Friday, 2 April 2021

मासिक धर्म, ऋषि चरित।

मासिक धर्म के पर अमानविय नियम पराशर स्मृती 

पराशर स्मृती के लेखक का कहना है कि 

यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी दुसरी रजस्वला ब्राम्हणी को छुले वे तो उन रजोधर्म के तिन दिनो तक बिना भोजन किये हि रहे तो तिन दिनो मे शुद्ध होती है. 

निचे के श्लोको मे क्षत्रिय वैश्य शुद्र स्त्रीयो के बारे मे नियम है 

(पराशर स्मृती,अनुवाद गुरुप्रसाद शर्मा,पृष्ठ 54) 

शुद्ध अशुद्ध के नाम पर किसी स्त्री को तिन दिन तक भुखा रखना आपकी कौनसी महान सभ्यता है ?
वो भूखी रहे इससे स्मृती लेखक को कोई फर्क नही पडता बस वो तिन दिन मे शुद्ध होनी चाहिए

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कल मैने एक पोस्ट लिखकर यह समझाने का प्रयास किया था कि पूर्वकाल मे ऋषि-मुनि भी काम (Sex) मे विरक्त नही थे!
इसके बदले मे कई लोग मेरे विरोध मे उतर आये, कुछ लोगो ने मुझे मूर्ख,मुल्ला और ना जाने क्या-क्या उपाधियाँ दे दी!

अब मै जरा उसी पर फिर से आता हूँ, सामान्यतः यह अवधारणा है कि ऋषि लोग काम को जीत लेते थे, पर जरा गौर करना कि पूर्वकाल मे लगभग पुरुष बहुपत्निक होते थे!
ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!
मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!
कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!
राम के पिता दशरथ को तीन पत्नियाँ थी, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा!

अरे मनुष्य तो क्या तथाकथित देवता थी बहुपत्निक ही थे!
चन्द्रमा को 27 पत्नियां थी, जिनके नाम से 27 नक्षत्रों के नाम है! इसके बाद भी इन्होने अपने गुरू वृहस्पति की पत्नि तारा से मुँह काला किया!
इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा!
अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!

आखिर जब ये महामानव काम को जीत चुके थे तो एक पत्नि से संतोष क्यो नही होता था!

बहुत सारे लोग मुझे कहते हैं कि तुम पुराणों के संदर्भ से बात करते हो। 
अरे भाई! तो इसमे मै क्या करूँ?
क्या पुराणों को मेरे दादा-परदादा ने लिखा था!

चलो अगर पुराणों की बात को ही पूर्णतः सच मान लिया जाये कि ऋषि-मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे!
तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था?
क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है!
आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा!

रामायण मे कुम्भकर्ण को नींद से जगाने के लिये रावण ने सुन्दर स्त्री नही भेजी थी, बल्कि स्वादिष्ठ भोजन भेजा था! क्योकि रावण जानता था कि कुम्भकर्ण को स्वादिष्ठ भोजन पसन्द है, और उसकी महक से कुम्भकर्ण जाग जायेगा!
क्या इसी प्रकार इन्द्र जानता था कि ऋषियों को अप्सराऐं पसन्द है, और उनकी पायल की खनक सुनते ही इनकी साधना टूट जायेगी!
उसका यह प्रयोग सच भी होता था, अप्सराओं को देखते ही ऋषि-मुनि लार टपकाने लगते थे, और अपनी वर्षो की कठोर साधना तोड़ देते थे!

आश्चर्य की बात तो यह है कि इन्ही पुराणों मे यह भी लिखा है कि जब कोई असुर तपस्या करता था, तब भी इन्द्र उनके तप को भंग करने के लिये इन्ही अप्सराओं को भेजता था!
तब भी अप्सराऐं आकर अपने लटके-झटके दिखाती थी, पर कोई भी असुर इनके झांसे मे नही आता था!
तो क्या यह मान लेना चाहिये कि ऋषि-मुनि असुरों से भी अधिक लंगोट के ढ़ीले थे!
       
              *****अमित कुमार भारती *****
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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#अप्राकृतिक_मैथुन

पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे!

सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!

रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी!
वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो!
यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी... 
अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये!
दूसरी घटना विश्वामित्र की है..... जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!

इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे!
ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी! 
ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे!
ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!

यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!

हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है! 
जो कभी घड़े मे... 
कभी दोने मे....
कभी जल मे....
तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....

खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!

रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी-रम्भा इन नंगे-फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती!

पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!
पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा!

ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!

पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!

मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"

अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।

यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है!

कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!

नोट- इस लेख के कुछ अंश ओशो के प्रवचन का हिस्सा है!
    ****अमित कुमार भारती ****
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ऋषि श्रृंग्य और शांता
         "ऋष्यश्रृंग" या "श्रृंगी ऋषि" वाल्मीकि रामायण व अन्य ग्रंथ-किताब में एक कलाकार (पात्र) है' जिसने बादशाह #दशरथ द्वारा औलाद पाने के लिए घोडे की बलि (अश्वमेध) यज्ञ तथा  यज्ञ करवाया था। वह विभण्डक ऋषि का बेटा तथा कछुए (कश्यप) ऋषि का पोता बताया जाता है। उनके नाम को लेकर यह उल्लेख है कि उनके माथे पर सींग (संस्कृत भाषा में श्रृंग) होने की वजह से उनका यह नाम पड़ा था।
               अलग-अलग कथा-कहानियों में ऋष्यश्रृंग्य एक #त्रेता युग में तो दुसरा #द्वापर के महाभारत काल के पश्चात जो पैदा हुए उसे शमीक ऋषि की औलाद बताई जाती है। विभण्डक ऋषि अपने बेटे ऋष्यश्रृंग्य का ब्याह अंगदेश के एक राणा लोमपाद व दूसरा राजा रोमपाद द्वारा गोद ली गयी #शान्ता से सम्पन्न हुआ जो शहंशाह दशरथ की मनहूस कन्या थीं। 
          इसी तरहं महाराण रावण की बेटी सीता, शांतनु के बेटे व वासुदेव की औलादें किसी न किसी कारणवश मनहूस बताई गयी हैं।
             पूराने जमाने में देवता व तवायफें (अप्सरायें) बिना किसी पुष्पक विमान के भारत की धरती के जनलोक में आते-जाते रहते थे। ब्रहमा के सौतले (मानस) पूत ऋर्षि कछुआ (कश्यप) थे। उनका बेटा महर्षि #विभण्डक थे। अन्य कहानियों की तरहं उनके तप-स्याह करते रहने से देवता डर गये थे। जिसके कारण इन्द्र को अपनी कुर्सी (गद्दी) डगमगाती हुई दिखाई देने लगी।
           विश्वामित्र की तरहं विभण्डक की तपस्या भंग करने के लिए #इन्द्र ने दिल (उर) को अपने बस में करने वाली (उर-वशी) अपनी एक खूबसूरत तवायफ (अप्सरा) #उरवशी को विभंडक के पास भेजा। उर्वशी खूबसूरत हीरणी बनकर विभंडक के आसपास मंडराने लगी। कोई अन्य महिला का उपाय न देखकर, विभंडक अपने बुढापे में हिरणी (उर्वशी) के चक्कर में पड गया, जिससे महर्षि के शरीर व दिमाग की गर्मी (तप) बढने लगी और दोनों के सहवास से हिरणी (उर्वशी) ने ऋष्यश्रंग्य नाम के एक बेटे को पैदा किया। 
                बच्चे के सिर पर  हिरण का सींग था। किसी किसी कथा-कहानी में बकरे व हिरण के मुंह व पैर खुर के रुप में बताए गये हैं। सिर पर सींग होने के कारण उसका नाम श्रृंग्य पड़ा । बालक को जन्म देने के बाद कंजरी उर्वशी का काम पूरा हो गया और वह अपने बच्चे को विभंडक के पास छोडकर वेश्यालोक (वेश्यालय, कोठा, अपसराखाना, तवायफखाना इंद्रगढ इंद्रलोक इंद्रसभा इंद्रप्रस्थ इंद्रपूरी) में वापस लौट गई। उर्वशी द्वारा दिए गये" इस धोखे से ऋर्षि विभण्डक इतने परेशान हो गये कि उसने सारी नारी जाति से ही नफरत सी हो गई। 
       उन्होंने अपनी औलाद श्रृंग्य को मां, बाप तथा गुरू तीनों का प्यार दिया और तीनों की कमी पूरी की। उनके ठिकाने (आश्रम, डेरा) में किसी भी नारी व मादाओं का प्रवेश वर्जित था और वे अपने अपने बेटे का पालन पोषण करते रहे। इसलिए श्रृंग्य ने अपने पिता के अलावा अन्य किसी भी इंसान व महिला को न जानता था और ना ही देखा था। 
          एक अन्य जनश्रुति कहानी के अनुसार एक बार महर्षि विभाण्डक झप्पड (तालाब, झील) में नहा रहा था' तब  इन्द्र द्वारा भेजी गई' अप्सराहरु उर्वशी को देखा तो  उर्वशी उसके दिल में बस गयी और उर्वशी से सहवास करने की चाहत में ही उनका वीर्य लंगोट से निकल कर पानी की धारा में बह गया। उसी समय एक हिरणी (मृगी) के रूप में उरवशी घासफूस चर रही थी और उसने पानी के साथ-साथ विभंडक का वीर्य पी लिया। इस कारण कुछ महिनों के बाद उर्वशी ने सींग वाले एक बेटे को पैदा किया। उस विचित्र बच्चे को जन्म देकर वह गाली (शाप, बद-दुआ) से आजाद  (मुक्त) होकर वह अपने वेश्याओं के लोक में चली गई।
       ब्राहमण देवता व इनके पक्षधर देवताओ की हेराफेरी (छलकपट) से मजबूर होकर विभण्डक तप और क्रोध करने लगे थे। जिसके कारण उन दिनों वहां की रियासत में भयंकर सूखा पड़ा था। अंगदेश के राजा लोमपाद/ रोमपाद/ चित्ररथ ने अपने मंत्रियों व पंडे-पुजारियों से बातचीत की। ऋषिश्रृंग्य अपने पिता विभण्डक से भी अधिक वेद-पूराणों के जानकार बन गया था।
        पंडे-पुजारियों ने अंगराज रोम-पाद उर्फ लोम-पाद को सलाह दी कि ऋर्षि ऋष्यश्रृंग्य को अंग देश (अंगकोर) में लाने पर ही अंगदेश में अकाल व भुखमरी खत्म हो पायेगी। एक बार जब महर्षि विभण्डक कहीं विदेश गये हुए थे तो इसी मौके की तलाश में बैठे अंगराज ने ऋष्यश्रृंग्य को रिझाने व पटाने के लिए, अंगदेश की कमसीन व खूबसूरत देवदासियां तथा सुन्दर कन्याओं का सहारा लिया और उन्हें ऋष्यश्रृंग्य के पास  भेज दिया। 
उनके आश्रम के पास एक आलीशान कैम्प भी लगवा दिया था। सावन की घटा में सुन्दर हसीनाओं ने तरह-तरह के सैक्सी हाव-भाव करते हुए, नाच गाना किया और ऋष्यश्रृंग्य मुनि को रिझाने लगी। उन्हें तरह-तरह के खान-पान तथा पकवान उपलब्ध कराये गये। श्रृंग्य मुनि अब इन सुन्दरियों के मदमस्त अदाओं व उनकी बाहों में गिरफ्त में आ चुके थे। महर्षि विभण्डक के आने के पहले वे सुन्दरियां वहा से पलायन कर चुकी थीं। अन्य कहानी में तवायफें उसे नाव में बिठाकर अंगदेश ले जाती हैं।
        ऋष्यश्रृंग्य अब चंचल मन व कामुक स्वभाव वाले हो गये थे, उसे हर पल अपने आंखों के सामने वधू ही वधू  (स्त्री नारी लक्ष्मी) नजर आने लगी थीं। उसके बाप विभंडक के कहीं बाहर जाते ही वह छिपकर उन सुन्दिरियों के शिविर में स्वयं पहुच जाते थे। समय को अनुकूल देखकर रोमपाद की भेजी गई सुन्दरियों ने ऋष्यश्रृंग्य मुनि को अपने साथ अंग देश भगा ले जाने मे सफल हो गई। वहां उनका बड़े हर्ष औेर उल्लास से स्वागत किया गया।  ऋष्यश्रृंग्य के वहाँ पहुँचते ही अंग देश में मूसलाधार बरसात होने लगी और किसान खेतीबाडी करने व चरवाहे पशु चराने में जुट गये। जबकि बरसात की वजह से अंगदेश में दलदल (केदार) ही दलदल (केदार) के दर्शन होने लगे।
           इधर अपने आश्रम में ऋष्यश्रृंग्य को ना पाकर ऋर्षि विभण्डक को हैरानी हुई। उन्होने अपने योग के दम से सारा पता लगा लिया। अपनी औलाद को वापस लाने तथा अंगदेश के राजा को सजा देने के लिए ऋर्षि विभण्डक अपने आश्रम से अंगदेश के लिए निकल पड़े।
         अंगदेश (ख्मेर कम्बोडिया) के राणा रोम-पाद उर्फ लोम-पाद तथा अयोद्धापति शहंशाह दशरथ दोनों दोस्त थे। ऋषि विभण्डक की बद-दुआ (गाली, शाप, श्राप) से बचने के लिए रोमपाद ने' पादने में देर नही लगाई और उसने बादशाह दशरथ की बच्ची शान्ता को अपनी सौतेली ( पोश्या , मानस) बेटी (छोरी) का दर्जा देते हुए, फटाफट उसकी शादी ऋष्यश्रृंग्य से करवा दी। 
                महर्षि विभण्डक द्वारा अंगदेश में अपने बेटे ऋष्यश्रृंग्य व अपने बेटे की बीवी शांता के साथ देखने पर महर्षि विभण्डक का क्रोध दूर हो गया‌। विभंडक को यकीन हो गया था कि उसकी प्रेमिका उरवशी की तरहं उसके बेटे की लुगाई (पत्नी बीवी) शांता अपने खसम (हसबैंड) ऋष्यश्रृंग्य को छोडकर कहीं नही जायेगी
               दूसरी तरफ अयोद्धा के आलमपनाह दशरथ की बीवियों के कोई औलाद पैदा नहीं हो रही थी। उन्होने अपनी यह चिन्ता महर्षि वशिष्ठ से कह सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने बादशाह दशरथ को ऋष्यश्रृंग्य के द्वारा घोडे की बलि (अश्वमेध) तथा औलाद पैदा करने हेतु (पुत्रेष्ठी) हवन (यज्ञ) करवाने का सुझाव दिया। जिसे सुनकर राणा अकबर की तरहं भागते हुए शहंशाह दशरथ ऋष्यश्रृंग्य के डेरे में पहुंच गये और उन्हें हवन करने के लिए राजी किया राणा दशरथ ने तरह-तरह से ऋष्यश्रृंग्य की चापलूसी की। अपने द्वितीय श्रेणी के सुसरा (ससुर स्वसुर) जी की दयनीय हालात देखकर ऋष्यश्रृंग्य को उन पर तरस आ गया। ऋष्यश्रृंग्य ने वेदों के अनुसार विधिवत् रूप से हवन करते हुए, जब घोडे की बलि देने के दौरान एकांतवास में" खीर खिलाने के बहाने बादशाह की तीनों महारानियों के साथ मिलन किया तो शांतनु की पत्नी व नौकरानी की तरहं तीनों रानियों के पैर भारी हो गये। ( प्रेगनेट गर्भवती होना)
 
 रूद्रायामक अयोध्याकाण्ड 28 में मख स्थान की महिमा इस प्रकार कहा गया है –

कुटिला संगमाद्देवि ईशान्ये क्षेत्रमुत्तमम्।
मखःस्थानं महत्पूर्णा यम पुण्यामनोरमा।।

स्कन्द पुराण के मनोरमा महात्य में मखक्षेत्र को इस प्रकार महिमा मण्डित किया गया है-

मखःस्थलमितिख्यातं तीर्थाणामुत्तमोत्तमम्।
हरिष्चन्ग्रादयो यत्र यज्ञै विविध दक्षिणे।।

       महाभारत के बनपर्व में यह आश्रम #चम्पा (वियतनाम) नदी के किनारे बताया है। वियतनाम के पूवोत्तर क्षेत्र के पर्यटन विभाग ने इस आश्रम को थाइलैंड की #अयोध्या  में होना बताया है।
        ऋष्यश्रृंग् के द्वारा तीनों रानियों के योनिकुंड में अपने लिंग के माध्यम से क्षीर (वीर्य) की आहुति देने के परिणाम स्वरूप शहंशाह दशरथ को राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामक चार औलादें हुई थी। 
              राजा दशरथ और कौशल्या /कैकयी की बेटी का नाम  शांता था। माना जाता  है कि एक बार अंगदेश (कम्बोडिया) के शाह रोम-पाद उर्फ लोम-पाद और उनकी रानी #वर्षिणी अयोद्धा आए:थे। उनके भी कोई औलाद नहीं थी। बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, मैं अपनी मनहूस बेटी शांता को" आपकी औलाद के रूप में दूंगा। सनातन धर्म के सनातन काल में गोदनामा करने की कोई लिखा पढी नही होती थी और ऋषि-मुनियों व राणा-राव द्वारा अपनी औलाद को कहीं भी फेंकने व किसी को देने की छूट थी  
    यह सुनकर लोमपाद और उसकी बीवी वर्षिणी बहुत खुश हुए। उन्हें शांता के रूप में एक बेटी मिल गई। उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और राणा जनक की तरहं माता-पिता के सभी ड्यूटी निभाई।
  एक दिन राजा रोमपद अपनी बेटी से बातें कर रहे थे। तब द्वार पर एक ब्राह्मण आया और उसने राजा से प्रार्थना की कि वर्षा के दिनों में वे खेतों की जुताई में शासन की ओर से मदद प्रदान करें। भारत के प्रधान की तरहं राव रोम-पाद को यह सुनाई नहीं दिया और वे अपनी बेटी के साथ बातचीत करते रहे।
         दरवाजे पर आए शहर के ब्राहमण भिखारी की याचना न सुनने से ब्राहमण को दुख हुआ और वे राजा रोमपाद का राज्य छोड़कर चले गए। वे इंद्र के भक्त थे। अपने भक्त की ऐसी अनदेखी पर इंद्र देव राजा रोमपद पर नाराज हो गए और उन्होंने मूसलाधार बारिश नहीं की। अंगदेश में नाम मात्र की मानसून की बरसात हुई और कहीं बाढ आ गई। इससे खेतों में खड़ी फसलें मुर्झाने और बाढ से  डूबने लगीं‌
          इस संकट की घड़ी में राणा रोम-पाद ऋष्यश्रृंग्य के पास गए और उनसे उपाय पूछा। ऋषि ने बताया कि वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करें। ऋषि ने यज्ञ किया और मूलाधार बरसात से वहाँ के खेत-खलिहान पानी से भर गए। इसके बाद प्रजापात्य वैवाहिक विधि से ऋष्यश्रृंग्य का शांता के साथ विवाह हो गया और वे सुखपूर्वक रहने लगे।
           हिमाचल प्रदेश के #कुल्लू जिले में" कब्जा करके बनाई गयी जमीन पर ऋष्यश्रृंग्य का मंदिर भी है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी करीब 50 किमी है। इस मंदिर में शृंग ऋषि के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है। यहां दोनों की पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। हरियाणा के जिला कैथल में भी सरकारी भूमि पर कब्जा करते हुए, ऋष्यश्रृंग्य का मंदिर बनाया हुआ है।
       सींग वाले ऋष्यश्रृंग्य राजमहल की विलासिता को त्यागकर पुनः वन में चले गए और वहीं मर गये।
श्रृंगी वंश:- दूसरों की बीवियों से बच्चे पैदा करने वाले' ऋष्यश्रृंग्य की घरवाली शांता के गर्भ से उनके एक बेटा का जन्म हुआ जिसका नाम शांत-श्रंगी रखा गया। ऋषि श्रृंग ने अपने बेटे को विधिवत ब्रह्मचर्य का पालन कराते हुए स्वयं वेदों का अध्ययन कराया, जिससे वह श्रेष्ठ वेदवेत्ता #श्रंग्य ऋषि के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मचारी होने के बावजूद सारंग्य ने आठ बेटे किए, जिनमें उग्र, वांम, भीम और वासदेव तो मरते दम तक ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर जन्नतवासी हो गये #वत्स धौम्य देव, वेद दृग तथा बेद-बाहु ने ब्रह्मचर्य पूर्वक वेदों को पढने के बाद शादी की।
वत्स के वंश में मीमांसा दर्शन रचयिता महामुनि जैमिनी हुए। जैमिनी के वंश में शांति देव और शांतिदेव के कुल में #कौडिन्य नाम के ऋषि हुए। कौडिन्य का अंगिरा नाम
भी प्रसिद्ध हुआ। कौडिन्य ऋषि के कुल में #शमीक नाम के ऋषि और शमीक ऋषि से तेजस्वी (#द्वापर #महाभारत काल के पश्चात) ऋष्यश्रृंग्य (द्वितीय) पैदा हुए। ऋष्यश्रृंग्य का बेटा #शांडिल्य ऋषि हुए। इनके यहाँ सात बेटों ने जन्म लिया। पजिनके नाम ज्ञानेश्वर, वाराधीश, भीमेश्वर, गोबिंद, दुग्धेश्वर, अनिहेश्वर और जयेश्वर हुए, इन सातों के 24 औलाद पैदा हुई। इनके द्वारा ही मुनिबनिये व मनुब्राहमणों केअधीन मानसिक व शारीरिक गुलामी करने वाले विभिन्न जाति के लोग व इनके 52 गोत्रों की व्यवस्था लागू हुई।
फेसबुकबाणी से संकलित एवं शुद्धिकृत परिष्कृत

"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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