूप से सोमलता है परन्तु इसके अन्य अर्थ भी हैं - चन्द्रमा ,राजा , परमात्मा आदि ।सोमयाग में सोम रस का ही मुख्य रूप से उपयोग होता है-सोमलता -सोमलता के विषय में ऋग्वेद का कथन है कि यह मूजवत् पर्वत पर होती है , अत : इसे मौजवत कहते हैं,
चौबीस प्रकार के सोम का वर्णन हैं - अंशुमान् , मुंजवान् , चन्द्रमा , रजतप्रभ आदि सभी सोमों में पन्द्रह पत्ते होते हैं ये शुक्लपक्ष में निकलते हैं और कृष्णपक्ष में झड़ जाते हैं सोम के उत्पत्ति स्थान ये हैं - हिमालय ,अर्बुद ,सह्य , महेन्द्र ,मलय पर्वत यह सिन्धु नदी के समीप भी होता है इसका पौघा एक से डेढ़ फीट ऊँचा होता है और इसकी शाखाएँ प्रायः जड़ से ही निकलती हैं-
  (नोट-ऐसी कचरा,अधकचरा,बेसिरपैर और निरर्थक तथा उबाऊ जानकारी अभी तक मैं बड़ी मेहनत करके भी मैं मात्र इसलिए पब्लिस कर रहा हूँ,ताकि आप सभी लोग भी जान सकें कि आखिर इनके वेदों में ज्ञान और विज्ञान है कहाँ .?.
लेकिन आगे बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां आपको जरूर उपलब्ध कराऊंगा जिसके लिए बनें रहिये प्लेटफार्म पर--
   ऋग्वेद-प्रष्ठ-23-24-25-26.
         .......क्रमशः........
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ऋग्वेद का विचित्र खगोलविज्ञान 

आर्य समाजी कहते है कि वेदो मे आज आधुनिक विज्ञान से भी ज्यादा विकसित विज्ञान है. 

देखीये ऋग्वेद का खगोलविज्ञान क्या कहता है. 

दिप्तीमान और सर्वप्रकाशक सुर्य! हरित् नाम के सात #घोडे रथ मे तुम्हे ले जाते है.किरणे हि तुम्हारे #केश है. 
(मंत्र 8) 

(इस मंत्र के अनुसार सुर्यदेव 7 घोडो के रथ मे बैठकर गतीमान है.प्रकाश उसके केश(बाल)है ) 

सुर्य ने रथवाहिका सात #घोडीयों को #रथ मे संयोजित किया. 
उन संयोजित घोडीयों द्वारा सुर्य गमन करते है. (मंत्र 9) 

(इंडियन प्रेस,(पब्लिकेशन्स),प्रयाग,ऋग्वेद सायणभाष्य हिंदी अनुवाद,पंडित रामगोविंद त्रिवेदी,पृष्ठ 67) 

आधुनिक विज्ञान कहता है हमारे सौरमंडल मे सुर्य स्थिर है और पृथ्वी समेत अन्य ग्रह सुर्य कि परिक्रमणा करते है. 
वेदो के अनुसार सुर्य सात घोडो के रथ मे बैठकर गतीमान है. 
इससे सिद्ध होता है कि वेद लिखने वालो को आधुनिक विज्ञान तो क्या प्राथमिक विज्ञान कि भी जानकारी नही थी. 

वेदो मे प्रकाश को सुर्य के केश(बाल) भी कहा गया है,जबकी ऐसा नही है. 
प्रकाश सुर्य के बाल ना होकर फोटाॅन कण होते है. 
लेकिन ये बात वेद लिखने वाले आर्यो को नही पता थी.


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---ऋग्वेद----?????...
भारत के सर्वनाश की कहानी आर्यों के वेदों की जुबानी--

ढूंढते रहिये आर्यों के ऋग्वेद में ज्ञान और विज्ञान क्योंकि वेदों में कोई ज्ञान विज्ञान नहीं बल्कि भारत के सर्वनाश का फरमान है-
---जानिए--

अव स्य शूरध्वनो नान्तेऽस्मिन्नो अद्य सवने मन्दध्यै ।शंसात्युक्थमुशनेव वेघाश्चिकितुषे असुर्याय मन्म ।।२ ।।

हे शत्रुओं को अभिमत करने वाले इन्द्रदेव !इस माध्यन्दिन के सवन में आप हम लोगों कर हतिको विमुक्त करें , जिस प्रकार से गन्तव्य मार्ग के अन्त में मनुष्य घोड़ों को छोड़ देता है ।जिससे इस सवन में हम आपको हर्धित करे ।हे इन्द्रदेव !आप सर्वविद् हो और असुरों के हिंसक हैं ।।यजमान लोग उशना के तुल्य हम आपके लिए मनोहर स्तोत्र का उच्चारण करते हैं

यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हरीशानः ।ऋज्रा वाज न गध्ये युयूषन्कविर्यदहन्पार्याय भूषात् ।।११ ।।

शत्रुओं का वध करने वाले , वायु के तुल्य गति वाले अश्ववों के स्वामी हे इन्द्रदेव !जिस ।दिन दूरदर्शी कुत्स ग्रहणीय अन्न के तुल्य जुगामी अधद्वय को अपने रथ में युक्त करके आपत्ति से निस्तीर्ण होने में समर्थ हुए , उस दिन हे इन्द्रदेव !आपने कुत्स की रक्षा करने की इच्छा से उसके साथ एक रथ पर गमन किया ।आप शत्रुनाशक और वायु के सदृश घोड़ों के अधिपति हैं ।

कुत्साय शुष्णमशुषं नि बहः प्रपित्वे अह्नः कुयवं सहस्रा ।सद्यो दस्यून्य मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्र वृहतादभीके ।।१२ ।।

हे इन्द्रदेव !आपने कुत्स के लिए सुखरहित शुष्ण का वध किया ।दिवस के पूर्व भाव ।में आपने कुयव नाम वाले असुर को मारा ।बहुत परिजनों से आवृत होकर आपने उसी समय वज्र द्वारा शत्रुओं को भी विनष्ट किया ।आपने संग्राम में सूर्य के चक्र को छिन्न कर दिया ।।

त्वं पिप्ठं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः ।पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः ।सहस्रात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः ।।१३ ।।

हे इन्द्रदेव !आपने पिपु नामक असुर को तथा प्रवृद्ध मृगय नामक असुर का वध किया ।आपने विदीथ के पुत्र जिश्वा को बन्दी बनाया ।आपने पचास हजार कृष्णवर्ण राक्षसों का वध किया ।वृद्धावस्था जिस प्रकार से रूप को विनष्ट करती है , उसी प्रकार से आपने शम्बर के नगरों को विनष्ट कर दिया-

भिनद्भिरि शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः ।वधीवृत्र वज्रण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः ।।३ ।।|

शत्रुओं के अभिभवकर्ता इन्द्रदेव ने तेज प्रकाशित करके और बलपूर्वक वज्र का प्रेरण करके पर्वतों को विदीर्ण किया ।सोमपान से हर्षित होकर इन्होंने वज्र द्वारा वृत्रसुर को विनष्ट किया ।वृत्रासुर के विनष्ट होने पर जल आवरणरहित होकर वेग से आने लगा

सत्रा सोमा अभवन्नस्य विश्ले सत्रा मदासो बृहतो मदिष्ठाः ।सत्राभवो वसुपतिर्वसूना दत्रे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः ।।६ ।।

सम्पूर्ण सोमरस वास्तव में इन्द्रदेव के निमित्त है ।ये भदकारक सोम महान् इन्द्रदेव के लिए सचमुच हर्षकारक है ।हे इन्द्रदेव !आप धनपति हैं , केवल धनपति ही नहीं , बल्कि सम्पूर्ण पशुओं के भी पति हैं ।हे इन्द्रदेव !, धन के लिए आप वास्तव में समस्त प्रजाओं को धारित करते हैं ।

त्वमध प्रथमं जायमानोऽमे विश्वा अघिथा इन्द्र कृष्टीः ।त्वं प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण मघवन्वि वृश्चः ।।७ ।।-

 हे धनवान् इन्द्रदेव !पूर्व में ही उत्पन्न होकर आपने वृत्रभीत होकर सम्पूर्ण प्रजाओं को धारित किया ।आपने उदकवान् देश के उद्देश्य से जलनिरोधक वृत्रासुर को छिन्न - भिन्न किया ।

सत्राहणं दाधृर्षि तुम्रमिन्द्रं महामपारं वृषभं सुवज्रम् ।हन्ता यो वृत्रं सनितोत वाजं दाता मघानि मघवा सुराधाः ।।८ ।।_

अनेक शत्रुओं के हन्ता , अत्यन्त दुर्धर्ष शत्रुओं के प्रेरक , महान् , विनाशरहित , अभीष्टवर्षी और शोभन वज्रविशिष्ट इन्द्रदेव की प्रार्थना हम लोग करते हैं ।जिन इन्द्रदेव ने वृत्रासुर असुर को मारा , जो अन्नदाता और शोभन धन से युक्त हैं तथा जो धन दान करते हैं , हम उनकी प्रार्थना करते है ।

अयं शृण्वे अध जयन्नुत घ्नन्नयमुत प्र कृणुते युधा गाः ।यदा सत्य कृणुते ।मन्युमिन्द्रो विश्वं दृळ्हं भयत एजदस्मात् ।।१० ।।।

शत्रुविजयी और शत्रुहिंसक होकर इन्द्रदेव सभी जगह प्रख्यात हैं ।ये शत्रुओं के पास से पशुओं को छीन लाते हैं ।इन्द्रदेव जब वास्तव में कोप करते हैं , तब स्थावर और जंगमरूप समस्त जगत् इनसे डरने लगता है ।

समिन्द्रो गा अजयत्सं हिरण्या समश्विया मघवा यो ह पूर्वीः ।एभिर्नुभिर्तृतमो अस्य शाकै रायो विभक्ता संभरश्च वस्वः ।।११ ।।।

जिन धनवान् इन्द्रदेव ने असुरों को जीता ,शत्रुओं के रमणीय धन को जीता ,अश्वसमूह को जीता तथा अनेक शत्रुसेनाओं को जीता ,वे सामर्थ्यवान् नेतृश्रेष्ठ स्तोताओं द्वारा प्रार्थित होकर पशुओं के विभाजक तथा धन के धारक हों

क्षियन्त त्वमक्षियन्तं कृणोतीयर्ति रेणुं मघवा समोहम् ।विभञ्जनुरशनिमॉइव ।द्यौरुत स्तोतारं मघवा वसौ धात् ।।१३ ।।

हे धनवान् इन्द्रदेव !आप निराश्रितों को आश्रय प्रदत्त करते हैं और किए गए पापों को विनष्ट करते हैं ।आप द्युलोक के सदृश सुदृढ़ वज्र धारण करने वाले हैं , क्योंकि आप शत्रुओं का संहार करने वाले हैं ।आप धनवान् है ;इसलिए प्रार्थना करने वालों को धन प्रदान करते हैं

गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः ।जनीयन्तो जनिदामक्षितोतिमा च्यावयामोऽवते न कोशम् ।।१६ ।।।

हम मेधावी स्तोता गौओं की अभिलाषा करते हैं ,अश्वों की अभिलाषा करते हैं ,अन्न की अभिलाषा करते है और स्त्री की अभिलाषा करते हैं हम मित्रता के लिए कामनापूरक , भायप्रद और सर्वदा रक्षक इन्द्रदेव को , लोग जिस प्रकार से प्यासे लोग कुओं में जलपात्र को भरकर निकालते हैं ,उसी प्रकार अवनमित करेंगें

किमु विदस्मै निविदो भनन्तेन्द्रस्यावद्यं दिधिषन्त आपः ।ममैतान्पुत्रो महता ।|वधेन वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून् ।।७ ।।" 

वृत्रवध से ब्रह्महत्यारूप पाप को प्राप्त करने वाले इन्द्रदेव को वेद - वाणी क्या कहती है ? जल फेनरूप से इन्द्रदेव के पाप को धारित करता है । मेरे पुत्र इन्द्रदेव ने महान् वज्र से वृत्रासुर का वध किया और इन नदियों को प्रवाहित किया । ' ' 

ममचन त्वा युवतिः परास ममचन त्वा कुषवा जगार । ममचिदापः शिशवे । ममृड्युर्ममच्चिदिन्द्रः सहसोदतिष्ठत् । । ८ । । । 

वामदेव कहते हैं — “ आपकी युवती माता अदिि ने हर्षित होकर आपको उत्पन्न किया । कुपवा नाम का राक्षसा न प्रमत्त होकर आपका ग्रास बनाया है इन्द्रदेव ! उत्पन्न होने पर आपको जलसमूह ने प्रमत्त होकर सुखी किया । इन्द्रदेव हर्षित होकर अपने वीर्य के प्रभाव से सूतिकागृह में राक्षसी को निगलने का प्रयास किया था ।

 ' ' कस्ते मातरं विधवामचक्रच्छयु कस्त्वामजिघांसच्चरन्तम् । कस्ते देवो अघि माडीक । आसीद्यत्प्राक्षिणाः पितरं पादगृह्य । । १२ । । । ।

 “ हे इन्द्रदेव ! आपके अतिरिक्त किस देव ने माता को विधवा किया ! आप जिस समय । शयन कर रहे थे अथवा जाग रहे थे , उस समय किसने आपको मारना चाहा ? कौन देवता सुख देने में आपकी अपेक्षा अधिक है ? किस कारणवश आपने पिता के दोनों चरणों को पकड़कर । उनका वध किया ? ' 

अवर्या श्रुन आत्राणि पेचे न देवेषु विविद मङितारम् । अपश्यं जायाममहीयमानामधा मे श्येनो मध्वा जभार । । १३ । । । 

“ हमने भूख से पीड़ित होकर कुत्ते की अंतड़ी को पकाकर खाया । हमने देवों के बीच में इन्द्रदेव के अतिरिक्त अन्य देव को सुखदायक नहीं पाया । हमने अपनी पत्नी को असम्मानित होते देखा । इसके अनन्तर इन्द्रदेव हमारे लिए मधुर जल लावे । ' '

 ' ' सूक्त - १९ ।( ऋषि - वामदेव गौतम । देवता - इन्द्र । छन्द - त्रिष्टुप् । एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः । महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिवृणते वृत्रहत्ये । । १ । । । 
हे वज्रवान् इन्द्रदेव ! इस यज्ञ में शोभन आह्वान से युक्त तथा रक्षक निखिल देवगण और दोनोंद्यावा - पृथ्वी वृत्रवध के लिए एकमात्र आपका ही आवाहन करती हैं । आप स्तूयमान् , महान् गुणोत्कर्ष से प्रवृद्ध और दर्शनीय हैं । 

अवासृजन्त जिव्रयो न देवा भुवः सम्राळिन्द्र सत्ययोनिः । अहन्नहिं परिशयानमर्णः प्र वर्तनीररदो विश्वधेनाः । । २ । ।

 हे इन्द्रदेव ! वृद्ध पिता जिस प्रकार से युवा पुत्र को प्रेरित करते हैं , उसी प्रकार देवगण आपको असुरवध के लिए प्रेरित करते हैं । हे इन्द्रदेव !आप सत्य विकास - स्वरूप है । तब से
आप समस्त लोकों के अधीश्वर हुए है ।जल को लक्ष्य करके परिशयन करनेवाले वृत्रासुर : आपने वध किया ।सबको प्रसन्न करने वाली नदियों का आपने ही खनन किया 

।।अतृप्णुवन्तं वियतमबुध्यमबुध्यमानं सुषुपाणामिन्द्र ।सप्त प्रति प्रवत आशयानमः ।वज्रेण रिणा अपर्वन् ।।३ ।।

हे इन्द्रदेव !आपने भोग में अतृप्त , शिथिलाङ्ग , दुर्विज्ञान , अज्ञान - भावापन्न , सुप्त और सपणशील जल को आच्छादित करके सोनेवाले वृत्रासुर को पौर्णमासी में वज्र द्वारा मारा

अभि प्र दर्जनयो न गर्भ रथाइव प्र ययुः साकमद्रयः ।अतर्पयो विसृत उब्ज ।ऊर्मान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून् ।।५ ।।-

 हे इन्द्रदेव !माताएँ जिस प्रकार पुत्र के निकट गमन करती हैं , उसी प्रकार मरुतों ने आपके निकट गमन किया , जिस प्रकार से वृत्रासुर को मारने के लिए आपके साथ वेगवान् रथ ।गया ।आपने विसरणशील नदियों को जल से पूर्ण किया ;मेघ को भग्न किया और वृत्रासुर द्वारा ।आवृत जल को प्रवाहित किया

प्रागुवो नभन्वो३न वक्वा ध्वस्रा अपिन्वद्युवतीऋतज्ञाः ।धन्वान्यज्राँ अपृणकृषाणों अधोगिन्द्रः स्तर्यों३दंसुपत्नीः ।।७ ।।
इन्द्रदेव ने शत्रुहिंसक सेना के तुल्य तटध्वंसिनी , जलयुक्ता तथा अन्नजनयित्री नदियों को ।भली - भाँति पूर्ण किया ।इन्होंने दस्युओं द्वारा नियन्त्रित गौओं को दुहा 

।|पूर्वीरुषसः शरदश्च गूर्ता वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून् ।परिष्ठिता अतृणद्वद्वधानाः ।सीरा इन्द्रः स्ववितवे पृथिव्या ।।८ ।।

वृत्रासुर को मारकर इन्द्र ने तमिस्रा द्वारा आच्छादित अनेक उषाओं को तथा संवत्सरों को विमुक्त किया एवं वृत्र द्वारा निरुद्ध जल को भी विमुक्त किया ।इन्द्रदेव ने मेघ के चारों ओर वर्तमान तथा वृत्र द्वारा अवरुद्ध नदियों को प्रवाहित कर पृथ्वी को तृप्त किया ।।
   यहाँ आपनें पुनः देखा कि किस तरह हिंसक आर्य इन्द्र नें भारत के शम्बर तथा वृत्तासुर जैसे सैकड़ो मूलनिवासी राजाओं को मौत के घाट उतार दिया केवल एक ही युद्ध में पचास हजार अनार्य सैनिकों के बध का जिक्र है मूलनिवासियों के पानी के बांध तोड़ दिए उनका पशुधन लूट लिया खाने पीने का सब सामान लूटकर अपने आर्यों को दे दिया,तथा महिलाओं बच्चों और पुरुषों को बंदी बनाकर गुलाम बना लिया,नगर के नगर विध्वंस कर नेस्तनाबूद कर दिए,तथा भारत की सभ्यता संस्कृति को छिन्न भिन्न कर दिया-
   क्या यही हैं देवताओं के लक्षण कि खूब सोमरस पियो और दूसरों की चल अचल संपत्ति लूटो लोगों का कत्लेआम करो,पानी के बांध तोड़कर लोगों को प्यासा मारो-आज ये लोग शाकाहारी का नाटक करते हैं जबकि इन्होने अपने वेदों में ही लिखा है कि ये कुत्ते को मारकर उसकी अंतड़ियों को भी पकाकर खा गए,दरअसल वेदों में कोई ज्ञान विज्ञान नहीं बल्कि भारत के सर्वनाश की दिल दहला देने वाली हकीकत लिखी है,और अधिक जानकारी के लिये बने रहिये प्लेटफार्म पर ताकि जान सकें भारत के सर्वनाश की कहानी आर्यो के वेदों की जुबानी-
ऋग्वेद-भाग-२-
पृष्ठ-११७-११८-११९-१२०-१२१-१२२-१२४-१२५-१२६.
        ---------मिशन अम्बेडकर.
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
https://www.facebook.com/groups/405657667349424/?ref=shareमिशन अंबेडकर इंटरनेशनल नेटवर्क 🌏 symbol of knowledge बाबा साहब अंबेडकर 
🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती

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