Monday, 29 March 2021

पारसी उल्लेख।

कुर्म पुराण के अनुसार बहुत प्राचीन काल से पारसी लोग भारत के उपनिवेश में थे।


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भारत में शाकद्वीप से ब्राह्मण आये वे मग कहलाते हैं ये मूल भारतीय नही है। महाभारत काल में शाकद्वीप की भाषा में चार वर्ण निम्न थे -
1) मग - ब्राह्मण
2) मामग - क्षत्रिय 
3) मानस - वैश्य 
4) मदंग - शूद्र

आयुर्वेद। अंडकोष।

संगीत पर बुद्ध का फतवा!!!
बौद्ध धम्म में बुद्ध ने संगीत को हराम करार दिया है। अंगुत्तरनिकाय के त्रिक निपात के रोदन सुत्त में बुद्ध कहते हैं -
५. रोदन सुत्त
१०८. "भिक्षुओ, यह जो 'गाना' है, यह आर्य- विनय के अनुसार 'रोना' ही है। भिक्षुओ, यह जो नाचना है, यह आर्य-विनय के अनुसार 'पागलपन' ही है। भिक्षुओ, यह जो देर तक दांत निकाल क र हँसना है, यह आर्य- विनय केअनुसार 'बचपना' ही है। इसलिए भिक्षुओ, यह जो गाना है, यह सेतु ध्वंसनीय यह जो नाचना है, यह सेतु ध्वंसनीय है। धर्मप्रमुदित संत पुरुषों का
मुस्कराना ही पर्याप्त है।" - रोदन सुत्त 108

तो देखा मित्रों बुद्ध संगीत के खिलाफ थे जबकि संगीत मानव जीवन की नीरसता और शुष्कता को दूर करता है लेकिन बुद्ध मानव जीवन को नीरस और शुष्क बनाते हैं।
यही कारण है कि बौद्ध धम्म मात्र भिक्षु बनाने वाला मत है जो शल्य चिकित्सा से लेकर संगीत का भी विरोधी निकला।


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आज आधुनिक समय मे विज्ञान ने भले ही इतनी तरक्की कर ली है, फिर भी मानव के अण्डकोष (Testis) का प्रत्यार्पण शायद ही कभी हुआ हो!

अण्डकोष जन्म के समय से ही पुरुष शरीर का महत्वपूर्ण अंग होता है!
यह पुरुषत्व का प्रमाण होता है, और शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है!

यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है!
पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है!

जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है!
लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था!
सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया!

अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती!
अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें...

मेरा आशय देवी-देवताओं का मजाक बनाना नही है, मै केवल यह बताना चाहता हूँ कि धर्मग्रंथों मे लिखी बातें 80% झूठी है, इस पर विश्वास करने का कोई ठोस प्रमाण नही है!

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!

"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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🙏......✍️✍️ अमित कुमार भारती

बौद्ध, बौद्धधर्म, स्त्री, गर्भधारण।

बौद्ध धम्म में महाभयंकर गपोड और चंगाई प्रोग्राम! 
मित्रों गपोडों में बौद्ध धम्म एक से बढकर एक गपोड पेश करता है। बौद्ध धम्म का सबसे बडा विज्ञान यह है कि यहां औरते भी सात वर्षों तक गर्भवती हो सकती है। 
हमने 9-10 महीने गर्भावस्था सुनी है लेकिन यहां 7 वर्षों तक गर्भ धारण का अद्भुत चमत्कार मतलब विज्ञान हुआ। 
अब देखो कोलिय पुत्री को दर्द भी नही होता है क्योंकि वो त्रि रत्न पर विश्वास करती है। (त्रि रत्न - धम्म, संघ, बुद्ध) ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे ईसाई भी त्रिनिटि पर विश्वास रखकर कष्ट दूर होने का दावा करें। 
बुद्धमसीही का चंगाई प्रोग्राम इसके बाद शुरु होता है जब बुद्ध कोलिय स्त्री को यह कहते हैं -" सुप्पावास चंगी हो जा, बिना दर्द के प्रसव उत्पन्न कर।" तो भ ईया बुद्धेलुयिया सुप्पाबास सात वर्ष वाले प्रसव को बिना दर्द के आसानी से कर देती है।" 
इन सभी गपोडों का हमने स्क्रीन शॉर्ट भी दिया है। 
इतना ही नही उसका बच्चा भी बोलता है कि "मैं सात वर्षों तक खून के घडे में पडा रहा।" 
ये सभी गपोड त्रिपिटक के खुद्दक निकाय के उदान वर्ग के मुचलिंद वर्ग से है। 
इस गपोड की समीक्षा पाठक स्वयं करे।

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देश का सिपाही नर्क में उत्पन्न होगा या पशु योनि प्राप्त करेगा - गौत्तम बुद्ध

आज इस प्रमाण से स्पष्ट हो जायेगा कि बुद्ध की शिक्षा ऐसी थी कि उनसे क्षात्रबल का ह्वास होने लगा था। बुद्ध की शिक्षा क्षत्रिय को अस्त्र शस्त्र त्यागकर भिखारी बनाने वाली थी। 
बुद्ध में न तो संवेदना थी और न ही कोई सामाजिक व्यवहारिकता, उन्हें बस लोगों को भिक्षुक या कहें भिखारी बनाने की सनक थी। जहां यौद्धा युद्ध में देश, समाज, धर्म की रक्षा करते हुए वीरता दिखलाता है और वीर गति को प्राप्त होता है। वीर गति को प्राप्त हुए यौद्धा को हिंदू धर्म ग्रंथ स्वर्ग का अधिकारी मानते हैं तथा आज भी सभी देशों में यौद्धा को सम्मानित किया जाता है, उनकें स्मृति स्थल बनाये जाते हैं किंतु बुद्ध ने सुत्त पिटक के संयुक्त निकाय के सढायतनवग्ग पालि के 8 वें गामणि संयुत्त में 3 यौधाजीव सुत्त में यौद्धा के बारे में कहते हैं - 
मूल पालि - 
३. योधाजीवसुत्तं

३५५. अथ खो योधाजीवो गामणि येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा…पे॰… एकमन्तं निसिन्‍नो खो योधाजीवो गामणि भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, भन्ते, पुब्बकानं आचरियपाचरियानं योधाजीवानं भासमानानं – ‘यो सो योधाजीवो सङ्गामे उस्सहति वायमति, तमेनं उस्सहन्तं वायमन्तं परे हनन्ति परियापादेन्ति, सो कायस्स भेदा परं मरणा परजितानं देवानं सहब्यतं उपपज्‍जती’ति। इध भगवा किमाहा’’ति? ‘‘अलं , गामणि, तिट्ठतेतं; मा मं एतं पुच्छी’’ति। दुतियम्पि खो…पे॰… ततियम्पि खो योधाजीवो गामणि भगवन्तं एतदवोच – ‘‘सुतं मेतं, भन्ते, पुब्बकानं आचरियपाचरियानं योधाजीवानं भासमानानं – ‘यो सो योधाजीवो सङ्गामे उस्सहति वायमति, तमेनं उस्सहन्तं वायमन्तं परे हनन्ति परियापादेन्ति, सो कायस्स भेदा परं मरणा परजितानं देवानं सहब्यतं उपपज्‍जती’ति। इध भगवा किमाहा’’ति?

‘‘अद्धा खो त्याहं, गामणि, न लभामि – ‘अलं, गामणि, तिट्ठतेतं; मा मं एतं पुच्छी’ति। अपि च त्याहं ब्याकरिस्सामि। यो सो, गामणि, योधाजीवो सङ्गामे उस्सहति वायमति, तस्स तं चित्तं पुब्बे गहितं [हीनं (सी॰ पी॰)] दुक्‍कटं दुप्पणिहितं – ‘इमे सत्ता हञ्‍ञन्तु वा बज्झन्तु वा उच्छिज्‍जन्तु वा विनस्सन्तु वा मा वा अहेसुं इति वा’ति। तमेनं उस्सहन्तं वायमन्तं परे हनन्ति परियापादेन्ति; सो कायस्स भेदा परं मरणा परजितो नाम निरयो तत्थ उपपज्‍जतीति। सचे खो पनस्स एवं दिट्ठि होति – ‘यो सो योधाजीवो सङ्गामे उस्सहति वायमति तमेनं उस्सहन्तं वायमन्तं परे हनन्ति परियापादेन्ति, सो कायस्स भेदा परं मरणा परजितानं देवानं सहब्यतं उपपज्‍जती’ति, सास्स होति मिच्छादिट्ठि। मिच्छादिट्ठिकस्स खो पनाहं, गामणि, पुरिसपुग्गलस्स द्विन्‍नं गतीनं अञ्‍ञतरं गतिं वदामि – निरयं वा तिरच्छानयोनिं वा’’ति।

एवं वुत्ते, योधाजीवो गामणि परोदि, अस्सूनि पवत्तेसि। ‘‘एतं खो त्याहं, गामणि, नालत्थं – ‘अलं, गामणि, तिट्ठतेतं; मा मं एतं पुच्छी’’’ति। ‘‘नाहं, भन्ते, एतं रोदामि यं मं भगवा एवमाह ; अपिचाहं, भन्ते, पुब्बकेहि आचरियपाचरियेहि योधाजीवेहि दीघरत्तं निकतो वञ्‍चितो पलुद्धो – ‘यो सो योधाजीवो सङ्गामे उस्सहति वायमति, तमेनं उस्सहन्तं वायमन्तं परे हनन्ति परियापादेन्ति, सो कायस्स भेदा परं मरणा परजितानं देवानं सहब्यतं उपपज्‍जती’’’ति। ‘‘अभिक्‍कन्तं, भन्ते…पे॰… अज्‍जतग्गे पाणुपेतं सरणं गत’’न्ति। ततियं।

इसका हिंदी अनुवाद चित्र में है। 
यहां बुद्ध योद्धा की गति नर्क अथवा तिर्यक योनि बता रहे हैं। अर्थात् बुद्धानुसार हमारे मातृभूमि की रक्षा करने वाले शूरवीर, बलिदानी योद्धा नर्क के अधिकारी है। बुद्ध की ऐसी ही शिक्षाओं ने भारत में क्षत्रियों को क्षत्रबल हीन बना दिया था। 
इससे ज्ञात होता है कि बुद्ध एक मिशनरी की तरह कार्य करते थे जिनका उद्देश्य बस किसी भी तरह लोगों को अपने संघ में शामिल करना था। 
ऐसा उपदेश जो योद्धाओं की निंदा करे, शायद ही इतिहास में किसी ने दिया होगा। 
संदर्भित ग्रंथ -
1) संयुत्त निकाय - भिक्षु जगदीश कश्यप

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संगीत पर बुद्ध का फतवा!!!
बौद्ध धम्म में बुद्ध ने संगीत को हराम करार दिया है। अंगुत्तरनिकाय के त्रिक निपात के रोदन सुत्त में बुद्ध कहते हैं -
५. रोदन सुत्त
१०८. "भिक्षुओ, यह जो 'गाना' है, यह आर्य- विनय के अनुसार 'रोना' ही है। भिक्षुओ, यह जो नाचना है, यह आर्य-विनय के अनुसार 'पागलपन' ही है। भिक्षुओ, यह जो देर तक दांत निकाल क र हँसना है, यह आर्य- विनय केअनुसार 'बचपना' ही है। इसलिए भिक्षुओ, यह जो गाना है, यह सेतु ध्वंसनीय यह जो नाचना है, यह सेतु ध्वंसनीय है। धर्मप्रमुदित संत पुरुषों का
मुस्कराना ही पर्याप्त है।" - रोदन सुत्त 108

तो देखा मित्रों बुद्ध संगीत के खिलाफ थे जबकि संगीत मानव जीवन की नीरसता और शुष्कता को दूर करता है लेकिन बुद्ध मानव जीवन को नीरस और शुष्क बनाते हैं।
यही कारण है कि बौद्ध धम्म मात्र भिक्षु बनाने वाला मत है जो शल्य चिकित्सा से लेकर संगीत का भी विरोधी निकला।

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विनयपिटक मे आता है कि एक बार किसी ने पुरुष व्यंजन(लिंग) फेक दिया था तो भिक्षुणिया बडे गौर से देखने लगी. लोगो ने ताना मारा तब भिक्षुणिया लज्जासे चुप मुक हो गई. 

पुरुष लिंग फेकने कि ये हरकत  धम्म विरोधी किसी वैदिक व्यक्ती ने कि थी.
इससे हमे पता चलता है कि वैदिको कि स्त्रीओ के बारे मे क्या मानसिकता रही है. 

अगर उस समय संविधान होता तो  पुरुष लिंग फेकने वाला वो वैदिक आर्य विनयभंग के केस मे जेल कि हवा खा रहा होता.


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बेबीलोन, अलबेरुनी।

टावर ओफ बाबल (बेबीलोन) का भारत से सम्बंध - 
बाईबिल उत्पत्ति 11 में बाबिल के टावर के बारे में एक कथा मिलती है - 
उत्पत्ति - अध्याय 11
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अध्याय 11
सारी पृथ्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली थी।
2 उस समय लोग पूर्व की और चलते चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उस में बस गए।
3 तब वे आपस में कहने लगे, कि आओ; हम ईंटें बना बना के भली भाँति आग में पकाएं, और उन्होंने पत्थर के स्थान में ईंट से, और चूने के स्थान में मिट्टी के गारे से काम लिया।
4 फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े।
5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया।
6 और यहोवा ने कहा, मैं क्या देखता हूं, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जितना वे करने का यत्न करेंगे, उस में से कुछ उनके लिये अनहोना न होगा।
7 इसलिये आओ, हम उतर के उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें।
8 इस प्रकार यहोवा ने उन को, वहां से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया।
9 इस कारण उस नगर को नाम बाबुल पड़ा; क्योंकि सारी पृथ्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, सो यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्यों को सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया॥
10 शेम की वंशावली यह है। जल प्रलय के दो वर्ष पश्चात जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उसने अर्पक्षद को जन्म दिया।
यहां अर्पक्षद नामक एक शासक का नाम भी है। 
Paschal chronicle ने Indian astronomy पर एक fragment दिया है। जिसमें लिखा है - 
टावर ओफ बाबिल के निर्माण के दौरान एक भारतीय ने अर्पक्षद के शासनकाल में उपस्थित दर्ज की, जो बहुत बुद्धिमान था। और वो एक खगोल शास्त्री था। उसका नाम andubarius था। यह पहला व्यक्ति था जिसने भारतीयों को खगोलशास्त्र के लिए निर्देश दिये थे।

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....अलबेरूनी का भारत....
अलबेरूनी नें आर्य ब्राम्हणों से कुछ सुना और कुछ देखा.?..
ब्राम्हणों के वेद एक धार्मिक पद्धति है,ब्राम्हणों के मतानुसार यह परमेश्वर से निकला है और ब्रह्मा ने अपने मुख वेद के विषय में विविध टिप्पणियों से इसपर प्रकाश किया है, ब्राह्मण लोग इसका अर्थ समझे बिना ही इसका पाठ करते हैं,इसी प्रकार ही वे इसे कण्ठस्थ भी कर लेते हैं ; एक से सुन कर दूसरा याद कर लेता है,ब्राह्मणों में वेद का अर्थ जानने वाले बहुत थोड़े हैं फिर उन लोगों की संख्या तो और भी कम है जिनका पाण्डित्य इतना बड़ा हो कि वे वेद के विषयों और उसकी व्याख्या पर धार्मिक विवाद ( शास्त्रार्थ ) कर सकें,ब्राह्मण क्षत्रियों को वेद पढ़ाते हैं,क्षत्रिय वेद को पढ़ते तो हैं ,पर उन्हें इसे किसी दूसरे को , यहाँ तक कि ब्राह्मण को भी , पढ़ाने का अधिकार नहीं,वैश्यों और शूद्रों को ,वेद का उच्चारण और पाठ करना तो दूर रहा , इसके सुनने की भी आज्ञा नहीं यदि वह प्रमाणित हो जाय कि किसी वैश्य या शूद्र ने वेद का उच्चारण किया है तो ब्राह्मण लोग उसे पकड़ कर न्यायाध्यक्ष के पास ले जाते हैं और उसकी जीभ काट दी जाती है,वेद में आज्ञायें और निषेध हैं ,अर्थात् पुण्य -कर्मों के प्रोत्साहन और पाप -कर्मों के निवारण के उद्देश्य से पुरस्कार और दण्ड का सविस्तार वर्णन है परन्तु इसका बहुत बड़ा भाग स्तुति के गीतों से भरा है,और इसमें नाना प्रकार के यज्ञों का वर्णन है ये यज्ञ इतने बहुसंख्यक और कठिन हैं कि आप इन्हें मुश्किल से गिन सकेंगे.
   ब्राह्मण लोग वेद को लिखने की आज्ञा नहीं देते ,क्योंकि इसका उच्चारण विशेष ताल स्वरों से होता है वे लेखनी का प्रयोग इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई अशुद्धि और लिखित पाठ में कोई अधिकता या न्यूनता न हो जाए इसका फल यह हुआ कि वेद को गुरु से सुन कर ही कोई याद करता है,व कई बार वेद को भूल जाने से इसे खो भी चुके हैं,कारण यह वे मानते हैं कि शौनक ने यह बात शुक्र से सुनी थी कि सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में सम्भाषण करते हुए परमेश्वर ने ब्रह्मा से कहा था - " जिस समय पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी ,उस समय तुम वेद को भूल जाओगे,तब वेद नीचे पृथ्वी की गहराई में चला जायगा,और तब मछली के सिवा उसको और कोई बाहर न निकाल सकेगा इसलिए मैं मछली को भेजूंगा और वह वेद को लाकर तुम्हारे हाथों में दे देगी,और पृथ्वी को बचाने के लिए मैं वराह को भेजूंगा वह पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाकर पानी से बाहर ले आयगा इसके अतिरिक्त हिन्दुओं का यह भी विश्वास है कि गत द्वापर युग में ,जिसका जिक्र हम अन्यत्र करेंगे ,वेद और उनके देश तथा धर्म की सभी रीतियाँ लोप हो गई थीं ,फिर ब्रम्हा के पुत्र व्यास ने उनका नये सिरे से प्रचार किया विष्णुपुराण कहता है : - 
  “ प्रत्येक मन्वन्तर के आरम्भ में नये सिरे से उस मन्वन्तर का एक अधीश पैदा किया जायगा,उसकी सन्तान सारे भूमण्डल का राज्य करेगी एक राजा का जन्म होगा जो सारे जगत् का अधिपति होगा और देवता पैदा होंगे जिनको लोग यज्ञों में नैवेद्य चढ़ायेंगे और सप्तर्षि पैदा होंगे जो वेद का पुनरुद्धार करेंगे ; क्योंकि यह प्रत्येक मन्वन्तर की समाप्ति पर लुप्त हो जाता है " इसी कारण , अभी थोड़े ही वर्ष गुज़रे हैं कि , काश्मीर -निवासी वसुक नामक एक प्रसिद्ध ब्राह्मण ने अपनी ही इच्छा से वेद को लिखने और इसकी व्याख्या करने का काम अपने हाथ में लिया था यह एक ऐसा काम था जिसे करने से दूसरे सभी लोग सङ्कोच करते वसुक ने वेदों को लिपिबद्ध किया थे ; परन्तु उसने इसे पूरा करके छोड़ा कारण यह कि वह डरता था कि वेद कहीं सर्वथा लुप्त न हो जाएं , क्योंकि वह देखता था कि लोगो के चरित्र दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं ,और वे धर्म की ही नहीं वरन पुण्य की भी अधिक परवाह नहीं करते,उनका विश्वास है कि वेदों के कुछ एक वचन ऐसे हैं जिनका घर में उच्चारण करना ठीक नहीं ,क्योंकि वे डरते हैं कि उनसे स्त्रियों और गायों या भैंसों के गर्भपात हो जाते हैं, इसलिए उनको पढ़ते समय वे घर से निकल कर बाहर खुले मैदान में चले जाते हैं.
 याज्ञवल्क्य कथा--याज्ञवल्क्य अपने गुरु के यहाँ रहता था उसके गुरु का एक ब्राह्मण मित्र को यात्रा पर जाना था,इसलिए याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु से कहा कि आप किसी ऐसे मनुष्य को उसके घर भेजिए जो उसकी अनुपस्थिति में अग्नि में होम किया करे और उस आग को बुझने न दे,गुरु उस मित्र के घर अपने शिष्यों को एक - एक करके भेजने लगा,इस प्रकार याज्ञवल्क्य की भी बारी आ गई वह बड़ा रूपवान् और सुन्दर वस्त्र पहने हुए था जिस स्थान में अनुपस्थित मनुष्य की स्त्री बैठी थी वहाँ जा कर वह होम करने लगा,उस स्त्री को उसकी पोशाक बुरी मालूम हुई,यद्यपि उसने इस बात को छिपाये रक्खा पर याज्ञवल्क्य को उसके आन्तरिक भाव का पता लग गया, होम की समाप्ति पर उसने स्त्री के सिर पर छिड़कने के लिए जल लिया , क्योंकि मन्त्र पढ़ने के बाद फूंक मारने के स्थान में वे जल छिड़कते हैं,इसका कारण यह है कि वे फूंक मारने को नापसन्द करते हैं और इसे अपवित्र समझते हैं तब स्त्री ने कहा , “ इसको इस स्तम्भ पर छिड़क दो ” उसने ऐसा ही किया और वह स्तम्भ झटपट हरा हो गया,अब वह स्त्री उसके पुण्य - कर्म का प्रसाद खो बैठने पर पश्चात्ताप करने लगी,इसलिए उसने दूसरे दिन गुरु के पास जाकर प्रार्थना की कि मेरे घर आज भी उसी शिष्य को भेजिए जिसे कल भेजा था,पर याज्ञवल्क्य ने अपनी बारी के बिना आये जाने से इनकार कर दिया,किसी प्रकार की प्रेरणा का भी उस पर कुछ असर न हुआ उसने अपने गुरु के कोप की भी कुछ परवाह न की ,और केवल यह कहा कि “ जो कुछ आपने मुझे पढ़ाया है वह सब मुझसे ले लीजिए " इतना कहते ही फौरन उसका सारा पढ़ा -पढ़ाया उसे भूल गया,अब वह सूर्य के पास गया और उससे वेद पढ़ाने की प्रार्थना की सूर्य ने कहा“ यह कैसे सम्भव हो सकता है ,क्योंकि मैं तो सदा घूमता फिरता हूँ और तुम ऐसा करने में असमर्थ हो ? " परन्तु याज्ञवल्क्य सूर्य के रथ के साथ लटक गया और उससे वेद पढ़ने लगा,परन्तु रथ की विषम गति के कारण उसको कहीं -कहीं पाठ को रोकना पड़ता था,
सामवेद में यज्ञों ,आज्ञाओं और निषेधों का वर्णन है,यह गीत के स्वर में पढ़ा जाता है, इसी से इसका यह नाम है ,क्योंकि साम का अर्थ पाठ का माधुर्य है,इस प्रकार सामवेद और अथर्ववेद गाकर पढ़ने का कारण यह है कि जब नारायण वामन -अवतार होकर राजा बलि के पास गये थे तब उन्होंने ब्राह्मण का रूप धारण किया था,वे मर्मस्पर्शी स्वर में सामवेद का पाठ करते थे,इससे राजा बहुत प्रमुदित हुआ था , जिसके फल के तौर पर उसके साथ प्रसिद्ध कथा की घटना हुई थी....क्रमशः...
  अलबेरूनी का भारत-
पृष्ठ-163-164-165-166.
    --------मिशन अम्बेडकर.
          *****अमित कुमार भारती *****
"भारत एकता मिशन अम्बेडकर (लक्ष्य करोड़ों मूलनिवासियों के अपना अधिकारों का)"
#अमित कुमार भारती#
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Etc3

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