टावर ओफ बाबल (बेबीलोन) का भारत से सम्बंध -
बाईबिल उत्पत्ति 11 में बाबिल के टावर के बारे में एक कथा मिलती है -
उत्पत्ति - अध्याय 11
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अध्याय 11
सारी पृथ्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली थी।
2 उस समय लोग पूर्व की और चलते चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उस में बस गए।
3 तब वे आपस में कहने लगे, कि आओ; हम ईंटें बना बना के भली भाँति आग में पकाएं, और उन्होंने पत्थर के स्थान में ईंट से, और चूने के स्थान में मिट्टी के गारे से काम लिया।
4 फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े।
5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया।
6 और यहोवा ने कहा, मैं क्या देखता हूं, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जितना वे करने का यत्न करेंगे, उस में से कुछ उनके लिये अनहोना न होगा।
7 इसलिये आओ, हम उतर के उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें।
8 इस प्रकार यहोवा ने उन को, वहां से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया।
9 इस कारण उस नगर को नाम बाबुल पड़ा; क्योंकि सारी पृथ्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, सो यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्यों को सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया॥
10 शेम की वंशावली यह है। जल प्रलय के दो वर्ष पश्चात जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उसने अर्पक्षद को जन्म दिया।
यहां अर्पक्षद नामक एक शासक का नाम भी है।
Paschal chronicle ने Indian astronomy पर एक fragment दिया है। जिसमें लिखा है -
टावर ओफ बाबिल के निर्माण के दौरान एक भारतीय ने अर्पक्षद के शासनकाल में उपस्थित दर्ज की, जो बहुत बुद्धिमान था। और वो एक खगोल शास्त्री था। उसका नाम andubarius था। यह पहला व्यक्ति था जिसने भारतीयों को खगोलशास्त्र के लिए निर्देश दिये थे।
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....अलबेरूनी का भारत....
अलबेरूनी नें आर्य ब्राम्हणों से कुछ सुना और कुछ देखा.?..
ब्राम्हणों के वेद एक धार्मिक पद्धति है,ब्राम्हणों के मतानुसार यह परमेश्वर से निकला है और ब्रह्मा ने अपने मुख वेद के विषय में विविध टिप्पणियों से इसपर प्रकाश किया है, ब्राह्मण लोग इसका अर्थ समझे बिना ही इसका पाठ करते हैं,इसी प्रकार ही वे इसे कण्ठस्थ भी कर लेते हैं ; एक से सुन कर दूसरा याद कर लेता है,ब्राह्मणों में वेद का अर्थ जानने वाले बहुत थोड़े हैं फिर उन लोगों की संख्या तो और भी कम है जिनका पाण्डित्य इतना बड़ा हो कि वे वेद के विषयों और उसकी व्याख्या पर धार्मिक विवाद ( शास्त्रार्थ ) कर सकें,ब्राह्मण क्षत्रियों को वेद पढ़ाते हैं,क्षत्रिय वेद को पढ़ते तो हैं ,पर उन्हें इसे किसी दूसरे को , यहाँ तक कि ब्राह्मण को भी , पढ़ाने का अधिकार नहीं,वैश्यों और शूद्रों को ,वेद का उच्चारण और पाठ करना तो दूर रहा , इसके सुनने की भी आज्ञा नहीं यदि वह प्रमाणित हो जाय कि किसी वैश्य या शूद्र ने वेद का उच्चारण किया है तो ब्राह्मण लोग उसे पकड़ कर न्यायाध्यक्ष के पास ले जाते हैं और उसकी जीभ काट दी जाती है,वेद में आज्ञायें और निषेध हैं ,अर्थात् पुण्य -कर्मों के प्रोत्साहन और पाप -कर्मों के निवारण के उद्देश्य से पुरस्कार और दण्ड का सविस्तार वर्णन है परन्तु इसका बहुत बड़ा भाग स्तुति के गीतों से भरा है,और इसमें नाना प्रकार के यज्ञों का वर्णन है ये यज्ञ इतने बहुसंख्यक और कठिन हैं कि आप इन्हें मुश्किल से गिन सकेंगे.
ब्राह्मण लोग वेद को लिखने की आज्ञा नहीं देते ,क्योंकि इसका उच्चारण विशेष ताल स्वरों से होता है वे लेखनी का प्रयोग इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई अशुद्धि और लिखित पाठ में कोई अधिकता या न्यूनता न हो जाए इसका फल यह हुआ कि वेद को गुरु से सुन कर ही कोई याद करता है,व कई बार वेद को भूल जाने से इसे खो भी चुके हैं,कारण यह वे मानते हैं कि शौनक ने यह बात शुक्र से सुनी थी कि सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में सम्भाषण करते हुए परमेश्वर ने ब्रह्मा से कहा था - " जिस समय पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी ,उस समय तुम वेद को भूल जाओगे,तब वेद नीचे पृथ्वी की गहराई में चला जायगा,और तब मछली के सिवा उसको और कोई बाहर न निकाल सकेगा इसलिए मैं मछली को भेजूंगा और वह वेद को लाकर तुम्हारे हाथों में दे देगी,और पृथ्वी को बचाने के लिए मैं वराह को भेजूंगा वह पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाकर पानी से बाहर ले आयगा इसके अतिरिक्त हिन्दुओं का यह भी विश्वास है कि गत द्वापर युग में ,जिसका जिक्र हम अन्यत्र करेंगे ,वेद और उनके देश तथा धर्म की सभी रीतियाँ लोप हो गई थीं ,फिर ब्रम्हा के पुत्र व्यास ने उनका नये सिरे से प्रचार किया विष्णुपुराण कहता है : -
“ प्रत्येक मन्वन्तर के आरम्भ में नये सिरे से उस मन्वन्तर का एक अधीश पैदा किया जायगा,उसकी सन्तान सारे भूमण्डल का राज्य करेगी एक राजा का जन्म होगा जो सारे जगत् का अधिपति होगा और देवता पैदा होंगे जिनको लोग यज्ञों में नैवेद्य चढ़ायेंगे और सप्तर्षि पैदा होंगे जो वेद का पुनरुद्धार करेंगे ; क्योंकि यह प्रत्येक मन्वन्तर की समाप्ति पर लुप्त हो जाता है " इसी कारण , अभी थोड़े ही वर्ष गुज़रे हैं कि , काश्मीर -निवासी वसुक नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण ने अपनी ही इच्छा से वेद को लिखने और इसकी व्याख्या करने का काम अपने हाथ में लिया था यह एक ऐसा काम था जिसे करने से दूसरे सभी लोग सङ्कोच करते वसुक ने वेदों को लिपिबद्ध किया थे ; परन्तु उसने इसे पूरा करके छोड़ा कारण यह कि वह डरता था कि वेद कहीं सर्वथा लुप्त न हो जाएं , क्योंकि वह देखता था कि लोगो के चरित्र दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं ,और वे धर्म की ही नहीं वरन पुण्य की भी अधिक परवाह नहीं करते,उनका विश्वास है कि वेदों के कुछ एक वचन ऐसे हैं जिनका घर में उच्चारण करना ठीक नहीं ,क्योंकि वे डरते हैं कि उनसे स्त्रियों और गायों या भैंसों के गर्भपात हो जाते हैं, इसलिए उनको पढ़ते समय वे घर से निकल कर बाहर खुले मैदान में चले जाते हैं.
याज्ञवल्क्य कथा--याज्ञवल्क्य अपने गुरु के यहाँ रहता था उसके गुरु का एक ब्राह्मण मित्र को यात्रा पर जाना था,इसलिए याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु से कहा कि आप किसी ऐसे मनुष्य को उसके घर भेजिए जो उसकी अनुपस्थिति में अग्नि में होम किया करे और उस आग को बुझने न दे,गुरु उस मित्र के घर अपने शिष्यों को एक - एक करके भेजने लगा,इस प्रकार याज्ञवल्क्य की भी बारी आ गई वह बड़ा रूपवान् और सुन्दर वस्त्र पहने हुए था जिस स्थान में अनुपस्थित मनुष्य की स्त्री बैठी थी वहाँ जा कर वह होम करने लगा,उस स्त्री को उसकी पोशाक बुरी मालूम हुई,यद्यपि उसने इस बात को छिपाये रक्खा पर याज्ञवल्क्य को उसके आन्तरिक भाव का पता लग गया, होम की समाप्ति पर उसने स्त्री के सिर पर छिड़कने के लिए जल लिया , क्योंकि मन्त्र पढ़ने के बाद फूंक मारने के स्थान में वे जल छिड़कते हैं,इसका कारण यह है कि वे फूंक मारने को नापसन्द करते हैं और इसे अपवित्र समझते हैं तब स्त्री ने कहा , “ इसको इस स्तम्भ पर छिड़क दो ” उसने ऐसा ही किया और वह स्तम्भ झटपट हरा हो गया,अब वह स्त्री उसके पुण्य - कर्म का प्रसाद खो बैठने पर पश्चात्ताप करने लगी,इसलिए उसने दूसरे दिन गुरु के पास जाकर प्रार्थना की कि मेरे घर आज भी उसी शिष्य को भेजिए जिसे कल भेजा था,पर याज्ञवल्क्य ने अपनी बारी के बिना आये जाने से इनकार कर दिया,किसी प्रकार की प्रेरणा का भी उस पर कुछ असर न हुआ उसने अपने गुरु के कोप की भी कुछ परवाह न की ,और केवल यह कहा कि “ जो कुछ आपने मुझे पढ़ाया है वह सब मुझसे ले लीजिए " इतना कहते ही फौरन उसका सारा पढ़ा -पढ़ाया उसे भूल गया,अब वह सूर्य के पास गया और उससे वेद पढ़ाने की प्रार्थना की सूर्य ने कहा“ यह कैसे सम्भव हो सकता है ,क्योंकि मैं तो सदा घूमता फिरता हूँ और तुम ऐसा करने में असमर्थ हो ? " परन्तु याज्ञवल्क्य सूर्य के रथ के साथ लटक गया और उससे वेद पढ़ने लगा,परन्तु रथ की विषम गति के कारण उसको कहीं -कहीं पाठ को रोकना पड़ता था,
सामवेद में यज्ञों ,आज्ञाओं और निषेधों का वर्णन है,यह गीत के स्वर में पढ़ा जाता है, इसी से इसका यह नाम है ,क्योंकि साम का अर्थ पाठ का माधुर्य है,इस प्रकार सामवेद और अथर्ववेद गाकर पढ़ने का कारण यह है कि जब नारायण वामन -अवतार होकर राजा बलि के पास गये थे तब उन्होंने ब्राह्मण का रूप धारण किया था,वे मर्मस्पर्शी स्वर में सामवेद का पाठ करते थे,इससे राजा बहुत प्रमुदित हुआ था , जिसके फल के तौर पर उसके साथ प्रसिद्ध कथा की घटना हुई थी....क्रमशः...
अलबेरूनी का भारत-
पृष्ठ-163-164-165-166.
--------मिशन अम्बेडकर.
*****अमित कुमार भारती *****
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती