पत्नीको सेक्स के लिए तयार करने के उपाय 👉 बृहदारण्यकोपनिषद
अगर किसी व्यक्ति कि पत्नी सेक्स के लिए मना करती है तो बृहदारण्यकोपनिषद लेखन ने पत्नी को सेक्स के लिए तयार करने के उपाय बताये है.
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वह #पत्नी यदि पती को #मैथुन न करने दे तो पती उसे उसके इच्छा के अनुसार वस्त्र,आभुषण आदी देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे.
इतनेपर भी यदि वह उसे मैथुन का अवसर न दे तो वह पती इच्छानुसार दण्ड का भय दिखाकर उसके साथ #बलपुर्वक #समागम करे. यदि यह भी संभव न हो तो कहे मै तुझे शाप देकर #दुर्भगा(बन्ध्या) बना दुंगा ऐसा कह कर वह उसके निकट जाये और मै अपनी यशः स्वरुप इंद्रियद्वारा तेरे यशको छिने लेता हु.
इस मंत्रका उच्चारण करे.
इस प्रकार शाप देणेपर वह #बन्ध्या अथवा दुर्भगा हो हि जाती है
(गिताप्रेस गोरखपूर,उपनिषद भाष्य खंड 4, बृहदारण्यकोपनिषद शंकर भाष्य 6/4/7)
नोट : पृष्ठ 1344 पर शंकराचार्य भाष्य है वो भी देखे..........
बृहदारण्यकोपनिषद लेखक के इस नेक सलाह मे कौनसा विज्ञान,अध्यात्मवाद,तत्वज्ञान है ?
पत्नी के साथ बलपुर्वक सेक्स करने कि शिक्षा देना क्या योग्य है ?
शायद वैदिक मत के अध्यात्मवाद मे ये पुण्यकर्म हो....
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शिवजी की पूजा लिंग (Penis) रूप मे क्यों होती है, इसके बारे मे लिंगपुराण (डायमण्ड प्रेस) मे दो कथाऐं आती है-
पहली कथा के अनुसार एक बार भृगुऋषि त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिये निकले, और वो जब शिव के पास पहुँचे तो उस समय भोलेनाथ देवी पार्वती के साथ शयनकक्ष मे थे! भृगु ने उनसे मिलना चाहा, पर द्वारपालों ने रोक दिया...
भृगु ने कुछ देर तक प्रतीक्षा की, और फिर क्रुद्ध होकर अन्दर शयनकक्ष मे चले गये! उन्होने शयनकक्ष मे देखा कि शिव पार्वती के साथ विहार कर रहे थे!
क्रोधित होकर भृगु ने शिव को श्राप दिया कि मै तुम्हारे द्वार पर कब से प्रतीक्षारत हूँ, और तुम यहाँ मौजमस्ती कर रहे हो, इसीलिये मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि आज के बाद तुम्हारी पूजा लिंगरूप मे और पार्वती की पूजा योनिरूप मे होगी।
दूसरी कथा के अनुसार एक बार शिव दारुकवन मे नग्न खड़े थे, और कुछ ऋषियों की पत्नियों ने उन्हे उसी नग्नावस्था मे देख लिया! ऋषि-पत्नियाँ शिव के लावण्य पर मोहित हो गयी और आकर उनसे लिपट गयी! थोड़ी ही देर मे उन औरतों के पति ऋषिगण भी वहाँ आ गये और शिव को नग्न देखकर उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया! उन्होने शिव को श्राप दिया कि हे अघोरी-रूपी शिव! तुम नग्न होकर धर्म का लोप कर रहे हो, इसलिये हम तुम्हे श्राप देते हैं कि तुम्हारा लिंग अभी कटकर भूमि पर गिर जाये।
श्राप देते ही शिव का लिंग कटकर भूमि पर गिर गया, और उसमे से अग्नि प्रज्वलित होने लगी! अब वह लिंग जहाँ भी जाता, वहाँ सब कुछ जलकर भस्म हो जाता था। ऐसी स्थिति देखकर देवतागण घबरा गये और इसके निवारण का उपाय पूँछने ब्रह्माजी के पास आये! ब्रह्मा ने कहा कि शिवलिंग अमोघ है और इसे केवल माता पार्वती ही शान्त कर सकती है...
अब सारे देवताओं ने पार्वती की शरण ली, और उनसे प्रार्थना किया कि माते शिवलिंग को शान्त करके संसार की रक्षा करो!
तब पार्वती वहाँ पहुँची, जहाँ वह लिंग दहक रहा था, उन्होने शिवलिंग को अपनी योनि मे धारण करके उसे शान्त किया! तभी से योनि और लिंग पूजा शुरू हुई!
इसका एक श्लोक भी हैं-
"भगस्य हृदयं लिंग, लिंगस्य हृदयं भगः।
तस्मै ते भगलिंगाय, उमारुद्राव्यै नमः।।"
ये दोनो कथाऐं बहुत सारे लोगों ने पढ़ा भी है, और जानते भी हैं। पर अब जो कथा मै बताने जा रहा हूँ उसे शायद कम ही लोग जानते होंगे...
पण्डित बाबूराम उपाध्याय अनुवादक भविष्यपुराणम् (हिन्दी साहित्य प्रकाशन, प्रयाग) प्रतिसर्गपर्व-3 खण्ड-4 अध्याय-17 श्लोक-67-82 तक मे एक कथा वर्णित है-
"एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव अत्रिऋषि की पत्नि अनुसुइया के पास गये, और उसकी सुन्दरता पर मंत्रमुग्ध होकर उससे कहने लगे हे मदभरे नेत्रों वाली सुन्दरी! तुम हमे रति प्रदान करो, अन्यथा हम यहीं तुम्हारे सामने अपने प्राण त्याग देंगे!
पतिव्रता अनुसुइया ने तीनों को मना कर दिया! तब शिवजी अपना लिंग हाथ मे पकड़ लिये, और विष्णु उसमे रसवृद्धि करने लगे, तथा ब्रह्मा भी काम पीड़ित होकर अनुसुइया पर टूट पड़े।
जब तीनो जबरन अनुसुइया को मैथुनार्थ पकड़ने लगे तब उसने तीनों को श्राप दिया कि तुम तीनों ने मेरा पतिव्रत् धर्म भंग करने की चेष्टा की है, इसलिये महादेव का लिंग, विष्णु के चरण और ब्रह्मा के सिर हमेशा उपहास का कारण बनेगे! और तुम तीनों ने मेरे ऊपर कुदृष्टि डाली है, अतः तुम तीनों ही मेरे पुत्र बनोगे!
अनुसुइया के श्राप से शिव के लिंग की पूजा होती है, और उसका उपहास भी होता है! बाद मे शिव ने दुर्वासा, विष्णु ने दत्तात्रेय और ब्रह्मा के चन्द्र के रूप मे अनुसुइया के गर्भ से जन्म भी लिया।"
मैने इस कथा के पूरे प्रमाण दिये है... अब तनिक सोचो कि ये कथाऐं कितनी अश्लील है! मैने जिस पुराण का उल्लेख किया, वह इलाहाबाद मे आसानी से मिल भी जायेगा।
शायद इसी अश्लीलता की वजह से दयानन्द सरस्वती पूरे देश मे घूमकर इन पुराणों का विरोध करते थे, पर पौराणिक-पंडों ने उनकी एक न सुनी।
///////अमित कुमार भारती///////
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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यूँ तो कहने के लिये 'पुराण' धर्मग्रंथ ही होते हैं, पर उसमे कुछ कथाऐं ऐसी लिखी हैं जिसका वर्णन चाहकर भी आप अपने परिजनों के सामने नही कर सकते! ऐसी ही एक कथा कूर्मपुराण अध्याय-37 मे लिखी है, जो निम्न है-
"एक बार भगवान शिव खुद भी नंग-धड़ंग होकर और साथ मे भगवान विष्णु को भी एक सुन्दर महिला बनाकर उन्हे भी नग्न-अवस्था मे लेकर देवदारू नामक वन मे विचरण करने लगे। उसी वन मे कई ऋषियों के आश्रम भी थे तथा उन ऋषियों की पत्नियाँ और उनके युवा पुत्र तथा पुत्रबधुऐं निवास करती थी।
वन मे विचरण करते-करते शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु नंगे बदन ही उन ऋषियों के आश्रम के पास पहुँच गये।
दोनो को नग्न अवस्था मे देखकर ऋषियों के पुत्र और बहुऐ स्तब्ध हो गयी! शिव नग्न-स्थिति मे भी इतने सुन्दर दिख रहे थे कि ऋषियों की जवान पुत्रबधुऐं कामातुर हो उनसे जाकर लिपट गयी और उनका आलिंगन करने लगी।
विष्णु भी स्त्रीरूप मे अपना जलवा बिखेर रहे थे, उनके गदराऐ हुस्न को देखकर तमाम ऋषिपुत्र भी विष्णु के चरणों मे जाकर गिर गये और उनसे प्रणय की याचना कर लगे।
अभी यह खेल चल ही रहा था कि अचानक तमाम ऋषिगण भी वहाँ आ गये और उन्होने जब अपने पुत्रों और बहुओं को इस तरह वासनाग्रस्त स्थिति मे देखा तो अत्यन्त क्रोध किया। क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने विष्णु और शिव दोनो को अनेक प्रकार के श्राप दिये पर उनके सारे श्राप निष्फल होकर रह गये। अतः क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने नग्न शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु को मारकर उस वन से भगा दिया।
अब दोनो देवदारू वन से घायल (ऋषियों की मार से) होकर वशिष्ठ के आश्रम मे आ गये! वशिष्ठ की पत्नि अरुन्धती ने दोनों देवों का बहुत स्वागत किया तथा उनके घावों पर औषधि भी लगायी। अभी घायल विष्णु और शिव का वशिष्ठ के आश्रम मे उपचार चल ही रहा था कि अचानक वशिष्ठ के शिष्यगण कहीं से आ गये और आश्रम मे नग्न महिला-पुरुष के जोड़े को देखकर उन्हे डंडे, ढ़ेलों तथा मुक्कों से मारने लगे।
उन मुनियों ने क्रोध मे आकर शिव से कहा 'हे दुर्मते! तुम अपने इस लिंग को उखाड़ फेंको'
शिवजी ने कहा कि यदि आप लोगों को मेरे लिंग के प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया है तो मै वैसा ही करता हूँ।
ऐसा कहकर शिव ने अपना लिंग उखाड़कर फेंक दिया! उनके लिंग फेंकते ही सबकुछ अदृश्य हो गया और चारो तरफ अंधेरा छा गया! सूर्य का तेज मंद हो गया, समुद्र सूखने लगे और धरती कांपने लगी। अब सारे ऋषिगण परेशान होकर ब्रह्माजी के पास गये और बोले कि हे देव! दारूवन मे एक अति सुन्दर नग्न पुरुष आया था जो हमारी पत्नियों और बहुओं को दूषित कर रहा था, तथा उसके साथ एक सुन्दर महिला भी थी, जो हमारे पुत्रों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी! हम लोगों ने उसे विविध प्रकार के श्राप दिये, पर जब हमारे सारे श्राप निष्फल हो गये तब हम लोगो ने उसे बहुत मारा और उस पुरुष के लिंग को नीचे गिरा दिया। लिंग के नीचे गिरते ही सभी प्राणियों मे भय प्रदान करने वाला भीषण उत्पात मच गया!
हे ब्रह्मदेव! वह स्त्री और पुरुष आखिर कौन थे?"
अब इसके आगे लम्बी कहानी है कि ब्रह्मा ने बताया कि वे साक्षात महादेव और विष्णु थे, और फिर ऋषियों ने अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये उनके कटे हुये लिंग के समान एक दूसरा लिंग बनाकर अपने पुत्रों, पत्नियों तथा बहुओं सहित वैदिक-रीति से शिव की अराधना की और फिर सब कुछ पहले जैसा ठीक हो गया।
इस कथा को लिखकर मै केवल यह पूँछना चाहता हूँ कि धर्मग्रंथों मे ऐसी अश्लील कथाऐं लिखने का मतलब क्या था?
क्या इन कथाओं को लोग अपनी माँ-बहन के सम्मुख पढ़कर सुना सकते हैं?
*****अमित कुमार भारती *****
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
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