---क्रांति की चिंगारियां---
"वैज्ञानिक चार्ल्स डारविन"-
जब से इन्सान ने सोचना शुरू किया है ,उसे अन्य अनेक प्रश्नों के साथ - साथ ये प्रश्न भी चक्कर में डालते रहे हैं कि वह कहां से आया,और यह दुनिया कैसे अस्तित्व में आई ? इस प्रश्न का उत्तर हर युग के इन्सान ने अपनी - अपनी बुद्धि से देने की कोशिश की ,किसी ने कुछ उत्तर दिया , किसी ने कुछ , इन उत्तरों में से कुछ इस प्रकार हैं जैसे-
ऋग्वेद ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा है : सं बाहुश्यों धमति से पतत्रैद्यवाभूमी जनयन्देव एकः ( ऋग्वेद 10 - 91 - 3 ) अर्थात् : यही एक ईश्वर द्यौः ( आकाश ) और पृथ्वी का निर्माण अपने दो हाथों और पंखों से करता है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः
।।ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ।।
( ऋग्वेद 10 - 90 - 12 , यजुर्वेद 31 / 11 )
अर्थात् : ब्राह्मण ईश्वर के मुख से , क्षत्रिय उसकी बाहें , वैश्य उसकी जंघाएं और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए,ईश्वर के मन से चांद जन्मा ,आंखों से सूर्य ,मुख से इन्द्र और अग्नि ,प्राणों से वायु ( 13 ) नाभि से अंतरिक्ष ,सिर से द्यौ ( आकाश ) , पैरों से भूमि , कानों से दिशाएं ( 14 ) उससे घोड़े , ऊपर - नीचे दांत वाले जानवर , गायें , भेड़ें और बकरियां उत्पन्न हुई ( 10 ) उससे जंगली जानवर और ग्राम्य जानवर उत्पन्न हुए ( 8 ) ( पुरुषसूक्त ' ) हिन्दुओं के अन्य परवर्ती ग्रंथों में दूसरे कई उत्तर हैं ,कहीं ब्रह्मा की नाभि से जगत् की उत्पत्ति है ,कहीं विष्णु से परन्तु इन सब का सार यही है कि ' उनके किसी परमात्मा ' ने सृष्टि की रचना की है चाहे उसका नाम ब्रह्मा हो या विष्णु ,बाईबल के हवाले से ईसाइयों का कहना है कि परमात्मा ने सारा संसार मात्र 6 दिनों में बनाया .उसने कहा ' यह ' हो जाए , तो ' यह ' बन गया ,उसने कहा ' वह ' बन जाए , तो ' वह ' बन गया,अंतिम दिन उसने मनुष्य की रचना की,उसने भूमि की मिट्टी से आदमी को रचा और उसके नथूनों में जीवन का श्वास फेंक दिया तथा आदम जीवित प्राणी बन गया,उसकी सहायता के लिए उसकी पसली तोड़ कर नारी को बना दिया गया परमेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया - फूलो फलो और पृथ्वी को भर दो लगभग ऐसी ही बातें ' कुरान ' में कही गई हैं,कुछ लोगों ने तो इस प्रश्न से तंग आकर यही घोषित कर दिया था कि यह गोरखधंधा सुलझाया नहीं जा सकता,ऋग्वेद के एक सूक्त में कहा है : को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।।अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ।।इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥।( ऋग्वेद 10 - 129 - 5 , 7 ) अर्थात् : सचमुच क्या था ,कौन जानता है और कौन बता सकता है ? वे स्वयं कहां से उत्पन्न हुआ और कहां से सृष्टि की उत्पत्ति हुई ? क्या देवताओं का जन्म सृष्टि के साथ हुआ या पश्चात् ?कौन जानता है कि कब क्या कहां से उत्पन्न हुआ ?( 5 ) यह सृष्टि कहां से उत्पन्न हुई अथवा इसका कोई आधार है या नहीं ,यह सब कुछ वही जानता है जो परम आकाश में सर्वत्र व्याप्त है , अथवा हो सकता है कि वह भी न जानता हो ( 7 ) ,इस प्रकार के विचार बहुत कम लोगों के थे,इन्होंने यद्यपि हार मान ली तथापि वे ईमानदार तो थे ही , परन्तु ' उत्तर ' देने वालों ने अपनी या अपने पूर्वजों की कल्पनाओं को न केवल स्वयं बिलकुल सही कहा बल्कि दूसरों को ,जो इन उत्तरों से असंतुष्ट होने के कारण अपने बूते पर नए उत्तर खोजने के लिए प्रयत्नशील थे ,इन्हें सही मानने को विवश किया -उन्हें उत्पीड़ित किया ,दंड दिए,यहां तक कि उनके प्राण भी ले लिए बाईबल की कल्पनाओं के विपरीत भौतिक तथ्यों को उजागर करने के कारण कोपरनिकस ,ब्रूनो ,गैलिलिओ आदि पर जो अत्याचार हुए वे सर्वविदित हैं,लेकिन मानव मन जड़ नहीं ,वह गतिशील है,वह अनन्त सम्भावनाओं से परिपूर्ण है,12 फरवरी ,1809 ईस्वी में श्रुसबेरी ( इंग्लैंड ) में चार्ल्स डारविन ( Charles Darwin ) नामक लड़का पैदा हुआ और उसने उक्त प्रश्न का हल खोजने के प्रयास में मानवीय ज्ञान में जो वृद्धि की ,उसके परिणाम स्वरूप एक अभूतपूर्व क्रांति पैदा हो गई,उसने परम्परागत उत्तरों को रेत की दीवार के समान धराशायी कर दिया और उन लोगों की नींद हराम कर दी जो सब कुछ जानने का दावा करते थे और उन ग्रंथों पर अमिट प्रश्नचिह्न लगा दिए जो तथाकथित जगत -निर्माता की रचना बताए जाते थे, वैज्ञानिक डार्विन की इस देन का मूल्यांकन करते हुए,देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय लिखते हैं कि-मनुष्य के ज्ञान भण्डार में वह जो कुछ दे गए हैं , उसका मोल हम कभी नहीं चुका पाएंगे,विज्ञान की सिर्फ एक शाखा में ही नहीं -प्राणीशास्त्र या बायोलौजी के क्षेत्र में ही नहीं - मनुष्य के पूरे चिन्तन -जगत में डारविन एक प्रचंड उथल -पुथल शुरू कर गए हैं,दर्शन - चिन्तन में , समाज शास्त्रीय - चिन्तन में और अर्थनीतिक - चिन्तन में भी डारविन एक आंधी सी उठा गए हैं,उस आंधी में पुरानी गलत - सलत धारणाएं सड़े पत्तों की तरह उड़ गई,मनुष्य सत्य को पहचानने का रास्ता देखने लगा ,विज्ञान के सत्य को ,जीवन के सत्य को पहचानने का रास्ता ,उस सत्य को पहचानने का ,जिसे पहचान कर मनुष्य और भी बड़ा हो सकेगा भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पी डॉ.बाबासाहब अंबेडकर डारविनइज्म को बहुत बड़ी क्रांति बताते हुए लिखते हैं कि डारविन द्वारा प्रवर्तित क्रांति ने जीव - विज्ञान और भूगर्भशास्त्र को धर्म के चंगुल से मुक्त कर दिया ...डारविनइज्म ऐसा जबरदस्त धक्का था,जिसने धर्म की सत्ता को इस हद तक चूर - चूर कर दिया कि उसके बाद धर्म ने अपने खोए साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिए कभी कोशिश तक नहीं की,धर्म -साम्राज्य के इस तरह उधेड़े जाने को एक महान् क्रांति कहा जाना स्वाभाविक ही है-
--------मिशन अम्बेडकर.
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
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क्रांति की चिंगारियां--
-ब्रूनो और गैलीलिओ-
प्रस्तुत लेख ब्रूनो व गैलिलिओ नामक दो विश्व -प्रसिद्ध संघर्षशील विज्ञानियों के जीवन संघर्ष की एक झांकी प्रस्तुत करता है ,इसे पढ़ कर पता चलेगा कि किस प्रकार विज्ञान को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए धर्म के क्रूर पंजों की उंगलियां व नाखून तोड़ने पड़े और कैसे आज की स्थिति आई जब धर्म विज्ञान से समझौता करने के लिए मारा - मारा उसके पीछे बदहवास दौड़ रहा है ,जब धर्म के ठेकेदार यह कहते हैं कि धर्म की फला चीज सही है ,क्योंकि विज्ञान ने इसे प्रमाणित कर दिया है ,तो साफ है कि वे विज्ञान के प्रमाण -पत्र की बैसाखी पर धर्म को चला रहे हैं ! इसी प्रकार के प्रयत्न हैं उन लच्छेदार धार्मिक भाषण करने वालों के जिनका सारा जोर इस बात पर लगा रहता है कि धर्म विज्ञान का विरोध नहीं करता , कि धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं, स्पष्ट है ,यह कमजोर का बलवान से सुलह करने के लिए गिड़गिड़ाना मात्र है.
इस संदर्भ में यह भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि जब कभी ब्रूनो या गैलिलिओ को धर्म की बलिवेदी पर शहीद कर दिए जाने की बात चलती है ,भारतीय संस्कृति के ठेकेदार प्रायः बडे अभिमान से यह कहते हैं कि हमारी संस्कृति बहुत महान् है : हमारे यहां किसी ब्रूनो को जिन्दा नहीं जलाया गया ,हमारे यहां किसी गैलिलिओ को वैज्ञानिक अनुसंधानों के दोष में उसकी दुर्गति करके तड़पा- तड़पा कर काल -कोठरी में बंद नहीं किया गया ,परन्तु यह बात अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने से ज्यादा अहमियत नहीं रखती ,क्योंकि हकीकत में असलियत ऐसी नहीं है,हमारे यहां न केवल विज्ञानियों को शत्रु मान कर उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया , उन्हें अस्पृश्य ( अछूत ) बनाया गया ,बल्कि दार्शनिकों की भी दुर्गति की गई,महाभारत में आता है कि बुद्धिवादी दार्शनिक चार्वाक को उनके युद्ध -विरोधी एवं शांति - प्रिय विचारों के कारण जीवित जला दिया गया था ! शंकरदिग्विजय में आता है कि पद्मपाद नामक वेदांती विद्वान ने शंकर के ब्रह्मसूत्र भाष्य की एक टीका लिखी थी जिसमें मीमांसा के आचार्य प्रभाकर के मत का खण्डन किया गया था,उस टीका को खत्म करने के लिए उस घर को ही आग लगा कर राख कर दिया गया था जिसमें वह टीका रखी थी.
बुद्ध और उनके अनुयायियों को चोर के समान दण्डित किए जाने का आदेश देते हुए रामायण में श्रीराम ने कहा है : कि-
यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धः ( अयोध्या कांड , सर्ग 109 , श्लोक 34 ) इसका अर्थ हम अपनी ओर से न करके हिन्दू धर्म की प्रचारक संस्था - गीता प्रैस , गोरखपुर से प्रकाशित वाल्मीकीय रामायण ( हिन्दी अनुवाद सहित ) से उधृत करना चाहते हैं ,ताकि किसी प्रकार की शंका का अवकाश न रहे ,उक्त रामायण के पृष्ठ 303 पर इसका अर्थ इस प्रकार है : " जैसे चोर दण्डनीय होता है , उसी प्रकार ( वेद विरोधी ) बुद्ध ( बौद्ध मतावलम्बी ) भी दण्डनीय है "
अब जरा विज्ञानियों की हालत पर दृष्टिपात करें,आयुर्विज्ञान मानव के लिए बहुत उपयोगी विज्ञान है ,बीमारी ,चोट ,शस्त्र से घाव ,जानवर आदि का काटना - इन सबसे सुरक्षा प्रदान यदि कोई करता है तो वह है आयुर्विज्ञान , परन्तु हमारी ' महान ' संस्कृति ने इस विज्ञान से संबद्ध विज्ञानियों को अछूत घोषित कर दिया और उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया.
यजुर्वेद में कहा गया है कि चिकित्सा करने वाले देवता - अश्विनी कुमार अपवित्र है , क्योंकि वे आम जनता से मिलते - जुलते हैं , वे हर छूत अछूत के यहां जाते हैं ,देवताओं के दलाल पुरोहित की ' शुद्धता ' के विपरीत आचरण करते हैं ,इसलिए ब्राह्मण को तो चिकित्सा कार्य कदापि नहीं करना चाहिए-
अपूतौ वा इमौ मनुष्यचरौ भिषजौ इति । तस्मात् ब्राह्मणेन भेषजं न कार्यम् ।अपूतो हि एषोऽमेध्यो यो भिषक् ॥ । ( यजुर्वेद , तैत्तिरीय संहिता , 6 - 4 - 9 )
अश्विनी कुमार क्योंकि आयुर्विज्ञान से संबद्ध थे ,वे क्योंकि चिकित्सा कार्य करते थे , अत : देवताओं ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया , उनके साथ सोमपान करने से इन्कार कर दिया,( देखें , महाभारत ,अनुशासनपर्व , अध्याय 156 ) यही नहीं , चिकित्सक की यज्ञ में बलि देने तक का विधान बनाया गया, यजुर्वेद में जहां पुरुषमेध में बलि दिए जाने वाले व्यक्तियों की सूची दी गई है ,उसमें लिखा है :-- पवित्राय भिषजम्
( यजुर्वेद 30 / 10 )
अर्थात् : पवित्र के लिए भिषक् ( चिकित्सक ) की बलि दें ,बाद के धर्मशास्त्रों ने इस बात का हमेशा ध्यान रखा कि कहीं चिकित्सक का सामाजिक बहिष्कार खत्म न हो जाए इसलिए हर स्मृति इस विषय में आदेश देकर बहिष्कार की बात को लोगों को सदा याद करवाती रही ,गौतम ने अपने धर्मसूत्र ( 2 - 2 - 17 ) में लिखा :-
भिषक् चिकित्सकस्य अन्नमनाद्यम्
( चिकित्सक और शल्य - चिकित्सक ( = सर्जन ) का अन्न खाने के योग्य नहीं होता ),यही बात आपस्तम्ब धर्मसूत्र ( 1 - 6 - 19 - 14 , 1 - 6 - 8 - 21 ) में कही गई है ,मनु ने कहा है कि चिकित्सा करने वाले व्यक्ति का अन्न पीप के समान है ,अत : ग्रहण करने के योग्य नहीं होता - पूयं चिकित्सकस्यान्नम्
( मनु - स्मृति , 4 / 220 ) वसिष्ठ ने कहा कि वह ब्राह्मण ,ब्राह्मण नहीं रह जाता जो चिकित्सा का काम करता हैं :
ब्राह्मणो भवति न चिकित्सकः ( वसिष्ठ - स्मृति , 3 / 4 )
अत्रि ने आदेश दिया कि वैद्य सम्मान का पात्र नहीं होता ,चाहे वह बृहस्पति के समान विद्वान ही क्यों न हो :
वैद्या विप्रा न पूज्यन्ते बृहस्पतिसमा यदि .
( अत्रि - संहिता , 387 )
क्रांति की चिंगारियाँ-
पृष्ठ-26-27-28.
------मिशन अम्बेडकर
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बौद्ध दर्शन को पराजित करने के लिए रची गयी गीता
ब्राह्मणवादी विचारधारा के लोग गीता को एक महान दार्शनिक ग्रंथ मानते हैं, जबकि आंबेडकर उसे बौद्ध दर्शन को पराजित करने लिए रची गई एक प्रतिक्रियावादी किताब मानते हैं। संघ-भाजपा की सरकार गीता को एक राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की कोशिश कर रही है, क्या है गीता की असलियत बता रहें, ईश मिश्र :
भगवद्गीता के इतिहासीकरण के निहितार्थ
(भारतीय इतिहास, विशेषकर प्राचीन इतिहास को लिखने के लिए भारत सरकार ने एक 12 सदस्यीय कमेटी बनाई है। प्राचीन भारत का इतिहास नए सिरे से लिखवाने के पीछे मंशा क्या है। इस विषय पर हम कई आलेख प्रकाशित कर चुके हैं। इसी कड़ी में हम दिल्ली विश्विद्यालय में प्राध्यापक ईश मिश्र का यह लेख प्रकाशित कर रहे हैं)
‘ब्रह्मा की रची’ वर्णाश्रमी गुलामी को स्थायी बनाने और उसकी वैधता और औचित्य के लिए मिथकों तथा पुराणों के रथ पर सवार ब्राह्मणवाद की विचारधारा गढ़ी गयी। ऐतिहासिक तथ्यों को मिथकीय बनाकर पुराण लिखे गए। ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों ने न सिर्फ के बहुजन समाज को इतिहास से वंचित किया बल्कि अपनी भी भविष्य की पीढ़ियों को जाने-अनजाने में आत्म-छल का शिकार होती रहीं, जो जो खुद भी पौराणिक कथाओं को वास्तविक ऐतिहासिक घटनाएं मानने लगीं। इतिहास से वंचित समाज हजारों साल वर्णाश्रयी दासता का बोझ ढोता रहा। औपनिवेशिक शासक वर्गों द्वारा भारत में आधुनिक (पाश्चात्य) शिक्षा की शुरुआत तथा उसकी सार्वजनिक सुलभता की नीति के परिणामस्वरूप, ब्राह्मणवाद में शिक्षा से वंचित तबकों – स्त्री; दलित;पिछड़े और आदिवासी –,को भी शिक्षा की सुलभता का सैद्धांतिक अधिकार प्राप्त हो गया। पौराणिक ज्ञान पर एकाधिकार के चलते ब्राह्मणवादी वर्चस्व का राज, आधुनिक, वैज्ञानिक शिक्षा से लैस इन तबकों की समझ में आने लगा। इन्होंने ब्रह्मा के विधान के विरुद्ध बिगुल बजा दिया और पुराणों का पाखंड खंड-खंड करना शुरू कर दिया। ब्राह्मणवाद ने शातिराना अंदाज में हिंदुत्व की खोल ओढ़ ली। इतिहास के पुनर्मिथकीकरण के माध्यम से इतिहास पुनर्लेखन की भारत सरकार की कवायद, ब्रह्मणवाद की पुनर्स्थापना तथा बहुजन को इतिहास तथा ज्ञानार्जन से पुनर्वंचित करने की सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।
पुराण इतिहास का मिथकीकरण है इसलिए पुराण से इतिहास समझने के लिए, पुराणों के अमिथकीकरण की जरूरत है। चूंकि पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से राम के जन्मस्थान और जन्मदिन के नाम पर मुल्क में सांप्रदायिक नफरत और लामबंदी का उद्यम फल-फूल रहा है। अब गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की कवायद शुरू हो गई है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी विदेश-यात्राओं के दौरान मेजबान राष्ट्राध्यक्षों को गीता भेंट करना शुरू किया तो विदेशमंत्री, सुषमा स्वराज का भक्तिभाव इस कदर जागा कि उन्होंने इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग कर दिया। गीता दरअसल, ब्राह्मणवादी कर्मकांड तथा वर्णाश्रमी श्रेणीबद्धता के विरुद्ध बौद्ध वैचारिक-सामाजिक क्रांति के बाद ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि के पौराणिक प्रयासों का हिस्सा है। बाबा साहब अांबेडकर ने गीता पर अपने लेख (अधूरे), ‘प्रतिक्रांति की दर्शनिक पुष्टि: कृष्ण और उनकी गीता’[1] में शीर्षक की सार्थकता तथ्य-तर्कों तथा दृष्टांतों से स्थापित किया है। डॉ .आंबेडकर ने उक्त लेख में गीता पर विविध विमर्श तथा गीता के श्लोकों के दृष्टांतों एवं उनके अंतर्विरोधों तथा विसंगतियों के माध्यम से दर्शाया है कि गीता न तो बाइबिल या कुरान की तरह कोई धार्मिक ग्रंथ है, न ही दार्शनिक। इस बारे में उक्त निबंध से एक लंबा उद्धरण अप्रासंगिक नहीं होगा।
“गीता में जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में इतने भिन्न-भिन्न मतों का होना केवल आश्चर्य की बात नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति यह पूछ सकता है कि विद्वानों में इतना मतभेद क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में मेरा निवेदन है कि विद्वानों ने ऐसे लक्ष्य की खोज की है, जो मिथ्या हैं। वे इस अनुमान पर भगवद्गीता के संदेश की खोज करते हैं कि कुरान, बाइबिल अथवा धम्मपद के समान भगवद्गीता भी किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रतिपादन करती है। मेरे मतानुसार यह अनुमान ही मिथ्या है। भगवद्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, इसलिए उसमें कोई संदेश नहीं है और इसमें किसी संदेश की खोज करना व्यर्थ है। निस्संदेह यह प्रश्न पूछा जा सकता है : यदि भगवद्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, तो फिर यह क्या है? मेरा उत्तर है कि भगवद्गीता न तो धर्म ग्रंथ है और नही यह दर्शन का ग्रंथ है। भगवद्गीता ने दार्शनिक आधार पर धर्म के कतिपय सिद्धांतों की पुष्टि की है।”[2]
धार्मिक ग्रंथ के रूप में गीता की मान्यता का स्रोत कोई सनातन संस्था या न्यायिक परंपरा नहीं है, बल्कि प्रकारांतर से, अंग्रेजी न्यायप्रणाली है। इंगलैंड में बाइबिल को धर्मग्रंथ माना जाता रहा है और यह भी कि धर्मग्रंथ की शपथ खाकर कोई झूठ नहीं बोलता। वास्तविकता का अलग होना, अलग बात है। इसीलिए वहां की अदालतों में, शिकायतकर्ता; आरोपी तथा गवाहों द्वारा संविधान की बजाय बाइबिल की कसम खाकर बयान दर्ज कराने की परंपरा रही है। यह न्याय प्रणाली भारत में लागू करने में इस्लाम के अनुयायियों के मामले में कोई दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि बाइबिल की ही तरह कुरान को भी धर्मग्रंथ माना जाता है। लेकिन हिंदुओं के पास ऐसा कोई एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है, जिसे वैविध्यपूर्ण हिंदू समाज का धर्म ग्रंथ कहा जा सके। हमारे यहां सच बोलने के लिए किसी ग्रंथ की शपथ खाने की परंपरा नहीं रही है, बल्कि किसी इष्ट-अभीष्ट देवता या किसी प्राकृतिक शक्ति की[3]। कब और किसके परामर्श से औपनिवेशिक अदालतों में सच बोलने के लिए गीता की शपथ दिलायी जाने लगी, अलग शोध का विषय है।
यह भी पढ़ें – इतिहास का पुनर्मिथकीकरण : भविष्य के विरुद्ध ब्राह्मणवादी साजिश
डॉ. आंबेडकर ने उक्त लेख में इसके अंतविरोधों और असंगतियों का विधिवत खुलासा किया है, जिनकी व्यापक चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इस लेख मकसद द्वापरयुग की तथाकथित अतिप्राचीनता के ऐतिहासिक (यानि, पौराणिक) संदर्भ में इसके नायक, स्वघोषित ईश्वर के संदेशों के सार के निहितार्थों की संक्षिप्त समीक्षा की है।
महाभारत का द्वापर युग
रॉयटर को दिए अपने साक्षात्कार में, संस्कृति मंत्री, महेश शर्मा ने आस्थाजन्य इतिहासबोध का परिचय देते हुए बताया कि “उनकी सरकार देश की पहली सरकार है, जिसने इतिहास के मौजूदा संस्करण को चुनौती दी है”। संस्कृति मंत्री मेडिकल के छात्र रहे हैं, उनके इतिहासबोध की अवैज्ञानिकता समझी जा सकती है, उनकी भी ‘हिंदू संस्कृति के गौरव’ के अन्वेषण की अवधि 12000 साल पहले तक ही जाती है। सरकार द्वारा इतिहास पुनर्लेखन के लिए गठित कमेटी के एक सदस्य, जेयनयू में संस्कृत के प्रोफेसर, संतोष कुमार शुक्ल इस अन्वेषण की अवधि लाखों साल पीछे, यानि पाषाण युग से भी पहले की बताते हैं। ‘अति-प्राचीन’ महाभारत का द्वापर युग की अतिप्रचीनता भी सतयुग, त्रेतायुग की ही भांति अनिश्चित है। ब्राह्मणवाद का इतिहासबोध ही नहीं, कालखंड निर्धारण भी मिथकीय है, जिसके गतिविज्ञान के नियम अधोगामी हैं। सतयुग से चलकर त्रेता, द्वापर होते हुए कलियुग तक[4]। रामायण के त्रेता युग की ‘हजारों-लाखों साल पुरानी’, अज्ञात काल की ऐतिहासिकता[5] की ही तरह महाभारत के द्वापर युग की प्रचानीता भी अनिश्चित है। वैदिक साहित्य; बौद्ध साहित्य या कौटिल्य के ग्रंथों में महाभारत के पात्रों; घटनाओं या ऋष्टि के सर्जक, पालक तथा संहारक के रूप में त्रिदेव, ब्रह्मा-विष्णु-महेश का। विष्णु ही नहीं थे तो मानव रूप में धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए बार बार अवतरित होने की घोषणा कैसे करते? डॉ आंबेडकर ने उक्त लेख में बौद्ध क्रांति के विरुद्ध ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि के ग्रंथ जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के कई अंशों की समानता के आधार पर साबित किया है कि भगवद्गीता की रचना पूर्व मीमांसा की वर्णाश्रमी मान्यताओं तथा ब्रह्मणवादी कर्मकांडों की पुष्टि के लिए की गयी। डॉ. आंबेडकर के शब्दों में:
“बौद्ध-काल में, जो भारत का सबसे अधिक प्रबुद्ध और तर्कसम्मत युग था, ऐसे सिद्धांतों के लिए कोई स्थान नहीं था, जो अविवेक, दुराग्रह, तर्कहीन और अस्थिर धारणाओं पर आश्रित हों। जो लोग अहिंसा पर उसे एक जीवन-शैली मानकर विश्वास करने लगे थे और जो उसे जीवन में नियम के रूप में अपना चुके थे, उनसे इस सिद्धांत को स्वीकार करने की आशा किस प्रकार की जा सकती थी कि हत्या करने पर क्षत्रिय को पाप इसलिए नहीं लग सकता, क्योंकि वेदों में ऐसा करना उसका कर्तव्य बताया गया है। जिन लोगों ने सामाजिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था तथा जो व्यक्ति के गुणों के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण कर रहे थे, वे श्रेणीबद्ध करने वाले चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत और केवल जन्म के आधार पर व्यक्तियों के वर्गीकरण को क्यों स्वीकार करते, क्योंकि वेदों ने ऐसा कहा है? जिन लोगों ने बुद्ध के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था कि समाज में सभी दुःख तृष्णा के कारण हैं, अथवा जिसे संग्रह की प्रवृत्ति कहा जाता है, वे उस धर्म को क्यों स्वीकार करते, जो लोगों को यज्ञादि कर्म (बलि) से लाभ प्राप्ति के लिए इसलिए प्रेरित करता है कि ऐसा करना वेद-सम्मत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बौद्ध धर्म के तेजी से बढ़ते प्रभाव से जैमिनी के प्रतिक्रांति सिद्धांत डगमगा उठे थे और वे चकनाचूर हो जाते, यदि उन्हें भगवद्गीता द्वारा दिए गए प्रतिक्रांतिवादी सिद्धांतों की दार्शनिक पुष्टि का सहारा न मिलता, जो भी किसी भी प्रकार से अकाट्य नहीं हैं”।[6]
इसकी प्राचीनता के विवाद में गए बिना यदि मान लिया जाये कि त्रेता और द्वापर के परशुराम एक ही चरित्र है और कुरुक्षेत्र में महाभारत में भीषण रक्तपात के बाद द्वापर युग का अंत हो जाता है तो क्या त्रेता और द्वापर युग अत्यंत अल्पकालीन थे? भगवद्गीता की प्राचीनता के दावे के विवाद में जाने की न तो जरूरत है, न गुंजाइश। यहां मकसद सिर्फ यह कहना है कि गीता का रचयिता पौराणिक इतिहासबोध देश-काल की सीमाओं के पार, ब्राह्मणवादी वैचारिक परिधि में, दैवीयता से चमत्कृत, एक पितृसत्तात्मक, वर्णाश्रमी आदर्शलोक बुनता है।
भगवतगीता के प्रमुख संदेश :
इस ग्रंथ की प्रस्तुति ईश्वरीय वाणी के रूप में है, जिसमें नायक स्वयं को सर्वशक्तिमान, सर्वेश्वर, श्रृष्टि का रचयिता घोषित करता है तथा इसे प्रमाणित करने के लिए श्रृष्टि समेटे अपना विकराल रूप दिखाता है। रामायण के राम खुद को भगवान क्या, मर्यादा पुरुषोत्तम भी उन्हें वाल्मीकि बनाते हैं। रामचरित मानस के भी राम को तुलसी भगवान बनाते हैं, वे खुद नहीं कहते। आधुनिक युग में गीता के कृष्ण के उसी ढर्रे पर सांईबाबा; रजनीश; राम रहीम सरीखे योगी, साधू-सन्यासियों ने अवश्य खुद को ईश्वर घोषित किया। यदि इसे इतिहास मान लें और इसके नायक कृष्ण के संवादों को ईश्वरीय वाणी मान लें तो मानना पड़ेगा कि कोई ईश्वर है जो धरती पर जब धर्म खतरे में पड़ता है तो वह धर्म की रक्षा तथा दुष्टों के विनाश के लिए धरती पर अवतरित होता है। सवाल उठता है, धरती उसके लिए भारत या खासकर उत्तर भारत तक ही क्यों सिमट जाती है? वह बुद्ध की तरह लोगों को सद्-बुद्धि की शिक्षा से धर्म की रक्षा करने की बजाय सर्वनाशी रक्तपात का रास्ता क्यों चुनता है?
सत्ता और संपत्ति के लिए रक्तपात को उचित ही नहीं अपरिहार्य बताने के लिए इसमें आत्मा के अमरत्व तथा एक शरीर से दूसरे शरीर में आवागमन का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। वैसे आत्मा के अमरत्व का यह सिद्धांत प्राचीन गणितज्ञ, पाथागोरस ने छठी शताब्दी(?) ईशापूर्व दिया था। प्लेटो के जिन दर्शनिक सिद्धांतों पर पाईथागोरस का असर है उनमें उनका आत्मा का सिद्धांत भी शामिल है। प्लेटो ने लिखा है कि आत्मा अजर-अमर है तथा एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती हैं। भगवद्गीता में ‘भगवान’ भी यही कहते हैं। न तो प्लैटो स्पष्ट करते हैं, न ही भगवद्गीता के भगवान कि अगर आत्माएं शरीर में रहती हैं तथा मरने के बाद दूसरी शरीर में प्रवेश कर जाती हैं तो जन्म तथा मृत्यु दर समान होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। बढ़ती आबादी के लिए आत्माएं कहां से आयातित होती हैं? भगवद्गीता की तरह, प्लेटो का आत्मा का सिद्धांत रक्तपात की प्रेरणा नहीं देता। “भगवद्गीता का अध्ययन करने पर सबसे पहली बात जो हमें मिलती है, वह यह कि इसमें युद्ध को संगत ठहराया गया है। स्वयं अर्जुन ने युद्ध तथा संपत्ति के लिए लोगों की हत्या करने का विरोध किया। कृष्ण ने युद्ध तथा युद्ध में हत्याओं की दार्शनिक आधार पर पुष्टि की। युद्ध की यह दार्शनिक पुष्टि भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 2 से 28 तक दी गई है। युद्ध की दार्शनिक पुष्टि तर्क की दो कसौटियों पर आधारित है। पहला तर्क यह है कि संसार नश्वर है तथा मनुष्य मृत्युधर्मी है। वस्तुओं का अंत होना निश्चित है। मनुष्य की मृत्यु निश्चित है। जो बुद्धिमान हैं, उनके लिए इस बात से क्या अंतर पड़ेगा कि मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु होती है अथवा वह हिंसा के फलस्वरूप मृत्यु को प्राप्त करता हैं? जीवन अस्वाभाविक है, इस बात पर आंसू क्यों बहाए जाएं कि उसका अंत हो गया है? मृत्यु अनिवार्य है, फिर इस बात पर क्यों विचार किया जाए कि मृत्यु किस प्रकार हुई? दूसरा तर्क प्रस्तुत करते हुए युद्ध की आवश्यकता को सिद्ध किया गया है और यह सोचना भ्रम है कि शरीर और आत्मा एक हैं। वे अलग-अलग हैं। वे केवल स्पष्ट रूप से अलग-अलग ही नहीं, परंतु वे दोनों अलग-अलग इसलिए हैं कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अमर और अविनाशी है। जब मृत्यु होती है तो शरीर का अंत हो जाता है। आत्मा का कभी भी विनाश नहीं होता और आत्मा कभी भी नहीं मरती, यहां तक कि वायु इसे सुखा नहीं सकती, अग्नि इसे जला नहीं सकती और हथियार इसे काट नहीं सकते। इसलिए यह कहना भूल है कि जब व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी आत्मा भी मर जाती है। वास्तव में स्थिति यह है कि शरीर मर जाता है। उसकी आत्मा मृत शरीर को उसी प्रकार त्याग देती है, जैसे व्यक्ति अपने पुराने वस्त्रों को त्याग देता है, वह नए वस्त्र धारण करता है तथा अपना जीवन बिताता है। चूंकि आत्मा कभी भी नहीं मरती है, अतः व्यक्ति की हत्या होने से उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए युद्ध और हत्या-जनित पश्चाताप अथवा संकोच नहीं होना चाहिए, यही भगवद्गीता का तर्क है”[7]।
भगवद्गीता का एक अन्य प्रमुख सिद्धांत है, वर्णाश्रमवाद, यानि ब्राह्मणवाद की हिमायत। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, एक अन्य सिद्धांत, जिसे भगवद्गीता में प्रस्तुत किया गया है, वह चातुर्वर्ण्य की दार्शनिक पुष्टि है। निस्संदेह भगवद्गीता में बताया गया कि चातुर्वर्ण्य ईश्वर का सृजन है और इसलिए यह अति पवित्र है, परंतु गीता में यह इस कारण वैध नहीं बताया गया है। इसके लिए दार्शनिक आधार प्रस्तुत किया गया है तथा उसे मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों के साथ जोड़ दिया गया है। भगवद्गीता में कहा गया है कि पुरुष के वर्ण का निर्धारण मनमाने ढंग से नहीं हुआ है, परंतु उसका निर्धारण मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों (भगवद्गीता, 4,13) के आधार पर किया जाता है”[8]। इस तरह भगवद्गीता, जैमिनी की पूर्वमीमांसा, रामायण, मनुस्मृति आदि पौराणिक ग्रंथों के ही क्रम में ‘ब्रह्मा’ (ब्राह्मण) के बनाए चतुर्वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मणवाद) की वैधता का ग्रंथ है, डॉ. अंबेडकर के शब्दों में ब्रह्मणवादी ‘प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि का’।
भागवद्गीता का एक अन्य प्रमुख सिद्धांत है, चिंतनमुक्त कर्म। कुरुक्षेत्र में संपत्ति के लिए परिजन-गुरुजनों की हत्या के विचार से विचलित अर्जुन को परामर्श देते हैं कि रक्तपात के बारे में सोचना बंद कर तीरंदाजी करें, सामने जो भी हो। इसका लब्बोलबाब यह कि अपने[9]किए के परिणाम की चिंता किए बिना कर्म करना चाहिए। सोचो मत आज्ञापालन करो। आरएसएस की शाखा में भी यही ज्ञान दिया जाता है9 डॉ. आंबेडकर के नुसार, “भगवद्गीता में कर्म योग का प्रतिपादन किया गया है। ………… भगवद्गीता में अनासक्ति अर्थात् कर्म के फल की इच्छा किए बिना कर्म (भगवद्गीता, 2,47) के संपादन के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। गीता में कर्म मार्ग (यह भगवद्गीता, 2,48 में निष्कर्ष के रूप में मिलता है) की पुष्टि यह तर्क प्रस्तुत करके की गई है कि अगर इसके मूल में बुद्धि योग हो और कर्म के कारण किसी फल की इच्छा की भावना न हो, तो कर्मकांड के सिद्धांत में कोई त्रुटि नहीं है।”[10]। जी रहे हैं तो कुछ-न-कुछ कर ही रहे हैं। सुविचारित, सर्जनात्मक, उपयोगी कर्म ही सार्थक या सत्कर्म है। सारे अधिनायकवादी दार्शनिक और विचारक, विचारों की बजाय कर्म पर जोर देते हैं। इस सिद्धांत का यह भी आशय है कि वर्णाश्रम व्यवस्था में जिसका जो निर्धारित कर्म है, उसकी शुचिता या औचित्य पर सवाल किए बिना करता रहे। कृष्ण कहते हैं, ”मेरे साधन बनो, मेरी इच्छा का पालन करो। युद्ध-जन्य पाप और अनिष्ट की चिंता मत करो, वही करो जैसा कि मैं कहूं। धृष्ट मत बनो।”[11]
यहां भगवद्गीता के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत समीक्षा की गुंजाइश नहीं है, अन्य पौराणिक रचनाओं की ही तरह इसके इतिहासीकरण का निहितार्थ है, वर्णाश्रमी मूल्यों की पुनर्स्थापना। इस लेख में इसे ‘प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि’ के ग्रंथ के रूप में डॉ. अंबेडकर के तर्कों की विस्तृत विवेचना की गुंजाइश नहीं है। इसका समापन उनके विचारों से सहमति से करता हूं कि भगवद्गीता समतामूलक, जनतांत्रिक बौद्ध विचारों से आतंकित ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना के प्रतिक्रांतिकारी बौद्धिक प्रक्रिया की कड़ी है। इतिहास के पुनर्लेखन के नाम पर उसका पुनर्मिथकीकरण, उसी प्रक्रिया का पुनर्जन्म लगता है। लेकिन इतिहास कभी खुद को दुहराता नहीं, प्रतिध्वनित होता है, यह प्रतिध्वनि भयावह है।
[1] हिंदी समय, महात्मा गांधी हिंदी विवि, वर्धा, www.hindisamay.com/…/भीमराव-आंबेडकर-विमर्श-प्रति..
[2] उपरोक्त
[3] हमारे गांव में हमारे बचपन तक गांव की पंचायत की अदालत में, ‘गंगा उठाकर’ बोली गयी बात सच मान ली जाती थी। आखों देखी तो नहीं गंगा उठाकर झूठ बोलने की कई कहानियां हैं। गंगा उठाने का मतलब था नदी/जलाशय में खड़े होकर, अंजुलि में पानी लेकर या फिर किसी लिपी-पुती जगह पर खड़े होकर, पानी का घड़ा उठाकर ‘सत्य’ बोलना।
[4] ईश मिश्र, इतिहास का पुनर्मिथकीकरण -2,
[5] उपरोक्त
[6] डॉ. अंबेडकर, उपरोक्त
[7] उपरोक्त
[8] उपरोक्त
[9] अनुभवजन्य
[10] उपरोक्त
[11] उपरोक्त में उद्धृत
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..................….#वडवा
संस्कृत भाषा के शब्द वडवा का अर्थ घोडी होता है। घोडे-घोडी की अनेकों नस्लें होती हैं, जिन्हें गधा, धारीदार गधा, कच्छ गधा, टट्टू खच्चर आदि नाम से जाने जाते हैं। संस्कृत भाषा में इन्हें अश्व-अश्वी के नाम से भी जाना जाता है।
वेद-पूराणों में घोडा-घोडी को बहुत महत्व दिया गया है और घोडा-घोडी से अनेक वंशीधारी पैदा हुए बताए जाते हैं। जिसमें रघुवंशी यदुवंशी नागवंशी भरतवंशी पांडुवंशी कौरव वंशी आदि शामिल हैं।
किसी न किसी रुप में अश्वमेध यानि घोडे को बलिदान किया जाता रहा है, जिसमें किसी घोडे के द्वारा महारानी के साथ सहवास करवाकर बच्चे वंश चलाने व घोडे की हत्या करना भी शामिल है। कहा जाता है, कि महाराणा चेतक की मां गुजराती घोडी थी और महाराणा चेतक के पिता इरान से थे।
पुराने-जमाने (प्राचीन काल) में अश्वनी नाम की एक तवायफ (अप्सरा) जब घोडी बनी' तब सूर्य ने उसके साथ सम्भोग किया, जिससे तवायफ अश्वनी ने अश्वनीकुमार नाम के दो बेटे पैदा किये।
विष्णु ने भी घोडा बनकर अपनी घोडी बनी हुई लक्ष्मी के साथ सहवास किया और अपना वंश बढाने में कामयाब हो गये थे।
सूर्य की बीवी संज्ञा भी घोडी बन गई थी' तब सूर्यगढा ने घोडा बनकर घोडी से मिलन कर अपना सूर्यवंश चलाने में सफल हो गये थे।
महाराणा पृथु ने गाय बनी हुई पृथ्वी के साथ सहवास किया तब मनु नाम के इनका एक बेटा पैदा हुआ। इसी तरहं जानवरों के अनेकों सिर वाले देवी-देवता पैदा हुए' जिन्हें सामान्य भाषा में हाइब्रिड नस्लें मानी जाती हैं।
वडवा के अन्य अर्थ; नौकरानी, वेश्या, रांड व ब्राहमण जाति की महिला होता है।
सोर्स; संस्कृत हिन्दी कोशपूराण; 892
वेद-पूराणों में देवी देवताओं के अधिकांश नाम अप्राकृतिक रुप से पैदा होने वाले या असामाजिक रुप से खानदान कलंकित करने वालों से सम्बंधित होते हैं। संस्कृत भाषा में इन्हें #कुलछेदक, अयोद्धा, चिरंजीवी अमर-अजर माना गया है। जिसमें वेद-पूराणों के अधिकांश देवी-देवता ऋषि-मनु मुनि आदि शामिल हैं।
अलग-अलग धर्म में खानदान-कलंकित करने वालों के अलग-अलग पैदा होने के तरीके, नाम कहानियाँ अलग-अलग होती हैं। खानदान को कलंकित करने वालों में सर्वप्रथम मलेश उर्फ गणेश को माना जाता है।
संस्कृत की हुई भाषा की मीठी जुबान में ऐसे लोगों को चिरंजीवी या अमर कहा जाता है। इनमें हनुमान, रघुवंशी यदुवंशी और भरत व भरत के पूर्वज भी शामिल हैं।
अधिकांश देवी-देवता' तवायफखाना, इंद्रलोक इंद्रसभा, इंद्रप्रस्थ यानि इंद्रपूरी में नाचने गाने वाली की नाजायज़ औलादें बताई जाती हैं। किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए, कुवांरी उम्र में या शादीशुदा होकर भी किसी गैर आदमी से शारीरिक सम्बन्ध बनाकर' बच्चे पैदा करने वाली को अलग-अलग भाषाओं में, अफसरासाना, अफसरेसाना आसना तवायफ, अप्सरा, कंजरी, नचनैया, नुगरी-नगुरी-उरी अभिनेत्री, हिरोइन, डांसर, डायन डाकन डाकिन डायना, रांड कंजरी आदि नाम से जाना जाता है।
भारत में हिंदु धर्म के नाम पर ऐसे मनु-ष्यों को देवी-देवता व इनको तथा इनकी अवैध औलादों को मां-बाप मानकर पूजा जाता है और उनके वंशज बनने में भी गर्व महसूस करते हैं। तथास्थू
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...................#गाय_संग_पृथु
धरती-लोक का राजा वेन बहुत अत्याचारी, बदमाश, दुष्ट, वहसी था। अंग का बेटा राजा वेन को पहला महाराजा मानते हैं। राजा वेन ने ऋषि-मुनियों को भी अपने राज्य से बेदखल कर दिया तो ऋषि-मुनियों ने राजा वेन को पीट-पीट कर मार दिया और उसे मिट्टी में दफना दिया।
राजा के मरने के बाद व रियासत में राजा न होने से राज्य में आतंकवाद, लूटमारी बढ गयी व हत्याएं होने लगी। ऋषि-मुनियों ने एक राजा की चाह में मरे हुए राणा वेन के हाथ से पृथु नामक लडका पैदा किया और उसे राजा बना दिया।
परन्तु कुछ समय बाद महाराणा पृथु के राज में भयंकर अकाल पड गया और पृथ्वी ने फसलें फल-फ्रूट पैदा करना बंद कर दिया, वहीं गाय ने भी दूध देना बंद कर दिया। ऋषि-मुनि व जनता परेशान होकर राजा पृथु के पास पहुंच कर पृथ्वी से फल-फ्रूट व बच्चों के लिए गाय से दूध दिलवाने की फरियाद की।
जनता की फरियाद सुनकर राणा पृथु ने अपना धनुष बाण निकाला और पृथ्वी की ओर बाण तान कर पृथ्वी को दूध दही, फसल फल-फ्रूट आदि पैदा करने का आदेश दिया। परन्तु पृथ्वी ने गाय का रुप धरा और वहाँ से नौ-दौ-ग्यारह हो गयी। आखिरकार गाय को राणा पृथु ने पकड ही लिया और उसने गाय से पूछा की वह फसल दूध वगैरह क्यों नहीं देना चाहती?
डरती-डरती व संकोच करती हुई गाय ने कहा की वह सांड से सहवास करवाए बिना वह बछड़े पैदा नही कर सकती है और जब बछडा पैदा ही नही होगा तब' वह दूध की नदी कैसे बहा सकती है!
तब महाराणा पृथु ने बिना देर किए, चन्द्रमा की मधुर चांदनी में गाय के साथ सहवास किया तब गाय ने बछडे के रुप में मनु को जन्म दिया। फिर राणा पृथु ने अपने नाजुक हाथों से गाय थन पकड कर दूध निकालने लगा तब दूध की धार के साथ ही दूध घी की नदियाँ बहने लगी और अनेकों तरह की फसलें, फल-फ्रूट, हीरे, जवाहरात स्वर्ण आदि पैदा होने लगे।
माना जाता है कि पृथ्वी उर्फ गाय महाराणा पृथु की पहली अविवाहित धर्मपत्नी होने के कारण धरती को पृथ्वीमाता, धरतीमाता व गाय को गोऊमाता कहा जाता है।
राणा वेन को धरती का पहला राणा माना जाता है। ऋषि-मुनियों द्वारा वेन की हत्या होने के बाद महाराणा पृथु के नाम पर ही इस धरती का नाम पृथ्वी पड़ा।
इस कथा-कहानी के बाद अनेकों कथाओं में देव, मनु-ष्य, ऋषि-मुनि, पहाड, नाग असुर आदि अप्राकृतिक व असामाजिक ढंग से जानवरों व पक्षियों के सिर वाले बच्चे पैदा करने लगे।
संस्कृत-हिंदी कोषपूराण से संकलित एवं शुद्धिकृत
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हिन्दू ब्राह्मण धर्म की भयानक प्रथाएं
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आर्य ब्राह्मणों नें भारत के मूलनिवासियों जो पहले शूद्र कहे जाते थे ( sc/st/obc) को जातियों में बॉटकर एक दूसरे से वैमनस्यता पैदा कर दी उसके बाद भयानक प्रथायें चलाईं गयी कुछ निम्न है--
👉�दास प्रथा----
इसमें शूद्रों को ब्राह्मणो, का दास बनना पडता था उनके घरों पर पानी भरना,पशुओं को चारा करना,घर की महिलाओं ,पुरूषों के कपडे धोना,तथा घर का मैला उठाना पडता था जो लोग इस काम को नही करना चाहते थे उन्हे १०० कौडे और गॉव से निकाल दिया जाता था
👉�नरि बल प्रथा---
इसमें ब्राह्मणों के देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिये शूद्र स्त्री- पुरूषों के मन्दिर पर सिर पटकपटक मार दिया जाता था
👉�शुध्दिकरण प्रथा--
इसमें शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन अपने पति के घर नही जाती थी और कम से कम तीन दिन ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पडती थी तभी दुल्हन को शुध्द माना जाता था
👉�देवदासी प्रथा---
इसमें ब्राह्मणों के कहने पर शूद्र अपनी लडकियों को मन्दिरों पर दान देते थे मन्दिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे और उनसे जो बच्चा पैदा होता था उसे ब्राह्मण लोग हरिजन कहते थे
👉�चरक प्रथा----
इसमें ब्राह्मण जब अपना आलीसान मकान का निर्माण करता था तो शूद्रों को पकडकर जिन्दा चिनवा देता था इस प्रथा में माना जाता था कि शूद्रों को चिनवाने से मकान अधिक दिनों तक टिकाऊ रहेगा
सती प्रथा.....
ब्राम्हण धर्म की यह अमानवीय कुप्रथा थी जिसमे किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाने पर उसको पति के साथ बांधकर ज़िंदा जलाया जाता था इस जघन्य अपराध को अंग्रेजो की मदद से बड़ी मुश्किल से ख़तम किया जा सका.
अब हमें खुद सोचने पर मजबूर होना चाहिये कि हमारे पूर्वजों ने कितनी जिल्लत और यातना भरी जिन्दगी जी होगी फिर भी हम है कि उन्ही के पूर्वजों ब्रह्मा,बिष्णु,महेश, काली,दुर्गे,गणेश,आदि की पूजा पाठ करते है और ब्राम्हणी कुरीतियों को ढो रहे है अब हमारे समाज को कुरीतियों से छुटकारा पाना ही होगा तभी समाज ब्राम्हणी दासता से मुक्त होगा .....
*****अमित कुमार भारती*****
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#तार्किक_रामायण -
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१. भगवान श्रीराम क्षत्रिय थे या ब्राह्मण ?
२. भगवान श्रीराम का जन्म उनके माता पिता कौशिल्या और दशरथ के यौन व्यवहार से नहीं हुआ था तो वे क्षत्रिय कैसे हुआ ?
३. राजा दशरथ का चौथापन याने 75 वर्ष पार हो गया था इतने अधिक उम्र में संतानोत्पत्ति असंभव होता है क्योंकि गुणसूत्र कमजोर हो जाते हैं ।
४. भगवान श्रीराम का जन्म श्रृंगी श्रृषि के द्वारा किया गया पुत्रेष्ठि यज्ञ से हुआ था तो श्रृंगी श्रृषि ही भगवान श्रीराम का जेनेटिक पिता हुआ तो भगवान श्रीराम ब्राह्मण हुए । क्षत्रिय कैसे हुआ ?
५. अगर श्रीराम क्षत्रिय होता तो कोई भी ब्राह्मण श्रीराम का पूजा नहीं करता क्योंकि वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण का स्थान उच्च होता है ।
६. हनुमानजी पवनपुत्र थे या शंकरपुत्र ?
७. अगर हनुमानजी शंकर भगवान के जेनेटिक पुत्र थे तो वह पवनपुत्र कैसे हुआ ?
८. हमने आजतक शास्त्रों में तथा फोटो में शंकर भगवान को धनुष रखते हुए नहीं देखा । हां त्रिशुल , डमरू , गले में लिपटा हुआ शर्प , सिर में चन्द्र और जटा से गंगा को बहते हुए जरूर देखा है । फिर शंकर भगवान के कौन से धनुष से जनकपुर में सीता का स्वयंवर हुआ ?
९. अगर शंकर भगवान का धनुष किसी से नहीं उठता था तो जनकपुर किसने लाया होगा ? क्या स्वयं शंकर भगवान अपने धनुष को जनकपुर छोड़ने आया था ?
१०. शंकर भगवान का अद्भूत धनुष सीताजी से उठ गया परन्तु रावण ने नहीं उठा पाया ।
११. उस विशाल धनुष को उठानेवाली बलशाली सीता को रावण ने उठाकर ले गया । बेबस सीता विरोध तक नहीं कर सकी ।
१२. रावण ने शंकर भगवान के विशाल धनुष को उठानेवाली सीता को आसानी से उठा ले गया परन्तु उस धनुष को नहीं उठा सका । यह क्या चक्कर है ?
१३. श्रीराम ब्राह्मण थे इसका एक और सबूत है कि पत्थर पर पैर रखते ही पत्थर अहिल्या हो गयी । किसी भी वेद शास्त्रों में किसी भी क्षत्रिय या राजाओं में अलौकिक शक्ति होने का वर्णन नहीं मिलता । यह अभयदान सिर्फ ब्राह्मणों को प्राप्त था उसे किसी भी को यहां तक भगवानों को भी श्राप देने या दण्ड देने का अधिकार प्राप्त था ।
१४. हालाकि श्रीराम ने पत्थर को अहिल्या बना दिया परन्तु अपने मृत पिता को जीवित नहीं कर सका । यहां तक शक्तिबाण से घायल लक्ष्मण को , घायल जटायु को भी जीवित नहीं कर सका ।
१५. घायल लक्ष्मण को जीवन दान देने के लिए हनुमान को संजीवनी लाना पड़ा । परन्तु यह संजीवनी सिर्फ घायल लक्ष्मण पर ही असरदार हुआ और अन्य घायलों पर इसका कोई असर नहीं हुआ ।
१६. जब समुद्र में राम सेतु नहीं बना था तो जनकपुर में सीताजी के स्वयंवर का निमंत्रण देने लंका कौन गया होगा ?
१७. जब रावण राक्षस थे तो उसे सीताजी के स्वयंवर का निमंत्रण क्यों दिया गया ?
१८. समुद्र में रामसेतु बनाने के लिए वानर लोग पत्थर पर श्रीराम लिख कर डालते थे तो वानरों को लिखने पढ़ने किसने सिखाया होगा ?
१९. जिस पत्थर पर मात्र श्रीराम लिख देने से वह पत्थर पानी में नहीं डूबता था तो साक्षात श्रीराम समुद्र में चलकर क्यों पार नहीं हो सका ?
२०. जो पत्थर पर श्रीराम लिखा गया वह पानी में तैरने लगा डूबा नहीं तो उस पत्थर को हिन्द महासागर से कौन चुरा ले गया ? अभी वहां तैरने वाले एक भी पत्थर क्यों नहीं मिलता ?
हमारे देशवासी लोग असत्य को ही सत्य समझकर स्वयं को बर्बाद कर रहें हैं । दोस्तों तर्कशील बनिये और पाखण्ड , अंधविश्वास से मुक्ति पाइये । स्वयं के विवेक को जगाइये , अपने अज्ञानता और भ्रांति को मिटा दीजिए ।
यथार्थ को जानों, सत्य को छानों और इंसानियत को मानों ।
जय इंसान, जय विज्ञान , जय संविधान , जय भारत ।
धन्यवाद ।
स्वरा असुर ✒️
Squish bharti
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