क्या हनुमान मनुष्य थे ?
आर्य समाजीओ के अनुसार हनुमान बंदर ना होकर एक आर्य मनुष्य थे जो वेदो के विद्वान और व्याकरण तज्ञ थे.
लेकिन आर्य समाज के इस मत खंडन वाल्मिकी रामायण के श्लोक से होता है जब लंका मे सिता हनुमान से पुछती है 👇
कपिवर! तुम्हारा श्रीरामचंद्र जी के साथ संबंध कहा हुआ ? तुम लक्ष्मण को कैसे जानते हो ?
मनुष्यो और वानरो का यह मेल किस प्रकार हुआ ?
(वाल्मिकी रामायण,सुंदरकाण्ड 35, श्लोक 2)
यहा सिता ने स्पष्ट शब्दो मे पुछा है कि मनुष्यो और वानरो का यह मेल किस प्रकार संभव हुआ ?
यहा सिता ने मनुष्य और वानर का अलग उल्लेख किया है.
सिता के सवाल ये बाद सिद्ध होती है कि मनुष्य और वानर एक नही थे.
अंतः हे सिद्ध है कि वाल्मिकी रामायण के वानर मनुष्य जाती ना होकर बंदर हि थे.
और हनुमान भी काल्पनिक बंदर थे.
क्योंकी बंदर का बोलना उडना ये सब काल्पनिक कथाओ मे हि होता है.
■■■■■■■
पवन देवता का नाम तो सभी जानते होंगे, ये महाबली हनुमान के पिता भी थे और यज्ञादि अनुष्ठानों मे मंत्रों द्वारा पुरोहित जी इनका आह्वान भी करते हैं।
कहने को तो पवनदेव को देवता होने की उपाधि प्राप्त है, पर इनके कर्म देवों वाले तो बिल्कुल नही थे।
इन्होने पहले अपनी काम-पिपासावश अंजना को सम्मोहित करके उससे मैथुन किया और हनुमान को पैदा किया।
(पवनदेव ने किस निर्लज्जता से अंजना को बहलाकर उसके साथ समागम किया यह जानने के लिये रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-66 (चित्र-1,2) को पढ़े।)
इन्ही कामपिपासु पवन देवता की एक और कथा रामायण बालकाण्ड सर्ग-32 (चित्र-3,4) मे मिलती है।
कथानुसार, पूर्वकाल मे एक कुशनाभ नामक राजा थे, जिनकी पत्नि घृताची नामक अप्सरा थी। कुशनाभ ने घृताची अप्सरा से सौ सुन्दर पुत्रियों को जन्म दिया था।
जब कुशनाभ की पुत्रियाँ जवान हुई तो एक दिन वे वाटिका मे खेल रहीं थी! अचानक पवनदेव की नजर कुशनाभ की पुत्रियों पर पड़ी और वे उनकी सुन्दरता देखकर कामाग्नि मे जलने लगे।
पवनदेव से रहा न गया और वे कुशनाभ की पुत्रियों के पास आकर कहने लगे कि "हे देवियों! मै आपके सामने प्रेम-प्रस्ताव रखता हूँ, आप लोग मेरी पत्नियाँ बन जाओ।"
यही नही, पवनदेव ने कुशनाभ की पुत्रियों को फुसलाने के लिये यह भी कहा कि "मानव-शरीर की जवानी कभी स्थिर नही रहती, वह समय के साथ ढ़ल जाती है, यदि तुम लोग मानवीय-भाव का त्याग करके मुझे अंगीकार करोगी तो मेरे साथ सम्बन्ध हो जाने से तुम लोग अक्षय-यौवन को प्राप्त करोगी और दीर्घायु होकर अमर हो जाओगी।"
कुशनाभ की पुत्रियाँ मर्यादा को जानती थी और वे सब अपने पिता की आज्ञाकारी थी, अतः उन्होने पवनदेव के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और उन्होने पवनदेव से कहा कि "हे दुर्मते! वह समय कभी न आये जब हम अपने सत्यवादी पिता की अवहेलना करके कामवश स्वयं ही अपना वर ढ़ूढ़ने लगे। हम लोगों पर हमारे महान पिताजी का प्रभुत्व है, वही हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं और पिताजी हमारा हाथ जिसके हाथ मे दे देंगे, वही हमारा पति होगा"
पवनदेवता उन लड़कियों की बात सुनकर समझ गये कि यहाँ दाल नही गलने वाली, साथ ही उनके सारे प्रलोभन भी विफल हो चुके थे। पवनदेव ने जब समझ लिया कि ये सुन्दरियाँ हाथ से फिसल चुकी है, तब उनकी हालत पागलों जैसी हो गयी, और उन्होने क्रोध मे आकर उन सभी राजकन्याओं के शरीर मे प्रविष्ट होकर उनके उनके अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया! ऐसा करने से वे सुन्दर राजकन्याऐं कुबड़ी हो गयी।
सोचो, एक कामी, हवसी की बात न मानने पर उस स्त्री-लम्पट ने उन लड़कियों की क्या हालत कर दी!
आखिर उन लड़कियों का अपराध क्या था?
लेकिन इतने सारे कुकर्मों के करने वाले ये वहसी पवनदेव अभी भी देवता हैं!
सवाल यह है कि क्या यही देवत्व है?
ऐसा नीचकर्म तो कभी असुर भी नही करते होंगे, लेकिन चूँकि ये देवता हैं इसलिये इनके कुकर्मों की पर्दापोशी की जाती है।
यही वजह है कि मै इन देवताओं का बिल्कुल सम्मान नही करता, और ये सम्मान के योग्य थे भी नही।
:":"अमित कुमार भारती ":":
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
https://www.facebook.com/groups/405657667349424/?ref=shareमिशन अंबेडकर इंटरनेशनल नेटवर्क 🌏 symbol of knowledge बाबा साहब अंबेडकर
🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती
■■■■■
हनुमान चालीसा का दोहा तो लगभग सबने पढ़ा ही होगा-
"नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत वीरा।।"
यहाँ तुलसीदास लिखते हैं कि जो निरन्तर हनुमान का नाम जपता है, उसके सारे दर्द और रोगों का नाश हो जाता है!
अब मै आपको तुलसी बाबा की जीवनी बताता हूँ, तुलसीदास की मृत्यु बड़ी भयंकर हुई थी! इनके पैरों मे बेवाई फट गयी थी और इनके हाथ भी काम करना बन्द कर दिये थे, तथा बाहों मे भयंकर दर्द होता था!
दर्द से तुलसीदास न तो भजन कर पाते थे, और न ही पूजन!
इसी दर्द के निवारण के लिये तुलसीबाबा ने 'हनुमान बाहुक' लिखी थी!
तुलसीदास दर्द से तड़पते हुये राम से प्राथना करते हैं-
"बाँह की बेदन बाँह पगार, पुकारत आरत आनन्द भूलो।
श्रीरघुवीर निवारियो पीर, रहौं दरबार परो लटि लूलो।।"
(हनुमान बाहुक-36)
अर्थात- हे श्रीराम! बाहों की पीड़ा से सारा आनन्द भुलाकर दुःखी होकर पुकार रहा हूँ! हे रघुवीर मेरी पीड़ा दूर करो जिससे मै दुर्बल और पंगु होकर भी आपके दरबार मे पड़ा रहूँ!
वास्तव मे तुलसीदास लूले हो चुके थे, उन्हे पता चला गया था कि राम के नाम से उनका काम नही होने वाला, अन्ततः तुलसीदास ने तंत्र-मंत्र करना शुरू कर दिया!
हनुमान बाहुक-30 मे तुलसीदास ने लिखा है-
"आपने ही पापतें त्रितापतें कि सापतें,
बढ़ी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है।
औषध अनेक तंत्र-मंत्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है।।"
अब इसे तो पढ़कर ही हंसी आती है कि जो तुलसी दावा करते थे कि राम उनसे मिलने आते थे, वो कह रहे हैं कि बाहों की पीड़ा इतनी बढ़ी है कि औषधि, तंत्र-मंत्र सब कर लेने के बाद भी राहत नही मिलती!
तुलसी बाबा जीवन भर दूसरों को जातिसूचक गाली देते रहे, और अन्त मे ऐसी स्थिति मे पड़ गये कि सारी हेकड़ी निकल गयी!
तुलसीदास की हालत कैसी थी वह हनुमान बाहुक की घनाक्षरी-38 से समझी जा सकती है!
"पाँयपीर, पेटपीर, बाँहपीर, मुँहपीर,
जरजर सकल शरीर पिरमई है।
देव, भूत, पितर, करम, खल, काल, ग्रह,
मोहिपर दवर दमानक सी दई है।।"
अर्थात- पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, मुँह की पीड़ा, और बाँहों की पीड़ा से शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया है! ऐसा लगता है कि देवता, प्रेत, पितर, काल और ग्रह सब एक साथ मेरे ऊपर तोपों की बाड़ सी दे रहे हैं!
इसे गौर करना रामभक्तो! ये हालत थी राम के बड़े वाले तथाकथित भक्त की! यह बातें किसी और ने नही, खुद तुलसीदास ने लिखी है!
तुलसी बाबा दुनिया को सलाह दे गये कि हनुमान के नाम से दर्द और पीड़ा भाग जायेगी, पर खुद तो फन कुचलें सांप की तरह तड़प रहे थे!
मै विश्वास से कहता हूँ कि जो एक बार हनुमान बाहुक पढ़ेगा, उसे तुलसी की दशा पर रोना आयेगा और उसी समय उसके मन से रामभक्ति हवा हो जायेगी!
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
https://www.facebook.com/groups/405657667349424/?ref=shareमिशन अंबेडकर इंटरनेशनल नेटवर्क 🌏 symbol of knowledge बाबा साहब अंबेडकर
🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती
No comments:
Post a Comment